बुधवार, 19 मई 2021

यादों की उर्मियों में डूबती-उतराती प्रेम के रस में पगी हुई कविताएं

यादों की उर्मियों में डूबती-उतराती प्रेम के रस में पगी हुई कविताएं
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प्रेम नंदन
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हजारीबाग, झारखंड के रहने वाले युवा कवि हरेन्द्र कुमार का पहला कविता संग्रह 'मूंगफली के छिलके' अभी हाल ही में प्रलेक प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित हुआ है और काफी में चर्चा है। हरेंद्र कुमार की अधिकांश कविताएँ प्रेम के रस में पगी हुई हैं। कवि ने खुद स्वीकार किया है- 'प्रेम मेरी कविताओं के केन्द्र में है।, यह मानने में मुझे कोई गुरेज नहीं है। प्रेम इस सृष्टि का आधार है, प्रेम से
से यह सारा संसार है, इसे नकारा नहीं जा सकता। प्रेम से ही संवेदना उत्पन्न होती है और फिर वही सम्वेदना काव्य के रूप में अभिव्यक्त हो जाती है।

'संग्रह की शीर्षक कविता ' मूँगफली के छिलके' समेत दर्जनों कविताएं और संग्रह में शामिल गजलें कवि की स्वीकारोक्ति को पूरी तरह सच साबित करती हैं। कवि का मानना है कि प्यार मुक्त कर देता है- तुमसे ही सीखा है/ मैंने करना प्यार/ प्यार बाँधता नहीं/ मुक्त कर देता है यार। 'यादों की उर्मियाँ' कविता में भी कवि प्यार को इसी तरह से याद करता है- 'जब कभी मन अशांत हो/ तो निराश मत होना/ एक बार फिर से लगाना/ डुबकी अपने अतीत में/ उलटना यादों की पुरानी किताब/ वहाँ कोई न कोई पन्ना/ तुम्हें फिर से हँसना सिखा देगा/ तुम्हें फिर से तुमसे मिला देगा।'

ऐसा भी नहीं है कि इस संग्रह में सिर्फ प्रेम कविताएं ही हैं या कवि सिर्फ प्रेम कविताओं तक ही सीमित हैं। वे अपने समय, समाज और परिवेश पर भी संवेदनशील दृष्टि रखते हैं। उनकी कविताएं अपने समय की विडम्बनाओं को संवेदनशील ढंग से उजागर करती हैं। हरेन्द्र जी को आम जनजीवन के रोजमर्रा की घटनाओं को शब्दों में ढालने में महारत हासिल है। आम आदमी के जीवन में घटने वाली तमाम विसंगतियों, विडंबनाओं को बखूबी बयान करने का जरिया बनती हैं उनकी कविताएं। वे अपनी कविताओं में अपने आसपास के जीवन को बड़ी कुशलता से चित्रित करने वाले रचनाकार हैं। उनकी कविताएं हमारे समाज में दिन-प्रतिदिन होने वाले छोटे-बड़े सभी तरह के बदलावों पर तीखी और संवेदनशील और पारखी नजर रखती हैं और उन पर अपनी निर्मम और तीखी  टिप्पणियां भी करती हैं। 'भेड़-चाल' कविता में कवि ने मानव जीवन की भागमभाग का बड़ा सटीक वर्णन किया है- 'सबकुछ पाने के चक्कर में/ रोज थोड़ा खाली हो जाता हूँ/ यह कैसी दौड़ है/ जिससे मैं अनजान हूँ/ न मंजिल का पता है/ न रास्ते का ज्ञान है/ सब दौड़ रहे हैं/ इसलिए मैं भी बेहाल हूँ/ समझकर भी नासमझ हूँ/ कि यह भेड़-चाल है।'

आज के समय में सबसे ज्यादा संकट रिश्तों-संबंधों की विश्वसनीयता पर है । सारा सामाजिक जीवन रिश्तों की विश्वसनीयता के संकट के दौर से गुजर रहा है । ऐसे में रिश्तों की गर्माहट बचाना बेहद जरूरी है। 'मेरे जीवन की ऊष्मा' शीर्षक कविता में  हरेंद्र कुमार ने सहज शब्दों में इसे अभिव्यक्त किया है कि प्रेम और स्नेह की गर्माहट के बिना जीवन निस्तेज है और इनके साथ होने से व्यक्ति हर मुश्किल का सामना बड़े आराम से कर लेता है - "मेरे दोस्त ! /मेरे हाथों की शक्ति/मेरे पैरों की गति हो तुम,/तुम्हारे बिना मैं हूँ/निष्क्रिय और निस्तेज!/तुम्हारे स्नेह की डोर/ मेरे साँसों की डोर से/कहीं ज्यादा मजबूत है।/इनके सहारे लाँघ जाता हूँ मैं/दुर्गम पथ,/पार करता हूँ/ कंटक सफर।"

हरेंद्र कुमार अपने आसपास के वातावरण पर पैनी और  संवेदनशील दृष्टि रखने वाले कवि हैं। वे इसे भली-भांति समझते हैं कि भले ही आज आदमी चंद्रमा पर कॉलोनियां बनाने के ख्वाब बुन रहा है लेकिन उसके आसपास ही लाखों भूखे नंगे लोग रोटी के एक टुकड़े के लिए तरस रहे हैं। ऐसे समय में सिर्फ रोटी पर कविता लिखने भर से काम नहीं चलने वाला। आखिरकार पेट तो रोटी से ही भरेगा, कविता से नहीं। रोटी' पर कविता' में कवि से भूखे लोग  एक दिन यही सवाल पूछ बैठते हैं- एक बात बताओ-/
रोटी कब/ बहसों और किताबों से निकलकर/
मेरी थाली में आएगी? 

इस दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति, समाज और देश  की अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान है, जिससे उसकी पहचान सम्बंधी मौलिक विशेषताएँ समाहित रहती हैं। इन्हीं विशेषताओं को उसकी जड़ों यानी उसके गांव-गिरांव, बोली ,भाषा और समूचे परिवेश से जोड़कर देखा जाता है और यही उसकी मौलिक पहचान होती हैं। यदि आदमी की यह पहचान खो जाए या वह खुद इस पहचान से खुद को अलग-थलग कर ले तो उसका जीवन नीरस हो जाता है । सामान्यतः लोग इसे पुरानी परंपरा से जोड़कर देखते हैं लेकिन कवि यहां पुरानी परंपरा को ढोने की बात नहीं करता बल्कि विचारों की नई सरिता प्रवाहित करने की बात करता है जिसमें उसकी खुद की अपनी पहचान हो। इसलिए वह दुनिया का सब कुछ छोड़ कर अपनी मौलिकता को बचाए रखने की बात करता है। 'मौलिकता' शीर्षक कविता में कवि इसी मौलिकता को बरकरार रखने की चाहत से ओतप्रोत है - "मुझे चाहिए वह झाड़ू /जिससे मैं आदर्शों के झोल/झाड़ सकूं ।/मुझे चाहिए वह वसूली /जिससे मैं इसका /नया रूप ढाल सकूं ।/और ,/सड़ी हुए जल की इन मछलियों को /विचारों की सरिता से/बाहर उछाल सकूं।/
 फिर /मुझे कुछ और नहीं चाहिए/ बस /मुझे मेरी मौलिकता चाहिए।"

'आपदा उत्सव' कविता में कवि हरेंद्र कुमार मानव स्वभाव की उस विकृति की ओर इशारा करते हैं जिसमें उलझकर हम मानवीय गुणों का त्याग करके धन पशु में तब्दील हो जा रहे हैं। बाढ़ हो, सूखा हो, सड़क दुर्घटना हो या अन्य प्राकृतिक आपदा, धन-पशुओं के लिए ये अपनी तिजोरीयों को भरने का सुअवसर बन जाता है । वे आपदा को अवसर में बदलने में सिद्धहस्त होते हैं। वे सारी मानवीय संवेदना को दरकिनार करके लूट-खसोट में जुट जाते हैं। हरेन्द्र जी ने अपनी इस कविता में मानवता के दुश्मन लोगों के इसी अमानवीय कुकृत्य को रेखांकित किया है - "इस बार  फिर कई अधूरे सपने/ पूरे होने की बारी है/किसी ने बड़े प्लॉट /तो किसी ने /लग्जरी गाड़ी की कर ली तैयारी है /शवों के कफन नोंचने की /मारामारी है /ताबूतों के कील  उखाड़ने की/ फिर बारी है /इस तरह आपदा उत्सव /जोर शोर से मनाने की तैयारी है।"

कविता मनुष्यता का आदिम राग है। मनुष्य के सुख-दुख, खुशी, उल्लास रुदन जैसी समस्त मानवीय संवेदनाओं को आवाज देने का कार्य हमेशा से ही कविता ने ही किया है। मनुष्य के पैदा होने के साथ से लेकर उसके मरने तक कविता मनुष्य और मनुष्यता का साथ देती है। कविताओं ने हमेशा ही मानवता की रक्षक के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन किया है। मानव जीवन और कविता का चोली दामन का साथ है। एक सही कविता हमेशा सत्ता के विपक्ष में और जनमानस के पक्ष में खड़ी होती है । यह 'कविता की जरूरत' है। कवि के शब्दों में - "इसे खड़ा होना होगा/अपने पैरों पर/पूरे पुरुषार्थ के साथ ।/तोड़ना होगा जर्जर वैशाखी को, /दौड़ना होगा /कठोर कंकरीले और कँटीले रास्ते पर /बेखौफ़।/लिखना होगा /कठिन समय का सच/छोड़ना होगा/ पद ,सत्ता और पुरस्कार का पक्ष।/ चखना होगा /पसीने और लहू का स्वाद /
देना होगा /मुश्किल समय में/ मनुष्य का साथ।"

शिक्षा के बाजारीकरण ने शिक्षा और शिक्षक दोनों को अपने कर्तव्य पथ से विरत करने का काम किया है। आज शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से व्यवसाय बनकर पूंजीपतियों की तिजोरी भरने का साधन बन गई है। शिक्षा माफियाओं ने इस पवित्र पेशे को धन उगाही का जरिया बना रखा है ।कोरोना के इस वैश्विक महामारी के दौर में निजी विद्यालय के शिक्षकों के सामने दो वक्त की रोटी की समस्या खड़ी हो गई। वे फिर से द्रोण बन द्रुपद  के द्वार खड़े हैं ।पर वहां उन्हें तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं मिलता,मिलती है तो सीख। सब को सिखाने वाले शिक्षकों को यह सीख शिक्षा माफिया दे रहे हैं - "यह समय अपने पढ़ाये/पाठ पर चलने का है/जीवन के अग्निपथ पर/आहुति बन जलने का है।/आप अगर हो गए अधीर /तो बच्चों को क्या बतलाएंगे/विवशताओं से कैसे लड़ते हैं /यह सीख उन्हें कैसे सिखाएंगे।/इस तरह से दे रहे हैं वे/शिक्षक को सीख/ किस -किस के द्वार पर 
अब मांगे वो भीख ।"

युवा कवि हरेंद्र कुमार की कविताएं उनके बेहतर कवि को और अधिक बेहतर होने को आश्वस्ति  देती हैं। हरेन्द्र जी की कविताएं पूरी जिम्मेदारी और पक्षधरता के साथ आगे बढ़कर अपनी रचनात्मक जिम्मेदारी निभ रही हैं और अपने समय की विडम्बनाओं, संघर्षों, विचलनों, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक समस्याओं की चीरफाड़ करते हुए उम्मीद की रोशनी फैलाने का कार्य कर रही हैं। वे पूरी तरह आस्वस्त करते हैं कि भविष्य में उनकी कविताओं का इतिहास और भूगोल और विस्तृत होगा उनकी कविताओं को और व्यापकता के विस्तार की क्षमताओं को और नए और संवेदनशील पंख लगेंगे। आशा है हरेंद्र कुमार जी की कविताएं साहित्यिक परिदृश्य में अपनी सार्थक और संवेदनशील उपस्थिति से कविता के संसार को और अधिक समृद्ध करेंगी।
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संपर्क :- द्वारा - राकेश कुमार सक्सेना(पोस्टमैन)
,प्रधान डाकघर, फतेहपुर, (उ0प्र0), पिनकोड --212601
मो : 09336453835
ईमेल: premnandanftp@gmail.com

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