रविवार, 25 अगस्त 2024

प्रख्यात आलोचक डॉ0 ओउमप्रकाश अवस्थी जी से बातचीत

*भूमिका / प्रस्तावना* 


फतेहपुर के समूचे साहित्यिक परिदृश्य को रेखांकित करने के लिए युवा रचनाकार एवं अपने रचना कर्म को अपने हिन्दी ब्लॉग "आखरबाड़ी" के माध्यम से दुनिया तक फैलाने में संलग्न श्री प्रेम नंदन जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर फतेहपुर जनपद के इतिहास को समेटे ग्रंथों ‘अनुवाक और उसकी अगली कड़ी अनुकाल’ के प्रधान सम्पादक डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी जी से एक लम्बी बातचीत की है। डा. ओऽमप्रकाश अवस्थी ने साहित्य और विशेषकर समालोचना के क्षेत्र में अपनी मौजूदगी का बखूबी अहसास कराया है। निःसंदेह इन्हें फतेहपुर जिले की आलोचना परंपरा का प्रतिनिधित्व करने वाले शिखर पुरुष का दर्जा प्राप्त है। साहित्य के इस पुरोधा की कृतियों में रचना प्रक्रिया , नई कविता, आलोचना की फिसलन , अज्ञेय कवि व अज्ञेय गद्य प्रकाशित हुई है। साहित्य की अनेक विधाओं पर  इस लंबी पर गंभीर बातचीत को यहाँ पर क्रमशः प्रस्तुत किया जाएगा। प्रस्तुत है इस कड़ी का प्रथम हिस्सा ...



*नई कविता : वैचारिक दबाव के कारण अभिव्यक्ति का गद्यात्मक रूप है ~ डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी (साक्षात्कार -1))* 


प्रेम नंदन- डॉ0 साहब आपने नई कविता को गहराई से देखा और परखा है, कृपया बतायें कि नई कविता का जन्म कब और किन परिस्थितियों में हुआ?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- छायावादी कविता के अमृर्त विधान के प्रति, प्रतिक्रिया स्वरूप नई कविता का जन्म हुआ। जिसने द्वितीय विश्व युद्ध की त्रासदी के कारण प्रत्येक क्षेत्र के सामाजिक परिर्वन के आधार बनाया और मनुष्य के सामने मुँह बाये खड़े मृत्यु भय, सन्त्रास, घुटन और निराशा को रोका। चूँकि इसमें सम्पूर्ण मानव जाति के सन्दर्भों का आंकलन था इसलिए पाश्चात्य प्रभाव भी कविता में पड़ा जिसकी पहली अभिव्यक्ति ‘तार सप्तक’ संकलन में हुई। नई कविता ने युद्ध त्रासदी से पीड़ित मानव-सम्बन्धों को केन्द्र में रखकर छायावाद से नितान्त भिन्नता रखने वाली रचना प्रक्रिया को अपनाया। नई कविता ने छायावाद की वायवीह भाषा के स्थान पर लोकजीवन में प्रचलित बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया। इसका प्रारम्भिक रूप से प्रयोगशील कविता के नाम से आया, बाद में इसी को नई कविता कहा जाने लगा।


प्रेम नंदन- डॉ0 साहब, नई कविता की क्या विशेषतायें हैं?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- नई कविता वैश्विक स्तर पर बदलती हुई मानवीय संवेदनाओं को चित्रित करने की कविता है। इसमें किसी प्राचीन परम्परा के आग्रह के प्रति दुराग्रह नहीं है परन्तु उसे आँख मूँदकर स्वीकार कर लेने का भाव भी नहीं है। नई कविता पौराणिक बड़प्पन के स्थान पर समाज का सामान्य अकेला और जिजीविषा से भरा मानव व्यक्तित्व केन्द्र में रखा। इसने उपदेश, ज्ञान, इतिहास आदि से अपने को मुक्त करके प्रतीकों के नये प्रयोग, टटके बिम्ब ताजे उपमान और मिथकों के नये सन्दर्भ ग्रहण किये।


प्रेम नंदन- फतेहपुर में नई कविता का प्रारम्भ कब से मानते हैं?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- मैं फतेहपुर सन् 1969 में आया, उस समय साहित्यिक मंचों में प्रायः पारम्परिक कविता और गीत पढ़े जाते थे। नई कविता के हस्ताक्षर के रूप में मेरी पहली मुलाकात श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी से हुई चूँकि वह कई वर्ष के विदेश-भ्रमण के बाद लौटे थे, इसलिए उनको साहित्य के बाह्य परिवेश की जानकारी थी और नई कविता के काव्यात्मक स्वरूप से भी परिचित थे। वे मंचों में शास्त्रीय, पारंपरिक कविता के साथ-साथ अनुरोध करने पर नई कविता भी सुना देते थे। मैंने प्रथम बार उनसे ‘श्वेत  श्यामपट’ शीर्षक से यह कविता सुनी जो मानव-जाति के रंग-भेद  पर बहुत तीखी प्रतिक्रिया थी। बाद उन्होंने इसी शीर्षक से अपनी नई कविताओं का एक संकलन भी तैयार किया। उनकी एक लम्बी कविता ‘कुरुक्षेत्र से राधा के नाम’ काफी चर्चित हुई जिसमें युद्ध और शान्ति के विषय को, गीता के मिथकीय सन्दर्भ को आधुनिक परिवेश में उद्धृत किया गया है।


प्रेम नंदन- पौराणिक चरित्रों का प्रतीकत्व नई कविता में कैसे आया?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- नई कविता ने पौराणिक चरित्रों को बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के परिवेश में प्रस्तुत किया और उनको अपने यंग के सन्दर्भों और अन्तर्द्वन्दों के अनुसार ढाला। यथा-धर्मवीर भारती का ‘अन्धा युग’, नरेश मेहता का ‘संशय की एक रात’ कुंवर नारायण का ‘आत्मजयी’ श्री कृष्ण कुमार त्रिवेदी की ‘कुरुक्षेत्र से राधा के नाम’ आदि ऐसी रचनायें हैं जिनमें चरित्र तो प्राचीन एवं पौराणिक हैं लेकिन उनका चिन्तन और कर्म, उनके हृदय में उठने वाले अर्न्तद्वन्द नितांत आधुनिक है।


साक्षात्कार देते हुए डा० ओऽमप्रकाश अवस्थी जी (बाएं)  साथ में प्रेम नंदन जी (दायें )


प्रेम नंदन- जनपद में श्री कृष्ण कुमार त्रिवेदी जी के अतिरिक्त नई कविता के और कौन-कौन से प्रमुख हस्ताक्षर है और उनका क्या योगदान है?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- छन्द की पंक्तियाँ तोड़कर और गद्य को छोटी-बड़ी पंक्तियों में लिखना नई कविता नहीं है। नई कविता का कवि भाषा पर इतना अधिक दबाव बनाता है कि जितने शास्त्रीय प्रतिमानों को वह छोड़ देता है, उन सबसे आगे जाने के लिए नई भाषा, नये प्रतीक एवं अभिव्यक्ति के नये रास्तों की खोज करता है। जनपद में भाषा की कसावट एवं उसमें भावात्मक दबाव बनाने वाले कवि कम है। सातवें दशक के बाद धीरेन्द्र विद्यार्थी ने कुछ नई कवितायें लिखीं। नई कविता में इधर एक काव्य संकलन ‘सपने जिन्दा है अभी’ आया है जिसमें भाषा का कच्चापन साफ झलकता है लेकिन कविताओं में परिवर्तित मूल्यों की पकड़ है। इसके अतिरिक्त भी कुछ संकलन आये हैं। इस समय ज्ञानेन्द्र गौरव, प्रेम नंदन, शैलेष गुप्त ‘वीर’, प्रवीण कुमार श्रीवास्तव, बृजेन्द्र अग्निहोत्री, वेदप्रकाश मिश्र, आशुतोष वर्मा आदि कई लोग नई कविता लिख रहे हैं और पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे हैं।


प्रेम नंदन- नई कविता का जनपद में आप क्या भविष्य देखते हैं?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- नई कविता का भविष्य कवियों की साधना पर निर्भर करता है। इधर नई कविता लिखने वाले कवियों की संख्या में वृद्धि हुई है यह साहित्य के विकास का एक शुभ लक्षण है यहाँ के कवि जो नई कविता लिख रहे हैं या नई कविता के जो संकलन प्रकाशित हो रहे हैं, उनमें मेहनत और परिमार्जन की आवश्यकता है। यदि ये कवि समाज के बदलते तेवर, मूल्यों की पहचान और भाषा की कसावट पर ध्यान देते रहेंगे तो उनका भविष्य अच्छा रहेगा।


प्रेम नंदन- वर्तमान में नई कविता गद्य बनती जा रही है, क्यों? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- मनुष्य अपने पारम्परिक, भावुकतापूर्ण सन्दर्भों से कटता जा रहा है। उसमें एक वैचारिक स्वार्थ बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। उसका अन्तःकरण को काव्यात्मक है लेकिन अभिव्यक्ति के लिए नई भाषा की खोज नहीं कर पा रहा है, जिसमें वह अपने विचारों को व्यक्त कर सके। वैचारिक दबाव के कारण अभिव्यक्ति का गद्यात्मक होते जाना स्वभाविक है पर कवियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि नई कविता भी कविता है, वह गद्य नहीं है।


प्रेम नंदन- नई कविता के कवियों को आप क्या सन्देश देना चाहेंगे? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- नये कवि भाषा के साथ कठिन परिश्रम करें और आज के परिवेश के अर्न्तद्वन्द तथा मनुष्य की कुण्ठा नैराश्य, अकेलेपन को उद्घाटित करने के लिए तदनुरूप भाषा का सृजन करें। सभी कवियों के प्रति मेरी मंगलकामना है कि वे यशस्वी हों।


क्रमशः


 *एक नवगीतकार के लिए उत्तर आधुनिकता की मानसिकता का होना बहुत जरूरी है : डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी ( साक्षात्कार - 2)* 


प्रेम नंदन- डॉ0 साहब, आप फतेहपुर जनपद में काव्य परम्परा का प्रारम्भ कहाँ से मानते हैं?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- नंदन जी, फतेहपुर सन् 1826 में बना और इतिहास लेखकों ने 1826 में जो क्षेत्र फतेहपुर में लिया गया उसमें पैदा हुए रचनाकारों को फतेहपुर का कवि मान लिया। इस समय जो साहित्य, फतेहपुर जिले के अन्तर्गत निरूपित किया गया उसमें अकबरी दरबार के कवियों से इसका प्रारम्भ होता है। असनी के कवियों ने आचार्य विश्वनाथ को, जो जलालउद्दीन के समय के संस्कृत के आचार्य थे, उनका सम्बन्ध फतेहपुर से जोड़ना चाहा परन्तु प्रमाणित नहीं कर सके। यों मान लो कि हिन्दी कवियों का अकबरी दरबार से पहले प्रमाण नहीं मिलता। उन कवियों में- करनेस, मानराय, और मुख्य रूप से नरहरि का नाम लिया जाता है। यद्यपि नरहरि पखरौली, जिला रायबरेली के रहने वाले थे परन्तु अकबर ने असनी और आस-पास के गाँव उन्हें प्रदान किये थे इसलिए वह फतेहपुर के कवियों में ही परिगणित किये जाते हैं।


प्रेम नंदन- डॉ0 साहब, फतेहपुर के कवियों की दरबारी परम्परा कब तक चली और उसके बाद कविता का क्या स्वरूप बना?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- फतेहपुर के कवियों की आप तीन कोटियाँ बना सकते हैं- पहली कोटि फतेहपुर की धरती के उन कवियों की है जो फतेहपुर से अन्यत्र जाकर दूसरे दरबारों में रहे। दूसरी कोटि उन कवियों की है जो बाहर से आकर फतेहपुर के छोटे रजवाड़ों में रहे और तीसरे कोटि में वे कवि आते हैं जो कहीं नहीं गए और वे फतेहपुर के अंचल में ही रहे। यही तीनों कोटियाँ अब तक किसी न किसी रूप में चली आ रही हैं और शायद आगे भी चलती रहेगी। दरबारी कविता की परम्परा सन् 1900 तक तो बड़ी मजबूती से चलती रही जिसके अन्तिम कवि, असनी के सेवक जो काशी नरेश के दरबारी थे और पुरंदरराम त्रिपाठी जो जयपुर में महाराज राम सिंह के सभा कवि थे। ज्यों ज्यों रजवाड़े टूटते रहे, कविता की विधाएँ बदलती गईं और साहित्यिक कर्म में राजदरबारी कवियों के प्रति सम्मान का भाव न रह गया। इसके बाद कविता का स्वरूप बदला और भारतीय नव जागरण और राष्ट्रीय जागरण से जुड़कर आगे बढ़ा। इस सम्बन्ध में सीमा रेखा बहुत स्पष्ट नहीं हैं क्योंकि राष्ट्रीय कविता का स्वरूप सन् 1860 के आस-पास आना शुरु हो गया था।


प्रेम नंदन-  राष्ट्रीय नव जागरण के प्रमुख कवि कौन-कौन थे और उनका क्या योगदान रहा? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- हिन्दी में फतेहपुर को राष्ट्रीय कविता से जोड़ने का कार्य लाला भगवानदीन ‘दीन’ ने किया। लाला जी रीतिकालीन आचार्य परम्परा के अच्छे ज्ञाता थे लेकिन वे विदेशी दासता से उतना ही खिन्न थे जितना कि उस समय का जनमानस और राष्ट्रीय राजनैतिक दल। उन्होंने अतीत के चरित्रों को लेकर देश प्रेम की ओजस्वी कविताएँ लिखीं। उनके साथ-साथ उनकी पत्नी, जो बुन्देला बाला के नाम से लिखती थीं; उन्होंने भी देशभक्ति की रचनायें लिखीं। राष्ट्रभक्ति की काव्यधारा में लिखने वालों में बाबू वंशगोपाल का अप्रतिम योगदान है। उन्होंने राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत ‘‘सत्याग्रह और असहयोग का आल्हा’’ लिखा लेकिन सरकारी प्रतिबन्धों के कारण वह जनता के बीच न आ पाया। मालवीय जी से गुरु भाव रखने वाले पण्डित सोहन लाल द्विवेदी जी ने भी राष्ट्रीय कवितायें लिखीं। इसके साथ-साथ हरिदत्त शर्मा ‘हरि’, रामस्वरूप अवस्थी, दुलारे सिंह ‘वीर’, मातादीन शुक्ल, जगमोहन नाथ अवस्थी, जगन्नाथ प्रसाद त्रिपाठी ‘पथिक’, छेदीलाल पाण्डेय ‘भण्डाफोड़’, रामशरण शुक्ल, गौरीशंकर अग्निहोत्री आदि ऐसे नाम हैं जो देशप्रेम, देशभक्ति और राष्ट्रीयता की रचनायें लिखते रहे इनमें बहुतों की रचनाओं का प्रकाशन बाद में हुआ और कुछ का नहीं भी हुआ। फतेहपुर की यह धारा वैसी ही मजबूत थी जैसे रीतिकालीन कवियों की धारा।


प्रेम नंदन- उस युग की अन्य कौन सी काव्य धारायें रहीं जिनमें फतेहपुर के कवियों ने रचनायें की? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- इस अवधि में कविता के समक्ष भाषा का विवाद भी बहुत प्रबल था। जिन आचार्यों ने कविता के लिए ब्रजभाषा को ही उपयुक्त समझा था और उसमें रचनायें भी लिखी, उनमें रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। रसाल जी ने एक ओर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ के उद्धव शतक की भूमिका लिखी, उसी के साथ ठेठ हिन्दी का ठाठ वाले अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ‘हरिऔध’ के रसकलश की भी भूमिका लिखी और स्वयं ‘उद्धव शतक’ के नमूने का एक बड़ा काव्य ग्रन्थ - ‘‘उद्धव ब्रजांगना’’ के नाम से लिखा। दूसरी धारा जो तात्कालिक हिन्दी या द्विवेदी युगीन हिन्दी की अनुकरणशील थी, उसमें तरह-तरह की इतिवृत्तात्मक रचनायें भी लिखी गईं और जो हिन्दी का मानक गाँधी जी ने स्थापित किया था, उस हिन्दी में भी कविताएँ लिखी गईं जिनमें प्रमुख रचनाकार श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ तथा बाबू वंशगोपल आदि थे। इसके साथ ही छायावादी काव्य का प्रतिनिधित्व जीवन शुक्ल ने ‘बंशी तुम धरा दो’ तथा डॉ0 सुखनिधान सिंह ने अपनी पुस्तक ‘‘अर्न्तज्योति’ में किया। प्रगीत धारा का प्रतिनिधित्व रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ ने किया तथा प्रगतिवादी ढंग की रचनाओं का श्रीगणेश दीपनारायण सिंह, जीवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव उर्फ जीवन दद्दा ने किया। अपनी-अपनी रुचि के अनुसार राजनैतिक, धार्मिक, भक्ति सम्बन्धी, प्रेम सम्बन्धी कविताएँ भी लोग लिखते रहे। इस काल के अन्य प्रबुद्ध कवि तारकेश्वर बाजपेयी, सत्यपाल ‘सत्य’, बद्रीप्रसाद गुप्त ‘आर्य’, रामबिहारीलाल श्रीवास्तव ‘आजम’ तथा समरजीत सिंह ‘जलाल’ आदि हैं।


प्रेम नंदन- डॉ0 साहब, जनपद में गीत धारा का विकास आप कहाँ से मानते हैं? यहाँ के प्रमुख गीतकारों एवं उनकी कृतियों पर प्रकाश डालने की कृपा करें। 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- फतेहपुर में गीत उतने  ही पुराने सन्दर्भ में जायेगा जितना कविता का सन्दर्भ। भक्त, साधु-सन्तों में किसी वाद्य यन्त्रों के साथ भजनानंदी गीत गाने की अभिरुचि थी। ये काव्य शास्त्रीय छन्दों को सस्वर पढ़ते थे। हसवा के स्वामी चन्द्रदास के अन्तरापद के साथ लिखे हुए गीत मिलते हैं। वर्तमान धारा में मातादीन शुक्ल उनके पुत्र रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ ने गीतात्मक कविताएँ लिखीं। अंचल तो प्रगीत धारा के प्रमुख हस्ताक्षर ही हैं। इसके अलावा रामशरण शुक्ल, जगमोहन नाथ अवस्थी, सोहनलाल द्विवेदी, जीवन शुक्ल, दुलारे सिंह ‘वीर’, सुरेन्द्रपाल सिंह, सत्यपाल ‘सत्य’ आदि कवियों के गीत कवि मंचों पर सुनने को मिलते थे। गीत को अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित करने का श्रेय जनपद के पं0 रमानाथ अवस्थी को है।


प्रेम नंदन- वर्तमान समय में प्रमुख गीतकार कौन-कौन से हैं? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- प्रेम नंदन जी, वर्तमान समय में अनुसंधानकर्ता ने फतेहपुर के पाँच सौ से अधिक कवियों का नामोल्लेख किया है। यदि मैं यह मान लूँ कि इसमें आधे भी गीतकार होंगे तो नामों की संख्या से ही बहुत स्थान घिरेगा लेकिन कुछ नाम में आपको अवश्य बताऊँगा। सस्वर पढ़ने वाले और लिखने वालों में चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित’, धनंजय अवस्थी, देवदत्त आर्य ‘देवेन्द्र’, हरिप्रसाद शुक्ल ‘अकिंचन’, रहमत उल्ला नजमी, जानकी प्रसाद श्रीवास्तव ‘शाश्वत’, भइया जी अवस्थी ‘करुणाकर’, बृजमोहन पाण्डेय, चन्द्र कुमार पाण्डेय, रामलखन परिहार ‘प्रांजल’, शिवशरण सिंह चौहान ‘अंशुमाली’, रामसजीवन मिश्र, आनन्दस्वरूप श्रीवास्तव ‘अनुरागी’, रामेश्वर मौर्य, कृष्ण कुमार सविता, चन्द्रशेखर शुक्ल, विष्णु शुक्ल आदि जितने भी कवि हैं सभी लगभग 60वर्ष के आस-पास के हैं। नई पीढ़ी का नेतृत्व करने के लिए नये-नये हस्ताक्षर मंचों में आगे आ रहे हैं तथा उनके संकलन प्रकाशित हो रहे हैं। इनकी साहित्यिक अभिरुचि देखकर गीतधारा के प्रवाह में गति बनी रहने की आशा जगती हे। नई पीढ़ी के प्रमुख गीतकार, धर्मचन्द्र मिश्र कट्टर, समीर शुक्ल, अनिल तिवारी ‘निर्झर’, ज्ञानेन्द्र गौरव, शैलेष गुप्त ‘वीर’ प्रेम नंदन, प्रवीण श्रीवास्तव, बृजेन्द्र अग्निहोत्री, रक्षपाल पासवान आदि हैं।


प्रेम नंदन- जनपद में गीतकारों  की समृद्ध परम्परा के बीच नवगीत एवं नवगीतों की क्या स्थिति हैं? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- नंदन जी, जनपद में नवगीत सशक्त ढंग से लिखे जा रहे हैं लेकिन नवगीतकारों की संख्या बहुत कम है। प्रायः लोग मंचों पर अपने मध्यकालीन गीतों को नवगीत कहकर प्रस्तुत करते हैं। वस्तुतः नवगीत, गीत का कथ्य और शिल्प के स्तर पर नया रूप है और छोटी अन्तरा, अभिव्यक्ति में कसावट भाव की अप्रस्तुत और प्रतीक के माध्यम से कहा कहना इसकी विशेषता है। साथ ही समाज के परिवर्तनों के समानान्तर रेखांकित करना इसका प्रमुख लक्षण है। एक नवगीतकार के लिए उत्तर आधुनिकता की मानसिकता का होना बहुत जरूरी है। नवगीत का वर्तमान, आधुनिक भावबोध से जो अन्योन्याश्रित रिश्ता है उसका निर्वाह जनपद के एक मात्र साहित्यकार श्री श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी ने किया है। उनके अलावा धनंजय अवस्थी ने भी नवगीत लिखें हैं। इनके साथ-साथ इस समय वेदप्रकाश मिश्र, शिवशरण बन्धु, ज्ञानेन्द्र गौरव आदि कई रचनाकार इस दिशा में निरन्तर प्रयत्नशील हैं और नवगीतों की रचना करके इसकी अभिवृद्धि कर रहे हैं।


........क्रमशः

 *चूँकि कथा लेखन श्रमसाध्य विधा है और कवि प्रायः श्रमभीरू होते हैं : ~ डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी ( साक्षात्कार -3 )* 


प्रेम नंदन-  डॉ0 साहब, कहानी, नई कहानी और अकहानी में मूलभूत क्या अन्तर है? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- कहानी, नई कहान और अकहानी साहित्य जगत के इन पारिभाषिक कुनबों में वैसा ही अन्तर है जैसा पारम्परिक समाज, परम्पराओं से विघटित होता हुआ समाज और आज का समाज। मूलतः कहानी कथा शबद की आधुनिकता का स्थानापन्न रूप है, जिसका विकास लगभग सन् 1900 के आस-पास माना जाता है। इस समय प्रेम सागर, नासिकेतोपाख्यान, इंशा अल्ला की रानी केतकी की कहानी आदि रचनाओं ने अपने को प्रारम्भिक कहानी के रूप में स्थापित किया। यह प्रक्रिया बहुत दिनों तक धार्मिक आख्यानों, उर्दू की किस्सा गोई और संस्कृत के नाटकों की कथा-वस्तु को सम्मिलित रूप से कहानी के रूप में प्रस्तुत की जाती रही। यह कहानी मूल रूप में इतिवृत्तात्मक रही।


लेकिन सन् 1930 के आस-पास से कहानी इतिवृत्तात्मकता के साथ-साथ देश-काल के समस्या मूलक विषयों को भी जोड़ने लगी जो उस समय देश की आवश्यकता थी, यथा बाल-विवाह, देशद्रोह, अशिक्षा जैसी बुराईयों का खण्डन और नारी-शिक्षा, देश प्रेम, सम्बन्धों का निर्वाह, संयुक्त परिवार की अवधारणा का मण्डन करती रही। मोटे तौर पर विषय वस्तु और शैली को लेकर परिवर्तन होते रहे लेकिन संयुक्त परिवार की अवधारणा ने 1947 तक कहानी को कहानी ही बने रहने दिया। ज्यों-ज्यों संयुक्त परिवार की अवधारणा खण्डित होने लगी और गाँव तथा शहर एक दूसरे से सम्पर्क में आने शुरु हुए, इन नई परिस्थितियों को उद्घाटित करने के लिए नई कहानी का जन्म हुआ। इसके बाद शहरीकरण के जितने दूषित, कुरूप, असामाजिक मूल्य थे वे सब अकहानी के विषय वस्तु बन गये। जिसके कारण अकहानी पर अश्लीलता जैसे दाग भी देखे गये।


प्रेम नंदन- कहानियों से गाँव गायब होते जा रहे हैं और पंचसितारा संस्कृति के अनुरूप लिखी कहानियाँ आम आदमी से दूर होती जा रही हैं, ऐसे में किस्सार्गो और प्रेमचंद जैसे कहानीकारों की परम्परा की क्या प्रासंगिकता रह गई है?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- कहानी लेखन में पंचसितारा संस्कृति के हाबी होने में शहरों में उपलब्ध शिक्षा, व्यवसाय और प्रकाशन तीनों का बड़ा हाथ हैं। शहरी जीवन में ये तीनों लेखकों को आसानी से प्राप्त हो जाने के कारण ही साहित्य में शहरीकरण हावी होता गया और शहरीकरण बढ़ते-बढ़ते पंचसितारा संस्कृति तक पहुँच गया। ग्रामीण क्षेत्र से गये साहित्यकार भी अपने को ग्रामीण संस्कृति का जानकार मानने में आत्महीनता का अनुभव करने लगे। ग्राम्य संस्कृति को पहचानना बाबूपन के लिए बहुत भारी धब्बा हो गया। नगरों एवं महानगरों की सितारा संस्कृति में न केवल ग्रामीण जीवन बल्कि मनुष्य की ही पहचान खत्म हो गयीं इसीलिए कथा साहित्य में ग्राम्यांचल को लेकर पहचान बनाने वाले लेखक नहीं रहे और जो कुछ लिखा भी जा रहा है उसमें बनावटीपन की गंध है।


डा० ओमप्रकाश अवस्थी का साक्षात्कार लेते युवा रचनाकार भाई प्रेमनंदन


चूँकि हिन्दी का औसत पाठक और लेखक इस अति उच्च वर्ग का नहीं है जो अपने को उस पंचसितारा संस्कृति से जोड़ सके, इसलिए आज की पंचसितारा कहानियों एवं पाठक एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। रही बात प्रेमचंद के ग्रामीण जीवन की प्रासंगिकता की तो वह दो कारणों से बनी रहेगी। पहला तो यह कि कथा साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति का आंकलन करने के लिए ग्राम्यांचल की कहानियाँ ही दिग्दर्शक बनेंगी और दूसरा यह कि जिन आधारों और मूल्यों को उन्होंने अपने कथा साहित्य का आधार बनाया है वे आधार आगे किस प्रकार विकसित हुए, इसकी पहचान करायेंगे। जैसे झिंगुरी शाह से दस रुपये उधार लेकर उनकी अदायगी करने वाला होरी और आज के बैंकों में अपनी जमीन गिरवी रखकर ऋण लेने वाला किसान।


प्रेम नंदन- जनपद में कथा साहित्य के इतिहास पर संक्षेप में प्रकाश डालते हुए वर्तमान परिदृश्य को स्पष्ट करने की कृपा करें।


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- फतेहपुर जनपद में कथा साहित्य का सूत्रपात धार्मिक ग्रन्थों की टीकायें लिखने और ग्रामीण आंचलों में, परिवारों में, धार्मिक, उपदेशात्मक लोक कथायें कहने से हुआ। अधिकांशतः पौराणिक कथाओं को लोक भाषा में बदलने का काम यहाँ के साहित्यकारों ने किया। साहित्यिक मानदण्ड से जुड़े हुए कथाकार के रूप में सबसे पहला नाम लाला भगवानदीन ‘दीन’ का आता है। लाला जी ने लक्ष्मी पत्रिका के सम्पादन के माध्यम से छोटी-छोटी उपदेशात्मक एवं समाजोपयोगी तथा देश प्रेम से जुड़ी कहानियाँ लिखीं। उन्होंने एक छोटा सा उपन्यास भी लिखा। उनकी पत्नी बुन्देला बाला भी कहानियाँ लिखती थीं। कथा साहित्य का यह दौर आगे बढ़ा और राज बहादुर लमगोड़ा ने 1857 के समय के कथानकों को लेकर कुछ कहानियाँ लिखीं। उन्होंने रामकथा को छोटे-छोटे टुकड़ों में कहानीबद्ध करके लिखा। 


इस युग में रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, इकबाल बहादुर वर्मा, महावीरप्रसाद राय, गणेश शंकर विद्यार्थी, रामप्रसाद विद्यार्थी (रावी), जीवन शुक्ल, जीवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव (जीवन दद्दा), प्रयाग शुक्ल आदि साहित्यकार कहानी लिखते रहे। वर्तमान में श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी, महेन्द्रनाथ बाजपेयी, जयप्रकाश त्रिवेदी, डॉ0 बालकृष्ण पाण्डेय, शैलेष गुप्त, बृजेन्द्र अग्निहोत्री, प्रवीण कुमार श्रीवास्तव जैसे अनेक साहित्यकार कथा-साहित्य में अपना योगदान कर रहे हैं।


प्रेम नंदन- क्या कारण है कि जनपद में कविता के बरक्स गद्य लेखन नगण्य प्राय है? इक्के-दुक्के कहानीकार व उपन्यासकार दिखते हैं ऐसी स्थिति में इस विद्या का आप क्या भविष्य देखते हैं?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- जनपद में स्थापित कवियों, कवि सम्मेलनीय कवियों और उत्साह से प्रेरित होकर स्फुट कवितायें लिखने वालों की लम्बी सूची है लेकिन उसके अनुपात में कहानीकार दाल में नमक की तरह हैं। चूँकि कथा लेखन श्रमसाध्य विधा है और कवि प्रायः श्रमभीरू होते हैं, शायद इसलिए भी जनपद में कथा लेखन नगण्य प्राय है। दूसरा, यहाँ न तो कथा साहित्य के मंच बने और नहीं कथा साहित्य की गोष्ठियाँ सम्पादित हो सकीं, जिससे इस विधा का कुछ विकास हो सकता। यहाँ का जितना भी कथा साहित्य है वह शुद्ध रूप से पाठ्ष साहित्य रहा। इसके लेखन में जितनी तन्यमता और कई सम्बन्धों का संयोजन करने की आवश्यकता होती है वह साहित्यकारों से रम साध्य न हो सका। कथा साहित्य में जो जीवन की अन्तरंगता, सम्बन्धों के निर्वाह के साथ चलती है उतना क्रम करने वाले साहित्यकार कम हैं। एक और बहुत बड़ा कारण यह है कि कथा साहित्य के सामूहिक सम्मेलनों या कहानी लेखकों और कहानी स्रोताओं के संगठन नहीं बन सके। मुख्य रूप से कहानी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन तक सीमित रह गई और उसका सामान्य जन जीवन से सम्बन्ध न बनने के कारण कथा साहित्य का जनपद में समुचित विकास नहीं हो सका है।


प्रेम नंदन- डॉ0 साहब, जनपद के कथाकारों एवं उपन्यासकारों के योगदान पर प्रकाश डालने की कृपा करें।


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- इधर कुछ वर्षों से पत्र-पत्रिकाओं में छोटी कहानियाँ, लघुकथायें लगातार प्रकाशित हो रही हैं तो कुछ लम्बी कहानियाँ भी लिखी जा रही हैं। जनपद के कथाकार यदि इसी गति से लिखते और प्रकाशित होते रहे तो इस विधा के समृद्ध होने की काफी सम्भावनायें हैं। इसको आगे बढ़ाने के लिए कहानी का वाचन, श्रवण और उस पर कुछ श्रोताओं की प्रतिक्रियायें बहुत कारगर सिद्ध हो सकती हैं।


....क्रमशः 

 *अंग्रेजी के क्रिटिसिज्म के जिस अर्थ बोध के रूप में हम इसे प्रयोग करते हैं उस अर्थ में आलोचना शब्द बहुत व्यापक है जबकि क्रिटिसिज्म सीमित है। : ~ डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी (साक्षात्कार -4)* 


प्रेम नंदन-  डॉ0 साहब, फतेहपुर में शोध का इतिहास आप कब से मानते हैं और उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- शोध शब्द को शिक्षा जगत के जिस अर्थ-संकोच, अर्थ में ग्रहण किया जाता है वह एक प्रकार की उच्च शिक्षा का विषयवार संदर्भ है। हिन्दी, विश्वविद्यालय स्तर पर सर्वप्रथम बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में उच्च कक्षाओं में पढ़ाई जाने लगी और उसी के समानान्तर या समरूप सन्दर्भ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी इसका पठन-पाठन होने लगा। यह कार्य बीसवीं सदी के तीसरे दशक से प्रारम्भ हुआ। हिन्दी साहित्य का प्रथम शोध कार्य बनारस विश्वविद्यालय से ‘‘निर्गुण स्कूल ऑफ हिन्दी पोयट्री’’शीर्षक पर पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने किया और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रथम शोध प्रबन्ध रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ ने अलंकार शास्त्र पर ‘‘इवोल्यूसन ऑफ हिन्दी पोयटिक्स (हिन्दी के काव्य शास्त्र का विकास) शीर्षक से हिन्दी जगत का दूसरा, इलाहाबाद विश्वविद्यालय का पहला और फतेहपुर जनपद के साहित्यकारों में पहला शोध प्रबन्ध था।


प्रारम्भ में हिन्दी के ही नहीं, समस्त भाषाओं और सभी विषयों के शोध प्रबन्ध अंग्रेजी भाषा में ही लिखे जाते थे। इस प्रकार फतेहपुर जनपद में शोध का इतिहास ‘‘इवोल्यूसन ऑफ हिन्दी पोयटिक्स’’ से माना जाना चाहिए। पहले यह शोध कार्य उपाधि के रूप में ही किये गये। धीरे-धीरे शोध कार्य विश्वविद्यालय की अकादमिक उन्नति का एक आधार बन गया और सभी विश्वविद्यालयों में अपनी क्षमता अनुसार शोध कार्य कराना प्रारम्भ हुआ। 


शोध कार्य, आगे चलकर विश्वविद्यालयीय प्रोत्साहन के कारण भी प्रारम्भ हुआ। शोधकर्ता को उपाधि मिलने पर यदि वह इच्छुक है तो उसे दो अतिरिक्त वेतन वृद्धियाँ मिलती थीं और विश्वविद्यालय शोध प्रबन्ध के प्रकाशनार्थ अनुदान भी देता था। आगे चलकर इस कार्य को उच्च शिक्षा के मानक से जोड़ दिया गया और शोधकर्ताओं को नौकरी मिलने में कुछ वरीयता दी जाने लगी। आज की स्थिति में वह एक अनिवार्य उपाधि है और उसकी समकक्षता में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है। धीरे-धीरे इस उपाधि को लोभ-लालच में शोध कार्य का स्तर और उसकी व्यवस्था इतनी गिर गई है कि शोधकर्ता और शोध प्रबन्ध के बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध न के बराबर रह गये हैं और शोध कराना पूरी तरह से व्यवसायिक हो गया है। इस शोध कार्य के लिए विषय चयन प्राचीन से प्राचीनतम ग्रहण किया जाने लगा और नवीन से नवीनतम सन्दर्भ में छोटे आकार के शोध प्रबन्ध भी निकलने लगे। शोध कार्य का निर्देशक उस विषय का अधिकारी विद्वान होना अनिवार्य नहीं रह गया। वह केवल ऊपरी आवरण व तकनीक तक सीमित रह गया और शोधकर्ता धन के आधार पर उपाधियाँ अर्जित करने लगे।


प्रेम नंदन- क्या कारण है कि रचनाकार अपनी ऊपर हो रहे शोध कार्य से या तो उदासीन हैं या फिर शंकाग्रस्त? शोधार्थी के श्रम एवं मूल्यांकन को स्वीकार करने में हिचकिचाहट क्यों होती है?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- इस विषय में विश्वविद्यालय स्तर पर या शोध संस्थानों में दो प्रकार के कार्यक्रम हैं। कुछ विश्वविद्यालय ऐसे हैं जो जीवित रचनाकार एवं उसके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को लेकर शोध कार्य की अनुमति नहीं देते और कुछ विश्वविद्यालयों में इस विषय में छूट है। कोई भी रचनाकार यदि वह निर्वैयक्तिक रचनाकार है तो उसका रचनाशील बने रहना ही उसकी संतुष्टि का ध्येय है वह इस प्रपंच में नहीं पड़ता है कि उस पर कितने लोग कितनी तरह से कितनी विधाओं में क्या कर रह हैं? इसलिए वह अपने रचनाकर्म के प्रति जितना सतर्क, सावधान और समर्पित रहता है उतना वह शोधार्थियों के प्रवंचनापूर्ण प्रकरण से न केवल उदासीन रहता है बल्कि इसे उपेक्षा की दृष्टि से देखता है। रचनाकार की शोधार्थी के प्रति यह दृष्टि आत्म प्रचार और आत्म श्लाघा के साधन के रूप में लेना होता है तो दोनों ही एक दूसरे का विनाश करने वाले हैं और यदि शोधार्थी द्वारा किया गया मूल्यांकन तटस्थ है तो रचनाकार से बहुत अधिक सम्पर्कवान होना आवश्यक नहीं है। उसकी कृतियाँ ही शोधार्थी की मार्ग निर्देशक हैं।


शोधार्थी के श्रम का अस्वीकार इसलिए होता है कि वह एक दुकान से खरीद-फरोख्त जैसी करना चाहता है। मान लीजिए एक ऐसा रचनाकार जिस पर आप शोध कर रहे हैं वह जीवित है और उसने अपने जीवन के 30, 40, 50 वर्ष साहित्य सेवा में लगाये हैं शोधार्थी दो-तीन साक्षात्कारों में उसकी समस्त पूंजी को संकलित करके उससे बड़ा रचनाकार बन जाना चाहता है। इस सम्बन्ध में प्रकाशित कृतियाँ, उनका कार्यकाल, उन रचनाओं की प्रेरक भूमियाँ सब अलग-अलग होती हैं। वे कुछ उपलब्ध होती हैं कुछ अनुपलब्ध होती हैं। शोधार्थी के प्रति उदासीनता का मुख्य कारण उसके परिश्रम में समर्पण का आभाव होता है।


प्रेम नंदन-  कृपया समीक्षा और आलोचना में अन्तर स्पष्ट करने की कृपा करें और यह भी बतायें कि इस विधा का क्या महत्व है? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी-  काव्य शास्त्र या आलोचना जगत में ये दोनो शब्द लगभग पर्यायवाची हो गये हैं लेकिन मूलतः यह पर्यायवाची होते हुए भी उनके प्रभाव और व्युत्पत्ति में काफी अन्तर है। आलोचना शब्द का प्रयोग होते-होते इतना अर्थ संकोच हो गया है कि वह व्यवहार में मात्र निन्दावाचक शब्द माना जाता है और इस शब्द का सबसे अधिक अवमूल्यन राजपुरुषों ने एक दूसरे की नीतियों, सिद्धान्तों को नीचा दिखाने के लिए किया। साहित्य जगत का यह शब्द राजनीति में गया और वहाँ जाकर विकृत हो गया।


वस्तुतः अंग्रेजी के क्रिटिसिज्म के जिस अर्थ बोध के रूप में हम इसे प्रयोग करते हैं उस अर्थ में आलोचना शब्द बहुत व्यापक है जबकि क्रिटिसिज्म सीमित है। किसी विषय को सम्यक रूप से उसके दृष्टिकोण से आगे उसके परिवेशगत सन्दर्भ से जानना, पहचानना, देखना और फिर प्रस्तुत करना आलोचना का कार्य है। सामाजिक दशा में  काव्य शास्त्र के मूल्यों को लोक कल्याणकारी मूल्यों से देखना ही एक सफल आलोचक का काम होता है न कि किसी घोड़े की तरह अपनी पीठ से मक्खियाँ उड़ाना। अंग्रेजी साहित्य में आलोचकों की इतनी निन्दा की गयी है कि उन्हें भूसे के ढेर से छांटे हुए गेंहूँ का पुरस्कार दिया गया है। जबकि भारतीय साहित्य में उसे ऋषि तुल्य माना गया है और उसे आंगन में रहने की स्वीकृति प्रदान की गई है।


समीक्षा, आलोचना का पारिवारिक शब्द है। व्याख्यात्मक और शास्त्रीय आलोचना के अन्तर्गत किसी रचनाकार की उपलब्धियों की सराहना उसके दृष्टिकोण को पहचानना और आलोचक और रचनाकार को साधारणीकरण के स्तर पर एक पंक्ति में ले आना ही समीक्षक का दायित्व होता है। समीक्षक उतना विस्तारवान नहीं होता जितना कि आलोचक। साहित्य के लिए समीक्षा और आलोचना का वैसा ही महत्व है जैसा पेड़ लगाना और उसके फलों का अस्वादन करना और किसी रचनाकार के किसी काल में उसके बाद में एक लम्बी दीर्घावधि के लिए स्थापित करना इसी शास्त्र के द्वारा सम्भव है।


प्रेम नंदन-  जनपद में समीक्षा की एक समृद्ध परम्परा रही है, इसी वर्तमान स्थिति क्या है? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी-  फतेहपुर जनपद में समीक्षा की जो साहित्यिक परम्परा मिलती है उसमें आपके द्वारा यह माना जाना कि वह समृद्ध रही है मैं भी अपनी स्वीकृति देता हूँ। यह हमारे संशाधनों और साहित्य के प्रति हमारी उपेक्षाओं का परिणाम है कि हम इस भूखण्ड का जिसे आप फतेहपुर कहने लगे हैं बहुत दूर तक अतीत खोज नहीं पाये हैं। हम लोग अधिकतम सोलहवीं शताब्दी तक जा पाते हैं। उसके पहले का जो साहित्य है उसे हम क्रमबद्ध करके प्रकाश में नहीं ला पाये हैं। 


काव्य शास्त्र के आचार्यों  में इस जनपद के नामों में पहला नाम करनेस बन्दीजन का मिलता है यह अकबर (1556-1605) के दरबारी साहित्यकार थे और इनके द्वारा लिखे गये तीन अलंकार ग्रन्थ प्राप्त होते हैं-कर्णाभरण, श्रुति भूषण और भूप भूषण। ये ग्रन्थ शिव सिंह के पास होने का अनुमान होता है क्योंकि उन्होंने सरोज-सर्वेक्षण में इनका उल्लेख किया है। कृपाराम और चिन्तामणि का नाम कार्यकाल के अनुसार करनेस बन्दीजन के बाद आता है। ऐसा लगता है कि शीर्षकों के माध्यम से अलंकार, नायक-नायिका भेद और संस्कृत के जयदेव तथा कुबलयानन्द के ग्रन्थों का प्रभाव उन पर पड़ा है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि जिस भक्तिकाल और रीतिकाल के बीच में करनेस बन्दीजन का नाम आता है और अकबरी दरबार के कवियों में गणना होती है वह मात्र संस्कृत ग्रन्थों की अनुवादित उद्धरणी नहीं रहा होगा क्योंकि भूप भूषण कृति का नाम इस बात का संकेत करता है कि यह पारम्परिक अलंकारवादी ग्रन्थों से अलग हटकर होना चाहिए। 


लगभग 300 वर्षों तक काव्य शास्त्रों का कई प्रकार का काम होता रहा संस्कृत ग्रन्थों के अनुसार भाषा छन्दों का निर्माण, अलंकार ग्रन्थ, नायक-नायिका भेद, टीकाकरण, ऋतु वर्णन, रस वर्णन। एक दो आचार्यों ने व्यंजना व्यापार से जुड़कर व्याकरण के ग्रन्थों की भी रचना की और अगर फतेहपुर जनपद की धरती से जुड़े हुए इन 300 वर्षों के साहित्यकारों को अलग करके रखा जाये तो किसी भी प्रान्त में इतने आचार्य एक साथ इस अवधि में नहीं मिलेंगे। ये साहित्यकार ज्यादातर असनी, असोथर, हसवा, एकडला, खजुहा आदि स्थानों के रहे हैं।


सन् 1850 में इस धारा में कुछ परिवर्तन आना प्रारम्भ हुआ और यह परिवर्तन केवल फतेहपुर के साहित्यकारों में नहीं था बल्कि एक वर्ण्य विषय में ही परिवर्तन हो रहा था। इन लोगों में तीन प्रमुख लोगों के नाम मैं लेना चाहूँगा- पुरन्दर राम त्रिपाठी, सेवक बन्दीजन और लाला भगवानदीन ‘दीन’।


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी


फतेहपुर जनपद ही नहीं सम्पूर्ण हिन्दी आलोचना जगत के रीतिबद्ध परम्परा को आधुनिक परिस्थितियों से जोड़ने का काम लाला जी ने ही किया। देश प्रेम और वीररस को उस युग में प्रमुख स्थान देकर लाला जी भारतेन्दु युगीन साहित्यकारों के रथवाहक हुये। उन्होंने हिन्दी के भक्तिकालीन और रीतिकालीन कवियों पर टीका साहित्य लिखकर इतना बड़ा काम किया जो उस समय कोई भी साहित्यकार नहीं कर सका। पाठकों के सिर पर चढ़ा केशव का प्रेत झाड़ने का मन्त्र लाला जी ने ही दिया। देव और बिहारी के मल्ल युद्ध में लाला जी ने भी अपने खम ठोंके। हिन्दी शब्द सागर के निर्माण में लाला जी ने बहुत योगदान दिया और उस समय के राष्ट्रीय आन्दोलन से लाला जी आजीवन जुड़े रहे।


लाला जी के बाद फतेहपुर से एक बहुत ही कीर्तिवन्त नाम उभरकर सामने आया वह है- राजबहादुर लमगोड़ा का। इन्होंने रामचरित मानस को विश्व की सर्वश्रेष्ठ कृति सिद्ध किया और उस समय उन अंग्रेज विद्वानों के सामने जो शेक्सपियर को ही सर्वश्रेष्ठ मान रहे थे उनकी मान्यता को खण्डित किया। लमगोड़ा अंग्रेजी साहित्य के उस समय के स्वर्णपदक विजेता थे व प्रारम्भ में अंग्रेजी का अध्यापन कर चुके थे और फतेहपुर में राजस्व के प्रतिष्ठित अधिवक्ता थे। उन्होंने एक किताब लिखी थी जो प्रशासनिक कार्यों की बड़ी मद्दगार थी। उन लमगोड़ा जी को ऐसा राम रस लगा कि वह अध्यापकी वकालत सभी कुछ छोड़कर राममय हो गये। उन्होंने रामचरित मानस में श्रंगार, हास्य, करुण रस के तीन खण्ड लिखे और विश्व साहित्य में रामचरित मानस नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा जिसे नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने प्रकाशित किया। 


बड़े खेद का विषय है कि लमगोड़ा जी का नाम शुक्ल जी के हिन्दी साहित्य के इतिहास में नहीं है। जबकि महावीर प्रसाद द्विवेदी के कई प्रशंसा पत्र लमगोड़ा जी की विवरिणका में प्राप्त हैं। लमगोड़ा जी के बाद आलोचना साहित्य को डॉ0 रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ जी ने समृद्ध किया। इन्होंने रत्नाकर के ‘उद्धव शतक’, हरिऔध के ‘प्रिय प्रवास’ की महत्वपूर्ण भूमिकायें लिखीं। ये ब्रजभाषा के प्रशंसक और उसका सर्वोच्च स्थान मानने वाले आचार्य थे। इन्होंने रत्नाकर की तर्ज पर उद्धव ब्रजांगना नामक एक बड़ा काव्य लिखा। आलोचना शास्त्र का इन्होंने काव्य पुरुष शीर्षक से एक शास्त्र लिखा। इन्होंने भी हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा। इनका शोध प्रबन्ध ‘अलंकार पियूष’ दो भागों में प्रकाशित हुआ है। 


इस कड़ी में आगे चलकर डॉ0 विपिन बिहारी त्रिवेदी ने ‘पृथ्वीराज रासो’ जैसे विवादित ग्रन्थ पर कलकत्ता विश्वविद्यालय से अपना शोध प्रबन्ध लिखा। फिर यह आलोचना और शोध कार्य की प्रक्रिया निरन्तर बढ़ती रही और यहाँ के आचार्य और विद्यार्थी विभिन्न विश्वविद्यालयों में अपनी जिज्ञासा समाधान के लिए कार्यशील बने रहे।


प्रेम नंदन- डॉ0 साहब, आप हिन्दी जगत के मूर्धन्य आलोचक हैं। कृपया अपने योगदान एवं वैशिष्ट्य को रेखांकित करें?


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी-  इस प्रश्न का उत्तर मुझे न देना चाहिए क्योंकि वह कुटिल और भोंडी आत्म प्रशंसा होगी। सरस्वती के विग्रह पर कर्म के यथाशक्ति दो पुष्प चढ़ाता रहा हूँ। यही मेरा साहित्यिक योगदान है। जितने विशेषण लगाकर लोग सम्बोधित करते हैं वह सरस्वती के भण्डार के शब्दों का दुरुपयोग करते हैं और मेरा उपयोग करते हैं।


प्रेम नंदन- क्या कारण है कि शोध के नाम पर लोग श्रम करने से कतरा रहे हैं और चर्वित-चर्वण तथा पिष्ट-पेषण से संतुष्ट हुये जा रहे हैं? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी-  इसका व्यावहारिक पक्ष बहुत ही अश्लील और दूषित है। शोध कराने वाले निदेशक शोधार्थी से अधिकतम धन संग्रह कर लेना चाहता है और शोधार्थी रूपये के बल पर शोध कार्य की बेगार से बचना चाहता है। समाज की इस नई रचना से विश्वविद्यालय स्तर का प्राथमिक पंजीकरण करने वाले क्लर्क से लेकर उपाधि देने वाले तक इस लम्बी जंजीर में बहुत खोट है और चूँकि मैं जिस समय का शोधार्थी हूँ उस समय की व्यवस्था और प्रक्रिया अब पूरी तरह बदल चुकी है। इसलिए विश्वविद्यालय भी ऐसे लोगों से दूरी बनाते हैं जो कुछ सार्थक और अच्छा कार्य करना चाहते हैं। आज विश्वविद्यालीय वातावरण पूरी तरह से घृणित है।


प्रेम नंदन- प्रकाशन की वर्तमान स्थिति में आप शोध ग्रन्थों एवं शोध पत्रों का क्या भविष्य देखते हैं? 


डॉ0 ओऽमप्रकाश अवस्थी- शोध कार्य और प्रकाशन यह दो विभिन्न स्तरों के सामाजिक वर्गों का संगठन है। प्रकाशक पूरी तरह व्यवसायी है और शोध का प्रकाशन चाहने वाला अपने कृतित्व का प्रकाशन चाहता है। आज के संदर्भ में स्थितियाँ पूरी तरह से बदली हुई हैं। बड़े-बड़े आलीशान भवनों में छात्र शून्य विश्वविद्यालय चल रहे हैं और औजीदार अध्यापक पढ़ा रहे हैं। 


सरकार शिक्षा विभाग पर यूनेस्को की मदद से इतना रूपया बाँट रही है कि अगर वह प्रकाशन में लगा दिया जाय तो शोध ग्रन्थों एवं शोध पत्रों की कमी पड़ जायेगी। सरकार अनुसंधान करने के लिए दो-तीन वर्ष का अवकाश देती है। ज्ञानात्मक ऊर्जा को बनाये रखने के लिए प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करती है। प्रकाशन के लिए पूँजी देती है और अच्छा ईर्ष्याप्रद वेतनमान देती है लेकिन बौद्धिक वर्ग तथाकथित अध्यापक वर्ग मकान, गाड़ी और फैशन के चक्कर में इतना तल्लीन है कि दो-तीन घण्टे में सौ कापियां जांच कर अपनी विद्वता झाड़ता है और विद्यार्थियों के साथ अन्याय करता है। इधर 20-25 वर्षों से किसी अध्यापक के द्वारा लिखी गयी कोई कृति लोक चर्चा में आयी हो ऐसी जानकारी मुझे नहीं है। जब शिक्षा विभाग में धन नहीं था तो ज्ञान भरपूर था लेकिन आज जब धन है तो ज्ञान का लोप हो गया है।


समाप्त!


शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

kunwar ravindra

रंगों और शब्दों का अद्भुत कोलाज हैं कुंवर रवीन्द्र के चित्र 



समय की विद्रूपताओं और त्रासद यथार्थ को   अपनी तुलिका से चित्रित करने वाले, कुंवर रवीन्द्र अपने समय के विलक्षण कलाकार हैं | वे रंग और रेखाओं के सयोंजन से जीवन की संभावनाओं को जिंदा रखने और उन्हें संबल प्रदान करने वाले चित्रकार हैं  | उनके चित्रों में सर्वत्र दिखाई देने वाली एक  चिड़िया  उनकी इन्ही  प्रतिबद्धताओं का प्रतीक है | उन्होंने अब तक १७००० से ज्यादा चित्र बनाये हैं और वर्तमान की लगभग सभी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के आवरण में उनके बनाये चित्र दिखाई देते हैं | लगभग सभी प्रकाशन समूहों से हर साल प्रकशित सैकड़ों किताबों के कवर उनकी तूलिका से बने होते  हैं | शायद ही कोई ऐसा रचनाकार होगा जिसकी कविताओं पर उन्होंने चित्र न बनायें हों | उनके द्वारा बनाये गए विभिन्न कविता पोस्टरों में जब रंगों के साथ शब्दों की जुगलबंदी होती है तो कविता और चित्र दोनों का प्रभाव बहुगुणित हो जाता है | शब्दों में निहित ताप जब कैनवास पर रंगों को तपाता है तो मानो कविता में बिम्ब खिल-खिल उठते हैं और उनकी तपिश को बाखूबी महसूस किया जा सकता है |

 रवींन्द्र जी इतने सहज और सरल हैं कि बड़े और अपने समकालीन रचनाकारों के साथ-साथ वे नवोदित रचनाकारों की कविताओं पर भी चित्र बनाते हैं | हाँ , एक बात जरूर है कि ऐसा वे अपनी शर्तों पर ही करते हैं |  उनकी अब तक दर्जनों एकल एवं सामूहिक चित्र प्रदर्शनी देश के विभिन्न शहरों में लग  चुकी हैं वे कैनवास पर रंगों के माध्यम से कविता जैसे सहज और ग्राह्य चित्र बनाने वाले चित्रकार हैं | वैसे तो उनकी पहचान एक चित्रकार के रूप में ज्यादा है लेकिन वे जितने अच्छे चित्रकार हैं उतने ही बड़े कवि भी हैं | ये अलग बात है कि उनकी प्रसिद्धि एक चित्रकार के रूप में ज्यादा है | 



एक चित्रकार और कवि के रूप में मैं उनके नाम से तो काफी पहले से परिचित था लेकिन उनसे साक्षात मिलने का अवसर मिला लोक विमर्श -२०१५ के पिथौरागढ़ के लोक विमर्श शिविर में | लोक विमर्श -२०१५ के सात दिवसीय लोक विमर्श शिविर की शुरुआत ही कुंवर रवीन्द्र की एकल चित्र प्रदर्शनी से हुई | ०८ जून २०१५ को पिथौरागढ़ में पहाड़ी स्थापत्य कला में निर्मित एक होटल “बाखली “ के एक विस्तृत हाल में रवीन्द्र जी की तूलिका से  सजे चित्र एवं कविता पोस्टर प्रदर्शनी को देखना –समझना मेरे लिए एक रोमांचकारी अनुभव था| इस प्रदर्शनी में उनके ६० कविता पोस्टर लगाए गए थे जिनमे धूमिल , मुक्तिबोध , नागार्जुन , रघुवीर सहाय , शील , मानबहादुर सिंह , केशव तिवारी ,नवनीत पाण्डेय , महेश पुनेठा , सहित हिंदी के तमाम कवियों की कविताएँ रवींद्र जी के कविता पोस्टरों में जीवन के विविध रंग बिखेर रहीं थीं उनके चित्रों में चित्रित विभिन्न कवियों की कवितायें जीवन के कुछ अलग ही तेवर दिखा रहीं थीं |


इस प्रदर्शनी के बाद अगले पूरे सप्ताह भर हम लोगों को उनके साथ रहने – बतियाने का मौका मिला | जैसे ही समय मिलता हम लोग उनको घेर लेते और उनके चित्रों के बारे में उनसे बात करते | वे मुस्कुराते हुए बड़े धैर्य से हम लोगों की बातें सुनते और हमारी शंका का समाधान करते | इस दौरान हमें कभी ऐसा नहीं लगा कि की हम इतने बड़े चित्रकार से बातें कर रहे हैं |  हम बच्चों के साथ उनका मित्रवत व्यवहार उनके बड़प्पन को और गरिमा प्रदान करता रहा और हम लोगों की नजरों में वे और सम्मानीय हो गए |  रवींद्र जी  रिस्तो में नजदीकी के साथ-साथ एक सम्मानित दूरी बनाए रखने वाले एक बेहद ही सहज और सरल इंसान हैं |  इस मामले में उनकी कविताओं, चित्रों और व्यक्तित्व में रत्ती भर का भी अंतर नहीं हैं | जैसा सहज , सरल उनका व्यक्तित्व है वैसी ही उनकी कविताएँ और उनके चित्र | वे अपने चित्रों में रंगों से कवितायें लिखते हैं और अपनी कविताओं में शब्दों से चित्र उकेरते हैं | वैसे तो उनकी पहचान एक चित्रकार के रूप में ज्यादा है लेकिन रवीन्द्र जी एक बेहतरीन कवि भी हैं | वे प्रायः अपनी कविताओं पर कम बात करते हैं लेकिन जब उनकी कवितायें उनके बनाए पोस्टरों में चित्रित होती हैं तो यह सामंजस्य का एक ऐसा अद्भुत कोलाज बनता हैं कि कविता चित्र बन जाती हैं और चित्र कविता | आइए उनके इस अद्भुत कोलाज को हम भी महसूस करें .... . 

शनिवार, 27 मई 2023

मैं क्यों लिखता हूँ

मैं क्यों लिखता हूँ ---final
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‘To make people free is the aim of art, therefore art for me is the science of freedom.’
-Joseph Beuys (1921-1986)
(one of the most influential sculptors and performance artists of the 20th century) 

मैं क्यों लिखता हूँ? यह एक ऐसा सवाल है जिससे प्रत्येक रचनाकार को कभी न कभी दो-चार होना ही पड़ता है। कभी दूसरे यह सवाल पूछते हैं तो कभी रचनाकार स्वयं से यह सवाल पूछने पर मजबूर होता है। देखने में बहुत सरल लगने वाले इस सवाल का उत्तर देना हर रचनाकार के लिए हमेशा ही मुश्किल रहा है।

मैं अपने लेखन की बात करूं तो जब मैं लिखने के कारणों की ओर झाँकने का प्रयास करता हूँ तो कई प्रश्न एक साथ सामने आ खड़े होते हैं- आखिरकार मैंने लिखना कैसे और क्यों शुरू किया?
साहित्य का मेरे घर-परिवार से दूर-दूर तक कहीं कोई रिश्ता नहीं था तो फिर मुझमें लेखन के संस्कार कहाँ से आए? 

बचपन के गलियारों में लौटने पर कई चीजें स्पष्ट हो जाती हैं, बातें शुरूआत की ओर पहुँच जाती हैं।
लिखने के शुरुआती बीज मेरे मष्तिष्क में शायद अम्मा की लोरियों ने बोए होंगे, कविता के प्रति लगाव शायद अम्मा के गाने-गुनगुनाने की आदत से पैदा हुआ होगा। अम्मा के पास लोकगीतों और कहानियों का अकूत भंडार है। 

उन दिनों अम्मा गांव और रिश्तेदारी में एक अच्छी गउनहर के रूप में प्रसिद्ध थी और विभिन्न तीज-त्योहारों और शादी-ब्याह के अवसरों पर लोग उनको इसी गुण के कारण विशेष रूप से आमंत्रित करते थे।

अम्मा अब भी हमेशा कुछ ना कुछ गाती-गुनगुनाती रहती हैं। बचपन में मुझको नींद तभी आती थी जब अम्मा मीठे स्वर में लोरियां सुनाती थी और सुबह उनकी गुनगुनाने की आवाज सुनकर ही आंखें खुलती थीं। दरअसल अम्मा हमारे सोने के बाद ही सोती थी और हमारे जागने के पहले जाग जाती थी और वे घरेलू कार्य करते समय भी प्रायः गाते-गुनगुनाते हुए ही करती थीं, अब भी उनकी यही दिनचर्या है। यह उस समय की लगभग सभी घरेलू महिलाओं की नियमित दिनचर्या होती थी।

अम्मा की लोरियों के पंखों पर सवार होकर जब मैं स्कूल गया तो वहां भी मेरा परिचय सबसे पहले कविता यानी स्कूल में गाई जाने वाली प्रार्थना से  हुआ। हिंदी की किताब में पहला पाठ भी कविता ही था। अम्मा से मिले संस्कारों के कारण बचपन में कविताएँ मुझे शीघ्र ही याद हो जाया करती थीं शायद यही कारण रहा है कि मुझे अपनी किताब की सभी कविताएं याद रहती थीं और मैं उन्हें अक्सर गुनगुनाया करता था।

इस तरह गीतों और कविताओं के प्रति मैं बचपन से ही लगाव महसूस करता था लेकिन कविता या और कुछ लिखने के बारे में तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद जब मैं आगे की पढ़ाई के लिए शहर आया तो जहाँ मैं किराए पर रहता था उससे कुछ दूरी पर एक राजकीय पुस्तकालय और राजकीय छात्रवास अगल-बगल स्थित थे। मेरे कई सीनियर और परिचित साथी राजकीय छात्रवास में रहते थे और अखबार, पत्रिकाएं पढ़ने के लिए रोजाना राजकीय पुस्तकालय जाते थे । मैं भी उन्ही के साथ पहले तो प्रायः रविवार और फिर नियमित रूप से लाइब्रेरी जाने लगा था लगा। वहाँ पर कई अखबार, प्रतियोगी पत्रिकायें, साहित्यिक पत्रिकाएं आती थीं। वहीं पहली बार अखबारों और पत्रिकाओं से दोस्ती हुई। उस समय 'संपादक ने नाम पत्र' जैसे कॉलम लगभग सभी अखबारों में होते थे। 

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों कर रहे कई सीनियर साथी संपादक के नाम पत्र लिखते थे और जब वे अखबारों में प्रकाशित होते थे तो बड़े गर्व से हम सबको दिखाते थे कि देखो-मेरा लिखा हुआ अखबार में छपा हैं। उस समय यह देखना काफी रोमांचक अनुभव हुआ करता था। तो इसी की देखा-देखी मैंने भी एक दिन एक पोस्टकार्ड पर विभिन्न सब्जियों की खेतीबाड़ी में प्रयोग होने वाले कीटनाशक दवाओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर एक पोस्टकार्ड में कुछ लिखा और उसे पोस्टबॉक्स में डाल आया और फिर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया। लगभग एक हफ्ते बाद वह पत्र कानपुर महानगर से प्रकाशित होने वाले एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अखबार के 'संपादक के नाम पत्र' वाले कॉलम में अपने लिखे शब्दों को छपा हुआ देखकर सचमुच आँखों में आँसू आ गए थे। उस घटना के बाद पत्र लिखने का एक सिलसिला ही चल पड़ा। साथियों के साथ खूब पत्र लिखे जाते, कुछ छपते, कुछ न छपते, लेकिन अब इस बात की परवाह न करते हुए जब भी समय मिलता, खूब पोस्टकार्ड लिखे जाते, पोस्ट किए जाते।

हम जिस राजकीय पुस्कालय में पढ़ने जाते थे, शहर में मेरे जैसे तमाम गँवई लड़कों के लिए एकमात्र अड्डा था। यह पुस्कालय जिला विद्यालय निरीक्षक के आधीन था । वहाँ पर सिर्फ एक लाइब्रेरियन और एक चपरासी नियुक्त था। दोनों बहुत मक्कार थे। समय से लाइब्रेरी न खोलना, जल्दी बन्द कर देना , मेम्बरशिप लेने के बावजूद किताबें इश्यू करने में आनाकानी करना, विभिन्न मासिक पत्रिकाओं को पहले अपने घर ले जाना फिर हफ़्ते दो हफ्ते बाद लाइब्रेरी लाना जैसी अनेक करतूतों से  से हम सभी पढ़ने वाले छात्र परेशान रहते थे। हम लोग आए दिन लाइब्रेरियन और चपरासी की शिकायत जिला विद्यालय निरीक्षक से करते, लेकिन उनकी आदतें सुधरने का नाम ही नहीं ले रहीं थी। इन सबसे परेशान होकर हम लोगों ने लाइब्रेरी की समस्याओं और लाइब्रेरियन और चपरासी की शिकायत के रूप में कई पोस्टकार्ड विभिन्न स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों को भेजे। इन शिकायती पत्रों को कई अखबारों ने प्रकाशित किया। जिनमें से कई साथियों के पत्रों के साथ मेरा लिखा शिकायती पत्र भी प्रकाशित हुआ। कुछ स्थानीय अखबारों ने इसे खबर के रूप में छापा। अखबारों में प्रकाशित होने के कारण यह एक बड़ा मुद्दा बन गया, जिसकी आँच जिला विद्यालय निरीक्षक तक पहुँची। उन्होंने इन खबरों को संज्ञान में लेते हुए एक दिन छात्रों के हमारे ग्रुप को अपने ऑफिस में बातचीत के लिए बुलाया। वहाँ पर उन्होंने बड़े ध्यानपूर्वक हमारी शिकायतें सुनी और लाइब्रेरियन व चपरासी को फटकार लगाते हुए आइंदा से नियमानुसार कार्य करने की चेतावनी दी।

जिला विद्यालय निरीक्षक महोदय ने हम लोगो से उन पत्रिकाओं और अखबारों की सूची मांगी, जो हम लोग पढ़ना चाहते थे, लेकिन लाइब्रेरी में नहीं आते थे। उन्होंने उन पत्रिकाओं, अखबारों की लाइब्रेरी भिजवाने की व्यवस्था की। जिसके बाद लाइब्रेरी की व्यवस्था में काफी सुधार हुआ।

इस घटना के बाद पहली बार मुझे शब्दों की ताकत का एहसास हुआ और उसी क्षण मैंने शब्दों से दोस्ती कर ली। अखबारों और प्रतियोगी पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़ाव और गहरा हुआ। 

इसी दौरान किसी पत्रिका या किताब में (ठीक से याद नहीं आ रहा) जब मैंने अज्ञेय की 'छंदमुक्त' कविता 'हिरोशिमा' पहली बार पढ़ी तो अचानक ही दिमाग में यह विचार बिजली की तरह कौंधा कि इस तरह की कविता तो मैं भी लिख सकता हूँ। एक यह महज एक विचार ही था। मैं उस क्षण एक पंक्ति भी नहीं लिख सका।

इसके दो-तीन महीने बाद ही, जहाँ मैं रहता था , वहीं पड़ोस में एक दुर्घटना घट गई, एक नवब्याहता को जिंदा जला दिया गया। इस दुर्घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया और मेरे दिमाग को बहुत उद्देलित और बेचैन किया। यह बेचैनी कई दिनों तक दिमाग को मथती रही। अन्ततः एक दिन इस बेचैनी से मुक्ति पाने के लिए इसे शब्दों में ढालने के प्रयास में डायरी और पेन लेकर लिखने बैठ गया। उस दिमाग मे पहले से पढ़ी हुई अज्ञेय की कविता 'हिरोशिमा' पूरी तरह हावी थी और उसी से प्रेरित होकर कागज पर एक कविता जैसा कुछ लिख डाला। यह मेरी पहली साहित्यिक रचना थी। कविता का शीर्षक रखा - 'अतृप्त इच्छाओं की वेदी'। 

संयोग से वह कविता एक स्थानीय साप्ताहिक पत्र में छप भी गई। इससे उत्साहित होकर  कुछ और कविताएँ, गीत और लघुकथाएँ लिखीं जो विभिन्न स्थानीय साप्ताहिक पत्रों और दैनिक अखबारों की रविवासरीय परिशिष्ट में छपीं। इस तरह लेखन का सिलसिला शुरू हुआ।

जब स्थानीय साप्ताहिक और दैनिक अखबारों में कुछ कविताएं, गीत लघुकथाएँ प्रकाशित हुईं तो पत्रकारिता करने का भूत सवार हुआ। इसी क्रम में अपने शहर के विभिन्न स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों के ऑफिसों के चक्कर शुरू हुए और इसी दौरान पढ़ाई के साथ-साथ एक स्थानीय हिंदी दैनिक अखबार में विधिवत पत्रकारिता की शुरुआत हुई और कविता, गीत, लघुकथा के साथ-साथ  विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेख लिखने लगा।

लेखन के इन विभिन्न चरणों से गुजरते हुए आज भी जब इस सवाल का सामना होता है तो कोई सटीक जवाब नहीं सूझता है। फिर भी कभी दूसरों को तो कभी खुद को जवाब देना ही पड़ता है।

मेरे पास लिखने का कोई एक निश्चित कारण नहीं है बल्कि बहुत सारे कारणों का एक समुच्चय है, जिनके लिए लिखना पड़ता है। कभी संपादकों और मित्रों के आग्रह पर भी लिखना पड़ता है तो कभी किसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए भी लिखना पड़ता है। अखबारी लेखन पैसों के लिए करना पड़ता है।

इस तरह लिखने का एक अन्य प्रमुख कारण अन्याय, झूठ, पाखण्ड, अंधविश्वास, हिंसा, नफरत, साम्प्रदायिकता, सामाजिक असमानता से उत्पन्न बेचैनी, घुटन और संत्रास को अभिव्यक्ति देने और इनसे मुक्ति पाने की छटपटाहट ही है। 

मेरे लिखने का एक और कारण मानवता के प्रति एक समर्पित पक्षधरता है। मैं 'जो जैसा है' से संतुष्ट नहीं होता बल्कि वर्तमान में 'कैसा होना चाहिए' इसके लिए शब्दों की कुदाल से समय की जड़ता को तोड़ने का प्रयास करता रहता हूँ। मैं इसलिए लिखता हूँ कि मेरे लिखे शब्द किसी की आवाज बन सकें। किसी को सांत्वना दे सकें। किसी को उसके डरावने वर्तमान और अंधेरे भविष्य से मुक्ति दिला सकें।

ग्रामीण परिवेश में जन्मा, पला-बढ़ा होने के कारण और  ग्रामीण अंचल में ही कार्यरत होने के कारण मैं लोगों के सुख-दुख, संघर्ष, जिजीविषा, घुटन.. मेरी रचनाओं में अनायास ही आते रहते हैं। 
मानव-जीवन की, उसके परिवेश की जड़ता को तोड़कर कष्टमय वर्तमान और अनिश्चित भविष्य की राह को आसान बनाने की इच्छा ही मेरे लेखन का मूल उद्देश्य है।

प्रसिद्ध साहित्यकार कमलेश्वर ने भी कहा था कि लेखन में ही मुक्ति है। कला का हर रूप यही चाहता है। लिखना भी एक कला है और लेखन का उद्देश्य भी मुक्ति की कामना ही है। इसलिए जब अन्याय, झूठ, पाखण्ड, अंधविश्वास, हिंसा, नफरत, साम्प्रदायिकता, सामाजिक असमानता से उत्पन्न स्थितियां मानव जीवन को 
दुखी करती हैं, झकझोरती हैं तो इन सबसे मुक्ति के लिए उन अनुभूतियों को शब्दों में ढालकर, उन संवेदनाओं को दूसरे लोगों तक, ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए लिखता हूँ। क्योंकि बोलकर, भाषण देकर अपनी बातों को लोगों तक संप्रेषित करने के विकल्प सीमित हैं, और इसमें एक तरह का संकोच भी आड़े आ जाता है, इसलिए लिखकर अपनी बातें लोगों तक संप्रेषित करना ज्यादा बेहतरीन विकल्प है, और मैं इसीलिए लिखता हूँ।

* प्रेम नंदन
शकुन नगर, सिविल लाइंस
फतेहपुर (उ0प्र0)
मो0 : 09336453835
ईमेल : premnandanftp@gmail.com

रविवार, 26 फ़रवरी 2023

दिल्ली की सेल्फी

समकालीन कविता का महत्वपूर्ण दस्तावेज : दिल्ली की सेल्फी कविता 
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विशेषांक 2017
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लड़ना था हमें 
भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ
हम हो रहे थे एकजुट
आम आदमी के पक्ष में
पर उनलोगों को 
नहीं था मंजूर यह।
उन्होंने फेंके कुछ ऐंठे हुए शब्द
हमारे आसपास
और लड़ने लगे हम
आपस में ही!
वे मुस्कुरा रहे हैं दूर खड़े होकर।
(कविता:यही तो चाहते हैं वे, कवि: प्रेम नंदन)

आगे मत पढ़िए। एक मिनट रुकिए और अपने आसपास के माहौल के बारे में सोचिए। 

क्या हर तरफ़ ऐसा ही नहीं हो रहा है, जैसा ऊपर की पंक्तियों में कहा गया है। एक ऐसा हंगामा बरपा हुआ है, जिसका मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ बांटना है,  आदमी-आदमी के बीच जितना संभव हो, उतनी दीवारें खड़ी करते जाना है—ताकि आदमी कटता-मरता रहे और सत्ता अपना हित साधती रही। सदियों से सत्ता का चरित्र ऐसा ही रहा है।  

ये पंक्तियां उस कविता विशेषांक  के तेवर की ओर इशारा करती है, जिसका प्रकाशन दिल्ली  के साप्ताहिक अखबार ‘दिल्ली की सेल्फी’ ने किया है। दिल्ली की सेल्फी कविता विशेषांक 2017 का प्रकाशन इस अखबार की पहली वर्षगांठ पर किया गया और जनवरी में दिल्ली विश्व पुस्तक मेले के दौरान इसका लोकार्पण हुआ। इस विशेषांक में 49 कवियों की रचनाएं शामिल हैं। इनमें वरिष्ठ कवि भी हैं और वो भी हैं, जिन्होंने अभी अभी कलम उठाया ही है लेकिन विषयों की विविधता, लेखन की शैली, भाषा की बुनावट, शिल्प के वैविध्य की वजह से यह विशेषांक समकालीन कविता का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया है।  यह विशेषांक हिन्दी कविता के समकालीन प्रवृत्तियों को बखूबी रेखांकित करती है। इसे पढ़कर आप समझ सकते हैं कि हिंदी कविता में आज क्या और कैसा लिखा जा रहा है।

इस विशेषांक की कविताओं में प्रेम है, नफ़रत है, शहर के कंक्रीट के ढेर में तब्दील होते जाने की विडंबना है तो गांव के भी शहर  के नक्शे कदम पर चल पड़ने की व्यथा है। प्रकृति की खूबसूरती का बखान है तो इसकी 
खूबसूरती को उजाड़ने की साज़िश से सतर्क करने की तत्परता भी। व्यवस्था पर सवाल है, गुस्सा है, प्रतिरोध है।

हर प्रतिरोध में मिलाता हूं अपनी आवाज़
डरता हूं अपनी आवाज़ के पहचाने जाने से
डरता पहचान लिए जाने से
डरता हूं चिह्नित होने से
और जब तक ये डर मुझमें पैठा रहेगा
प्रतिरोधात्मक राग बेअसर रहेगी
(कविता : प्रतिरोध के कोरस में एक स्वर मेरा भी,  कवि : अनवर सुहैल Anwar Suhail)

आम आदमी का ये डर उसे जिल्लत भर ज़िन्दगी जीने को मज़बूर करती है। मुठ्ठियां खुली हुईं है। असहिष्णु आतताइयों के जुल्म को सहने की सहिष्णुता हैं लेकिन क्रांति के लिए मुठ्ठियां बंद करने की हिम्मत सिरे से गायब है।

यह समय है
आंखें बंद कर 
शुतरमुर्ग हो जाने  का
या फिर चील, बाज की तरह
विलुप्त हो जाने का
संक्रमित समय है यह!!
(कविता : संक्रमित समय  है यह, कवि : अरुण चंद्र राय) 

इस संक्रमित समय में भी इंसानियत को बचाए रखने की कोशिश में कवि पीछे नहीं रहता। 

जब मैं मरूं
तो मेरी अर्थी को कंधा  देने से पहले
देख लेना कहीं आस-पास
किसी खेत के किनारे
पेड़ पर लटक न रही हो
किसी किसान की लाश
कहीं न पड़ी हो
भूख से तड़प कर 
चार कंधों  की आस में
मरे किसी मज़दूर की अर्थी
भाई मेरे,
बस इतना ही चाहता हूं
कि मुझे मोक्ष प्रदान करने से पहले
और बाम्हनों को
हलुआ-पूरी खिलाने से पहले
उन्हें कंधा जरूर दे देना।
(कविता : जब मैं मरूं,  कवि : के. रवींद्र) Kunwar Ravindra

यह कविता नहीं है, मौजूदा समय का आईना है। इसमें साफ़ दिख रहा है कि किसान के पैरों तले ज़मीन नहीं है। वह हवा में लटकने को विवश है। मज़दूर के हाथ में काम नहीं है। थाली में रोटी नहीं है लेकिन एक वर्ग है, जो इनकी मौत पर भी हलुवा पूरी खा रहा है। उसकी कोशिश ही यही है कि मेहनतकश का पेट कभी न भरे। वो हर वक्त यही साज़िश रचने में व्यस्त रहता है। ऐसे लोगों को बेनकाब करती कविता भी विशेषांक में मौजूद है।

तुम्हारे भूख को जिंदा बचाए रखना
हमारी मज़बूरी है
क्योंकि जिस दिन
तुम्हारी भूख मर जाएगी
वर्षों की हमारी वधशाला  की
यह साधना भंग हो जाएगी
देश का जमीर मर जाएगा
उल्टे हम  भूखों मर जाएंगे
शायद नहीं पता हो तुम्हें
कि सत्ता जब भूखी होती है
जब उसका जमीर मर जाता है
तो वह  अजगर की तरह
निगल जाती है पूरे मुल्क को
(कविता:देशद्रोह का खतरा, कवि:योगेंद्र कृष्णा)

लेकिन मेहनतकश वर्ग भूख से लड़ता रहता है। भूख से जंग से, हालात से समझौते की ऐसी कई कविताएं इस विशेषांक में मौजूद हैं।

भात में नमक अधिक पड़ जाये
तो पानी मिलाकर खाते हैं
और पानी अधिक पड़ जाये
तो नमक मिलाकर खाते हैं
गरीब अपनी गरीबी भले ही न मिटा पाये
परन्तु अपनी भूख मिटाना जानता है
भूख तो असल में 
अमीरों की मिटाए नहीं मिटती
फिर चाहे मुल्क ही मिट जाए।
(कविता : भूख,  कवियत्री : अनामिका चक्रवर्ती ‘अनु’) 
***
उन्हें पता है
कितनी रोटी बची है चकले और थाली के बीच
चावल की हांडी में कितनी मुठ्ठी उम्मीद बची है
देह में कितना ताप बचा है
बचे हैं और भी कितने ही संघर्ष के दिन
लेकिन इस भोथर देह ने इंकार कर दिया है
उन्हें यकीन नहीं है
कि आज कड़ाके की ठंड है
(कविता:उन्हें यकीन नहीं, कवि:प्रशांत विप्लवी) 
***
महीने के अन्त में 
पिताजी चाय कम पीया करते हैं
और
सादी चाय उन्हें बहुत
अच्छी लगती है।
(कविता : दीवार पर टंगी वह कमीज, कवि : अभिनव सिद्धार्थ)

इसी भूख ने गांव को शहर का रुख  करने को मज़बूर किया। शहर ने कुछ पैसे दिए लेकिन ज़िन्दगी का सारा सुख छीन लिया। मजबूरी के शहर और मोह के गांव के बीच पिसा मध्यवर्ग का दर्द कुछ कविताओं में बखूबी उभरा है।

एक ज़माने में
भारी छूट की भाषा से 
जब अंजान थे लोग
तब 
घर के साथ-साथ
आंगन भी मिल जाता  था...
आज भारी छूट पर मिलते हैं
विशाल चौकोरों में छोटे-छोटे चौकोर
और आदमी छज्जे तक को तरस जाता है
कि छीन ली जाती है
जीवन से पाई-पाई जीने की कला
(कविता : भारी छूट,  कवि :अनुज)

शहर आने वाले आदमी की  
अंटी देखता है और
जाने वाली की छोड़ी गई सहन
जिसमें उसके अपने खड़े
होने की गुंजाइश हो।
अब जब मैंने खपा दी
शहर में अपनी उमर
जहां ने कभी मेरे आने से
वेशी हुई थी न
चले जाने से खाली होगा कुछ।
अब गांव जाकर
कहां किस पटोहे में
किस दुरौधें के नीचे
किस आले में रखूंगा
अपना यह खालीपन
(कविता:शहर से मिला  कवि: नरेंद्र पुंडरीक) 

राष्ट्रवाद जब चुनावी जुमला बन जाता है, तब केवल तमाशा होता है। उस तमाशे में वह दर्द जब जाता है, जो देश के लिए शहीद होने वाले सिपाही का परिवार झेलता है। 

युद्ध में अकेला नहीं जाता है सिपाही
साथ जाता है उसका किसान बाप
और उसकी डेढ़ बिसुआ ज़मीन...
साथ जाती है उसकी बूढ़ी मां
और उसकी पथराई आंखें
            ***
साथ जाते हैं उसके यार
साथ जाती है हुस्ना
साथ जाता है उसका घर
उसका खेत
उसका गांव
उसकी नीम
उसकी छांव
***
युद्ध में अकेला नहीं मरता है सिपाही
साथ ही मर जाते हैं ये सभी भी
(कविता:युद्ध में अकेला नहीं जाता सिपाही, कवि:नीरज द्विवेदी )

संग्रह में 49 कवियों  की कविताएं शामिल हैं। यहां सबका जिक्र करना संभव नहीं है लेकिन इस संग्रह में आपको अजय चंद्रवंशी, , अनिल कुमार पांडेय, अनुप्रिया, अनुराधा सिंह, अभिनव सिद्धार्थ, अरविंद श्रीवास्तव Arvind Srivastava, अरुण श्री, आनन्द गुप्ता Anand Gupta, इंदु सिंह, दिनेश कुमार, दिलीप कुमार शर्मा ‘अज्ञात’, ध्रुव गुप्त , नवनीत पांडेय Navneet Pandey, नूर मुहम्मद नूर Noor Mohammad Noor, नेहा सक्सेना, परमेंद्र सिंह, प्रदीप त्रिपाठी, बुद्धिलाल पाल Buddhi Lal Pal, महावीर राजी Mahabir Raji, मिथिलेश कुमार राय, मीता दास , यशस्विनी पांडेय, रचना त्यागी, राखी सिंह, राजकिशोर राजन ,शशांक शेखर, शहंशाह आलम Shahanshah Alam, शैलेंद्र कुमार शुक्ल, शैलेंद्र शांत, संतोषकुमार चतुर्वेदी Santosh Chaturvedi, सागर आनन्द, सुलोचना वर्मा ,सोनी पांडेय, सौरभ वाजपेयी, हनुमंत किशोर , ज्योति तिवारी की कविताएं हैं।(नाम अल्फाबेटिकल क्रम में है)

ये विशेषांक पठनीय और संग्रहणीय है। इस अंक के लिए संपादक नित्यानंद  गायेन Nityanand Gayen और कविता चयन में अहम भूमिका निभाने वाले प्रभात पांडेय Prabhat Pandey और रमेश पाठक  बधाई के पात्र हैं।

कश्मीर के कवि निदा नवाज Nida Nawaz की कविता के कुछ अंश के साथ खत्म करता हूं, पढ़िए और जानिए धरती के स्वर्ग की हक़ीक़त
मैं उस स्वर्ग में रहता हूं
जहां घर से निकलते समय मांएं
अपने बच्चों के गले में
परिचय पत्र डालना कभी नहीं भूलतीं
भले ही वह भूल जाय
टिफिन या किताबों के बस्ते
अपने नन्हों के परिचय की खातिर नहीं
बल्कि 
उनका शव घर के ही पते पर पहुंचे
इसकी ही चिन्ता है उन्हें
*   * *
मैं उस स्वर्ग में रहता हूं
जहां बच्चा होना होता है सहम जाना
जवान होना होता है मर जाना
औरत होना होता है लुट जाना
और बूढ़ा होना होता है
अपने  ही संतान का 
कब्रिस्तान हो जाना
*******
मैं उस नर्क में रहता हूं
जो शताब्दियों से भोग रहा है
स्वर्ग होने का एक
कड़वा और झूठा आरोप
 (कविता: मैं उस स्वर्ग में रहता हूं, कवि:निदा नवाज)
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पत्रिका: दिल्ली की सेल्फी कविता विशेषांक 2017
संपादक : नित्यानंद गायेन
कविताओं का चयन: प्रभात पांडेय, नित्यानंद गायेन और रमेश पाठक
मूल्य : 50 रुपए
पता: A-21/27, सेकेंड फ्लोर, नारायणा इंडस्ट्रियल एरिया, फेस II, नई दिल्ली-28

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

राजेन्द्र राव

कथा का विलक्षण शिल्पी : राजेन्द्र राव ----------------------------------------------
@ प्रेम नंदन 

राजेन्द्र राव वरिष्ठ कथाकार हैं अपनी कहानियों और उपन्यासों के आधुनिक समस्यामूलक कथाबिम्बों के कारण वो हिन्दी बहुपठित कथाकार हैं । समकालीन कहानी ने परम्परागत फार्मेट में पर्याप्त तोडफोड कर ली है अब वह भाषा से लेकर विषय तक किसी भी पक्ष में परम्परा के पेशेवर अन्दाज का परित्याग कर चुकी है । राजेन्द्र राव की कहानियों को इसी परित्याग के सन्दर्भ में परखना होगा । राजेन्द्र जी अपने समूचे रचनात्मक जीवन में प्रयोगधर्मी रहे ।हर एक कहानी अगली कहानी से पृथक रचनात्मक भाषा और विषय लेकर चलती रही । शिल्प में भी वो वैविध्यपूर्ण हस्तक्षेप करते है।शायद इसी  विविधता के कारण उनकी समीक्षा के प्रतिमान अभी तक नही बन पाए किसी भी लेखक के समीक्षा प्रतिमान तभी निर्मित होते हैं जब वो शिल्प के स्तर पर व भाषा के स्तर पर एकरसता व एकरूपता का संवहन करता है । नवीन जीवनबोध , नयी समस्याओं के लिए निरन्तर शैल्पिक प्रयोग परम्परागत आलोचना प्रतिमानों में नही अंटते अतः या तो आलोचक समीक्षण का साहस नही करता या फिर वो लेखक के कृतित्व को जानबूझकर पढना नही चाहता है यही कारण है राजेन्द्र राव के कथासाहित्य का अब तक समुचित  मूल्यांकन नही हो सका है बिल्कुल वैसे ही जैसे माधवराव सप्रे , चतुरसेन शास्त्री , भगवती चरण वर्मा और दूधनाथ सिंह के कथा साहित्य का अब तक मूल्यांकन नही हो सका है ।माधवराव सप्रे छत्तीसगढ के थे उनकी कहानी टोकरी भर मिट्टी को हिन्दी की पहली कहानी कहा जाता है अपने समय की सबसे यथार्थ कहानी थी मगर भाषा और शिल्प के स्तर पर वह अपने समकालीन से बहुत आगे थी यही कारण है इस कथा को अनदेखा किया गया और माधवराव सप्रे को वह महत्व नही मिल सका जो मिलना चाहिए । चतुरसेन शास्त्री इतिहास और संस्कृति को लेकर नवीन जीवनबोध की कहानी लिखते थे जिनसे मिथक तो इतिहास और पुराण से लेते थे पर सन्देश आधुनिक होता था । उनका युग प्रेमचन्द का युग था प्रेमचन्द के विशाल व्यक्तित्व के समक्ष इस यथार्थवादी कथाकार की भी उपेक्षा की गयी । राजेन्द्र राव का युग आजादी के बाद का हिन्दुस्तानी युग है । आजादी के बाद नवजात मध्यमवर्ग व उसकी सामाजिक पारिवारिक संघर्षों व विडम्बनाओं को उनके कथा साहित्य में तरजीह दी गयी है इसका आशय यह नही की उनकी कहानियों में सर्वहारा चरित्र नही है 
राजेन्द्र राव की कथाओं का फलक अति विस्तृत है इस व्यापक फलक पर यह आरोप कतई नहीं लग सकता कि उनकी दृष्टि में वर्गीय विभेद नही है  । यह सच है वो जीवन की यथार्थ अर्थछबियों सें यकीन रखते हैं यह आधुनिक कथाकारों का लक्षण है कि वो किस्सा या गल्प की बजाय यथार्थ व अनुभूत सच को अधिक तरजीह देते हैं जीवन का अनुभूत तथ्य कथा को गतिशील तभी बनाता है जब वह डबी घटनात्मक परिणिति मे अपने आप को तब्दील कर ले । यही अधिकांश लेखक कर रहे है कुछ के लिए घटना का बडा होना ही कथा की बुनावट है अस्तु वो तमाम छोटी छोटी घटनाओं का संजाल तैयार करके कथानक को बडी घटना के रूप मे तैयार कर लेते हैं उनके लिए छोटी घटनाएं महज तैयारी का काम करती है ऐसी कहानियाँ अधिकांशतः विवरण बनकर रह जाती हैं ज्ञानरंजन मे इस टेक्निक को देखा जा सकता है उनकी पिता कहानी भी मध्यमवर्गीय है पर अयथार्थ घटनाओं का ऐसा संजाल बुना गया है कि कहानी यथार्थ को अधिक प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त नही कर पाती है राजेन्द्र राव इस कथा टेक्निक का उपयोग एकदम नही करते हैं उनकी शैली सबसे अलहदा है वो तमाम टेक्निकों को धता बताकर परिवेश सृजन पर अधिक बल देते है "लौकी का तेल" कहानी को ही देखिए इस कहानी मे लेखक अपने मन्तव्यों की प्रतिपुष्टि मे वस्तु चित्रण व वातावरण को इतना व्यापक व सूक्ष्मता से युक्त कर देता है कि तमाम संवाद और घटनाएं वातावरण की स्मृति बिम्ब से उपजे लगने लगते है समूची कहानी मे कोई भी घटना अस्वाभाविक व थोपी गयी नही प्रतीत होती वातावरण प्रधानता के कारण कथा भी कभी कभी गौंण हो जाती है मगर प्रवाह बाधित नही है ।यह नवीन टेक्निक है जिसे काशीनाथ सिंह और दूधनाथ सिंह भी सफलता पूर्वक प्रयोग करते हैं ।  
जाहिर है जब लेखक का उद्देय वातावरण और उससे जन्य चरित्र ही कथानक के आधार होगें तो लेखक कहानी की माँग के अनुसार ही वर्गीय चरित्र लाएगा यदि वातावरण में चरित्र की जरूरत नही हो तो लेखक इस अकथ जोखिम को क्यों उठाए हलाँकि राजेन्द्रराव जोखिम के कथाकार है पर वातावरण मे जोखिम की सम्भावना कम रहती है फिर भी वर्गीय नजरिए से वो पृथक नही है ड्राईवर , दुकानदार , फुटपाथ , सब्जीवाले , बेरा , पालिसवाला , जैसे चरित्र स्वाभाविक रूप से उनकी कहानियों मे जगह पाते हैं पर इनकी वर्गीय अवस्तिथि को परखने के लिए आलोचक को भी वातावरण को परखने का जोखिम उठाना पडेगा ।ये सारे चरित्र सर्वहारा के हैं बहुत से लोगों की धारणा है कि वो लोक और सर्वहारा का विभाजन करते समय गाँव और शहर की अवैचारिक सीमाओं में कैद हो जाते हैं जबकि लोक और अभिजात्य का विभाजन शहर और गा्ँव का विभाजन नही है वह वर्गीय विभाजन है विचारधारा का सवाल है । यदि गाँव में किसान मजदूर सर्वहारा है तो शहर मे रिक्सेवाले खोमचेवाले , जैसे समुदाय सर्वहारा है क्योंकी दोनो की वर्गीय स्थिति और शोषक शक्तियाँ एक जैसी है दोनो के तरीके अलग मगर मन्शा एक ही है समस्याएं एक ही है यदि इस नजरिए से राजेन्द्र राव की कहानियों को देखा जाए तो राव भी सर्वहारा के कथाकार ठहरते हैं और उनकी दृस्टि भी वर्गीय दिखाई देती है | साथ ही नवीनता बोध भी राजेन्द्र राव की कहानियाँ हमारे समय की विडंबनाओं को नए ढंग से रेखांकित करती हैं, वे अपनी कहानियों मे समाज मे होने वाली सामान्य सी घटनाओं को लेते  हैं और फिर कथ्य और शिल्प से ऐसा ताना-बना बुनते हैं कि हम उनसे जुडते चले जाते हैं | सामाजिक रिस्तों की  आपाधापी के बीच वे रिस्तों को बचाने की  कोशिश करती  कहानियाँ लिखने वाले काहनीकर हैं|

अपनी चर्चित कहानी  दोपहर का भोजन मे वे प्रेम के सामाजिक अंतर्द्वंद  को हरे हमारे सामने रखते हैं , हमारा समाज  शुरू से ही प्रेम के प्रति बहुत ही असहिष्णु रहा है , ये कहानी भी उसी ओर इशारा करती है| इस कहानी में नायिका की बड़ी बहन एक सिक्ख लड़के से शादी कर लेती है जिसके कारण उसके माँ-बाप उससे  रिस्ता तोड़ लेते हैं ,अब नायिका को डर हैं की कहीं उसके साथ भी ऐसा ही न हो , जिसकी पूरी सांभावन है ,तो वह  दूसरे विकल्पों की तलाश मे जुट जाती है  जिससे उसका प्यार भी बचा रहे और माँ- बाप का आशीर्वाद भी | इस कहानी मे एक प्रेमी जोड़ा हैं जो अपने प्रेम को बचाए रखने के साथ-साथ अपने माँ-बाप का भी आशीर्वाद  चाहता है लेकिन ये संभव होता नहीं दिखता तो वे कोई दूसरा रास्ता तलाशने कि कोशिश करते दिखाई देते हैं जिससे उनका प्रेम और माँ- बाप का प्यार भी मिलता रहे| राजेंद्र राव ने और भी कई प्रेम कहानियाँ लिखी हैं उनकी इन कहानैयों मे एक तरफ उद्दाम प्रेम मे डूबते –उतराते प्रेमी युगल दिखते हऐन तो  दूसरी तरफ परिवार और सामाज की बेड़ियों मे जकड़े अपने प्रेम को कुर्बान करर्ते प्रेमी – प्रेमिका भी दिखाई देते हैं | लेकिन दोपहर  का भोजन कहानी  मे ये प्रेमी जोड़ा कोई नए रास्ते की तलाश करते दिखाई  देते हैं |  
साहित्य मे राजनीतिक और पूँजीपतियों ने कैसी सेंध लगाई हैं इसको देखना के लिए राजेंद्र  राव की कहानी – मैं राम की बाहुरिया पढ़ना चाहिये इस कहानी मे उन्होने दिखाया हैं कि कैसे  एक पूंजी पति आपने राजनीतिक  संपर्कों के जरिये पहले अकूत संपत्ति अर्जित करता है और जब वह संपप्ति उसके गले की हड्डी बनने लगती है तो फिर उसी काली कमाई के जरिये साहित्य मे घुसपैठ करके, एक चर्चित साहित्यकार बनकर , साहित्य का नियंता बन बैठता है ,इस कहानी के जरिये राजेंद्र राव ने पहले ही जयपुर साहित्य महोत्सव जैसे आयोजनाओ और फर्जी लेखकों की ओर इशारा कर दिया था | उन्होने अपनी एक अन्य कहानी लौकी का तेल मे राजनीति और पूँजीपतियों के गठजोड़ को दर्शाने की प्रयास किया है इस कहानी मे उन्होने दिखाया हैं की पूंजीपति लोग कैसे अपने फायदे के लिए राजनीती इस्तेमाल करते हैं और राजनीतिक लोग भी अपनी राजनीति चमकाने मे जनता के हितों की कोई परवाह नहीं करते हैं |राजेन्द्र राव की कहानियों मे अपने समय के तनावों को मजबूती से उठाया गया है पूंजीवादी व्यवस्था कैसे अपने जाल फैलाती है और आम जन मानस को अपनी आगोस मे लेकर उनका खून चूसती है , इन सब बातों को वे बड़ी बारीकी से पकड़ते हैं और इस जाल मे उलझे आम आदमी की छटपटाहट को रेखांकित करते हैं|  राजेन्द्र राव जी अपनी कहानियों मे शिल्प के स्तर पर बहुत ज्यादा प्रयोग न करके अपनी बात सीधे सरल शब्दों मे घटनाओं को पिरोते हैं और बिना किसी नाटकीयता के कहानी को आगे बढ़ाते हैं | छोटी छोटी बिम्बावलियों और दृष्यों से कथानक सृजित कर देना कला है राजेन्द्र राव इस कला में सिद्धहस्त है । इस टेक्निक मे लेखक हर स्थान में स्वयम् उपस्थित रहता है ।अक्सर कहानियों मे लेखक कथा कहते कहते नेपथ्य मे चला जाता है वह पाठक की भावानुभूतियों और प्रतिक्रियाओं के बूते कथानक को व गतिशीलता को आगे बढाता रहता है इससे कथानक पूर्ण रूप से तारतम्यता पर निर्भर होता है पाठक का व्यवधान भी लेखक का व्यवधान बन जाता है राव इस स्थिति से परिचित हैं । अतः उन्होने अपनी अधिकांश कहानियों में खुद को भी उपस्थिति करके करके रखा है लेखक गायब नही होता है वह गाईड की तरह कथानक को सपाट और सुग्राह बनाता हुआ चलता है । हलांकि मैं शैली मे उनकी अधिक कहानिया नही है न ही वो उत्तम पुरुष के रूप मे कही उपस्थित है पर अन्य सत्ता के रूप भे विवरण देते समय लेखक की उपस्थिति का जोरदार आभाष होता रहता है यह भी प्रयोगधर्मी जोखिम की तरह है  इस जोखिम मे लेखक सफल हो जाता है एक तरफ वो पाठक को बाँधकर रखने मे सफल होता तो दूसरी तरफ वो चरित्र का आवश्यक विस्तार भी कर देता है । यदि लेखक प्रकारान्तर से अपनी कहानी मे उपस्थित है तो वह अपने मन्तव्यों को जीवन से जुडे सवालों के साथ अधिक सफलता से प्रेषित कर सकता है मुन्सी प्रेमचन्द की बहुत सी कहानियों मे इस विशिष्टता को देखा जा सकता है । लेखक की उपस्थिति से पाठक और लेखक का चिन्तन व आवेग समानान्तर हो जाते है पाठक लेखक की दृष्टि से सीधे जुड जाता है अतः ऐसी कहानियाँ प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से अधिक सफल होती हैं । ऐसी कहानियाँ संवादी भंगिमा से युक्त होकर बेधडक आगे बढती जाती है । इस विशिष्टता के कारण राजेन्द्र राव की कहानिया पाठक के भीतर अरुचि मा ऊब नही उत्पन्न करती है वह और भी अधिक संघातों का गरिमामय प्रतिबिम्ब बनाती हैं
राजेन्द्र राव की कृतियाँ उनके व्यक्तित्व का परिचय कराती है एक ऐसा व्यक्तित्व जिसमे चिन्तन के सूक्ष्म तन्तु व वैचारिक बनावटों की तहें भी उपस्थित हैं । चूँकि लेखक की वैचारिक अवस्थितियाँ साहित्यिक , सांस्कृतिक व सामाजिक परिवेश की पैदाईस होती है लेखक का चतुर्दिक देशकाल ही उसकी विचार प्रक्रिया व चिन्तन को सामाजिक आधार देता है यदि राजेन्द राव जी की कहानियों मे मध्यमवर्गीय परिवारों व उनकी समस्याओं का प्रतिबिम्ब है तो इसके लिए उनका सामाजिक यथार्थ उत्तरदायी है । लेखक अपने आस पास के अपने लोगों को ही कहानी या कविता का विषय बनाता है वह अपने परिवेश से बाहर निकलना नही चाहता यदि वह निकलेगा तो कहानी मे कहीं न कहीं नकलीपन जरूर आ जाएगा और कहानी के निकष जीवन अनुभव के निकष बनकर नही उपस्थित हो सकेगे राव की साहित्यिक प्रेरणा भारत के वृहत्तर सामाजिक जीवन की फरिलब्धि है उनकी कहानियों की इमारत शून्य मे नही बनी कल्पना की अनुकृति नही है वह यथार्थ की इबारत है ।वैचारिक व्यक्तिगत अनुभवों की संवेगशील अभिव्यक्ति है । शिल्प और भाषा के सम्बन्ध मे वो अपने समकालीनों से अलग रहे उन्होने दृष्यात्मक व परिदृष्यात्मक शैली का कुशलतम प्रयोग किया है ये दोनो शैली रेणु की उपन्यासों मे भी उपस्थित है ।जब परिवेश को चरितनायक का दर्जा दिया जाना होता है तभी इस शैली का उपयोग होता है इस शैली से कोई भी घटना अस्वाभाविक नही लगती समूचा परिदृष्य अपने आप उपस्थित होता व स्पष्टीकरण देता चला जाता है । समाज के सांस्कृतिक व पारिवारिक सवालों को लेकर राजेन्द्र राव की कहानियाँ व्यापक माहौल विनिर्मित करती हैं इस सन्दर्भ में वो लेखक और समाजशास्त्री दोनो हैं वे अपनी कहानियों में भारतीय अस्मिता वैयक्तिक अस्मिता जातीय अस्मिताओं के सवालों के साथ बहुलतावादी वर्गीय संस्कृति के सवालों से खुलकर मुठभेड करते हैं ।साथ ही समाज को संचालित करने वाली तमाम शक्तियों का पोस्टमार्डम करते हुए जनता के पक्ष मे विरोध व सपनों का खूबसूरत आधार प्रस्तुत करते हैं राव की कहानियाँ चिर परिचित आस्वाद में खलल डाले बगैर नये कथात्मक आस्वाद से परिचित कराती हैं और बहुत कुछ मनुष्य के उपभोक्तावादी जडताओं और मूढताओं का खंडन करती है । लेखक जितना बेरहम जडताओं के खंडन के पक्ष मे है उतना ही दरियादिल व सजग नव निर्माण के प्रति है इसे उनकी निजी रंगत कहिए या अखिल भारतीय वैश्विक परिवर्तनों की समझ वह लोकलटी के साथ वैश्विकता की ओर कदम बढाते हैं स्थानीयता के साथ भूमंडलीकरण को परखते हैं परिवार के आधार पर मनुष्यता को देखते हैं तो विहंगम मानवता के साथ अस्मिता की बात करते है निः सन्देह राजेन्द्र राव हमारे समय के बडे कथाकार है । जिन्हे हम जानबूझकर उपेक्षित नही कर सकते हैं |
                                                                             @ प्रेम नंदन

बुधवार, 10 अगस्त 2022

कवियों की कथा

#कवियों_की_कथा-30
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   फतेहपुर के प्रेम नंदन एक प्रतिबद्ध युवा कवि हैं! लेखन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रभावित करती है । अब तक उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । उनकी कविताओं में वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ जीवन मूल्यों के रक्षण का आग्रह  है ।साथ ही ग्राम्य जीवन तथा उसकी जटिलताओं की सहज अभिव्यक्ति  है,,!
     आज इस काॅलम की तीसवीं कड़ी में प्रेमनंदन की कविताओं में अभिव्यक्त प्रतिबद्धता से परिचित होंगे,,!

            कवि की कथा=कवि की कलम से 
                      #कवि_कथा

अपने लेखन की शुरुआत के बारे में बात करूं तो जब मैं लिखने के कारणों की ओर झाँकने का प्रयास करता हूँ तो कई प्रश्न एक साथ सामने आ खड़े होते हैं- आखिरकार मैंने लिखना कैसे और क्यों शुरू किया?
साहित्य का मेरे घर-परिवार से दूर-दूर तक कहीं कोई रिश्ता नहीं था तो फिर मुझमें लेखन के संस्कार कहाँ से आए? 

बचपन के गलियारों में लौटने पर कई चीजें स्पष्ट हो जाती हैं, बातें शुरूआत की ओर पहुँच जाती हैं।
लिखने के शुरुआती बीज मेरे मष्तिष्क में शायद अम्मा की लोरियों ने बोए होंगे, कविता के प्रति लगाव शायद अम्मा के गाने-गुनगुनाने की आदत से पैदा हुआ होगा। अम्मा के पास लोकगीतों और कहानियों का अकूत भंडार है। 

उन दिनों अम्मा गांव और रिश्तेदारी में एक अच्छी गउनहर के रूप में प्रसिद्ध थी और विभिन्न तीज-त्योहारों और शादी-ब्याह के अवसरों पर लोग उनको इसी गुण के कारण विशेष रूप से आमंत्रित करते थे।

अम्मा अब भी हमेशा कुछ ना कुछ गाती-गुनगुनाती रहती हैं। बचपन में मुझको नींद तभी आती थी जब अम्मा मीठे स्वर में लोरियां सुनाती थी और सुबह उनकी गुनगुनाने की आवाज सुनकर ही आंखें खुलती थीं। दरअसल अम्मा हमारे सोने के बाद ही सोती थी और हमारे जागने के पहले जाग जाती थी और वे घरेलू कार्य प्रायः गाते-गुनगुनाते हुए ही करती थीं, अब भी उनकी यही दिनचर्या है। यह उस समय की लगभग सभी घरेलू महिलाओं की नियमित दिनचर्या होती थी।

अम्मा की लोरियों के पंखों पर सवार होकर जब मैं स्कूल गया तो वहां भी मेरा परिचय सबसे पहले कविता यानी स्कूल में गाई जाने वाली प्रार्थना से  हुआ। हिंदी की किताब में पहला पाठ भी कविता ही था। अम्मा से मिले संस्कारों के कारण बचपन में कविताएँ मुझे शीघ्र ही याद हो जाया करती थीं शायद यही कारण रहा है कि मुझे अपनी किताब की सभी कविताएं याद रहती थीं और मैं उन्हें अक्सर गुनगुनाया करता था। 

इसी दौरान जिंदगी में पहले प्यार के रूप में रेडियो का प्रवेश हुआ। उस समय घर में दो रेडियो थे, एक बुश का बड़ा रेडियो, लकड़ी की बॉडी वाला, दूसरा बुश की अपेक्षाकृत छोटा रेडियो- मर्फी का प्लास्टिक बॉडी में।
धीरे-धीरे मर्फी वाला रेडियो मेरा सबसे प्यारा और गहरा दोस्त बन गया।अम्मा के गीतों के साथ-साथ, रेडियो पर फिल्मी गाने, लोकगीत, गजलें सुनते हुए मैं बड़ा हुआ। रेडियो से बचपन की ये दोस्ती हाल फिलहाल तक बनी रही।  मेरे बनने-बिगड़ने में रेडियो का भी बहुत बड़ा योगदान है। 

इस तरह गीतों और कविताओं के प्रति मैं बचपन से ही लगाव महसूस करता था लेकिन कविता या और कुछ लिखने के बारे में तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद जब मैं आगे की पढ़ाई के लिए शहर आया तो जहाँ मैं किराए पर रहता था उससे कुछ दूरी पर एक राजकीय पुस्तकालय और राजकीय छात्रवास अगल-बगल स्थित थे। मेरे कई सीनियर और परिचित साथी राजकीय छात्रवास में रहते थे और अखबार, पत्रिकाएं पढ़ने के लिए रोजाना राजकीय पुस्तकालय जाते थे । मैं भी उन्ही के साथ पहले तो प्रायः रविवार और फिर नियमित रूप से लाइब्रेरी जाने लगा था लगा। वहाँ पर कई अखबार, प्रतियोगी पत्रिकायें, साहित्यिक पत्रिकाएं आती थीं। वहीं पहली बार अखबारों और पत्रिकाओं से दोस्ती हुई। उस समय 'संपादक ने नाम पत्र' जैसे कॉलम लगभग सभी अखबारों में होते थे। 

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों कर रहे कई सीनियर साथी संपादक के नाम पत्र लिखते थे और जब वे अखबारों में प्रकाशित होते थे तो बड़े गर्व से हम सबको दिखाते थे कि देखो-मेरा लिखा हुआ अखबार में छपा हैं। उस समय यह देखना काफी रोमांचक अनुभव हुआ करता था। तो इसी की देखा-देखी मैंने भी एक दिन एक पोस्टकार्ड पर विभिन्न सब्जियों की खेतीबाड़ी में प्रयोग होने वाले कीटनाशक दवाओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर एक पोस्टकार्ड में कुछ लिखा और उसे पोस्टबॉक्स में डाल आया और फिर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया। लगभग एक हफ्ते बाद वह पत्र कानपुर महानगर से प्रकाशित होने वाले एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अखबार के 'संपादक के नाम पत्र' वाले कॉलम में अपने लिखे शब्दों को छपा हुआ देखकर सचमुच आँखों में आँसू आ गए थे। उस घटना के बाद पत्र लिखने का एक सिलसिला ही चल पड़ा। साथियों के साथ खूब पत्र लिखे जाते, कुछ छपते, कुछ न छपते, लेकिन अब इस बात की परवाह न करते हुए जब भी समय मिलता, खूब पोस्टकार्ड लिखे जाते, पोस्ट किए जाते।

हम जिस राजकीय पुस्कालय में पढ़ने जाते थे, शहर में मेरे जैसे तमाम गँवई लड़कों के लिए एकमात्र अड्डा था। यह पुस्कालय जिला विद्यालय निरीक्षक के आधीन था । वहाँ पर सिर्फ एक लाइब्रेरियन और एक चपरासी नियुक्त था। दोनों बहुत मक्कार थे। समय से लाइब्रेरी न खोलना, जल्दी बन्द कर देना , मेम्बरशिप लेने के बावजूद किताबें इश्यू करने में आनाकानी करना, विभिन्न मासिक पत्रिकाओं को पहले अपने घर ले जाना फिर हफ़्ते दो हफ्ते बाद लाइब्रेरी लाना जैसी अनेक करतूतों से  से हम सभी पढ़ने वाले छात्र परेशान रहते थे। हम लोग आए दिन लाइब्रेरियन और चपरासी की शिकायत जिला विद्यालय निरीक्षक से करते, लेकिन उनकी आदतें सुधरने का नाम ही नहीं ले रहीं थी। इन सबसे परेशान होकर हम लोगों ने लाइब्रेरी की समस्याओं और लाइब्रेरियन और चपरासी की शिकायत के रूप में कई पोस्टकार्ड विभिन्न स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों को भेजे। इन शिकायती पत्रों को कई अखबारों ने प्रकाशित किया। जिनमें से कई साथियों के पत्रों के साथ मेरा लिखा शिकायती पत्र भी प्रकाशित हुआ। कुछ स्थानीय अखबारों ने इसे खबर के रूप में छापा। अखबारों में प्रकाशित होने के कारण यह एक बड़ा मुद्दा बन गया, जिसकी आँच जिला विद्यालय निरीक्षक तक पहुँची। उन्होंने इन खबरों को संज्ञान में लेते हुए एक दिन छात्रों के हमारे ग्रुप को अपने ऑफिस में बातचीत के लिए बुलाया। वहाँ पर उन्होंने बड़े ध्यानपूर्वक हमारी शिकायतें सुनी और लाइब्रेरियन व चपरासी को फटकार लगाते हुए आइंदा से नियमानुसार कार्य करने की चेतावनी दी।

जिला विद्यालय निरीक्षक महोदय ने हम लोगो से उन पत्रिकाओं और अखबारों की सूची मांगी, जो हम लोग पढ़ना चाहते थे, लेकिन लाइब्रेरी में नहीं आते थे। उन्होंने उन पत्रिकाओं, अखबारों की लाइब्रेरी भिजवाने की व्यवस्था की। जिसके बाद लाइब्रेरी की व्यवस्था में काफी सुधार हुआ।

इस घटना के बाद पहली बार मुझे शब्दों की ताकत का एहसास हुआ और उसी क्षण मैंने शब्दों से दोस्ती कर ली। अखबारों और प्रतियोगी पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़ाव और गहरा हुआ। 

इसी दौरान किसी पत्रिका या किताब में (ठीक से याद नहीं आ रहा) जब मैंने अज्ञेय की 'छंदमुक्त' कविता 'हिरोशिमा' पहली बार पढ़ी तो अचानक ही दिमाग में यह विचार बिजली की तरह कौंधा कि इस तरह की कविता तो मैं भी लिख सकता हूँ। एक यह महज एक विचार ही था। मैं उस क्षण एक पंक्ति भी नहीं लिख सका।

इसके दो-तीन महीने बाद ही, जहाँ मैं रहता था , वहीं पड़ोस में एक दुर्घटना घट गई, एक नवब्याहता को जिंदा जला दिया गया। इस दुर्घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया और मेरे दिमाग को बहुत उद्देलित और बेचैन किया। यह बेचैनी कई दिनों तक दिमाग को मथती रही। अन्ततः एक दिन इस बेचैनी से मुक्ति पाने के लिए इसे शब्दों में ढालने के प्रयास में डायरी और पेन लेकर लिखने बैठ गया। उस दिमाग मे पहले से पढ़ी हुई अज्ञेय की कविता 'हिरोशिमा' पूरी तरह हावी थी और उसी से प्रेरित होकर कागज पर एक कविता जैसा कुछ लिख डाला। यह मेरी पहली साहित्यिक रचना थी। कविता का शीर्षक रखा - 'अतृप्त इच्छाओं की वेदी'। 

संयोग से वह कविता एक स्थानीय साप्ताहिक पत्र में छप भी गई। इससे उत्साहित होकर  कुछ और कविताएँ, गीत और लघुकथाएँ लिखीं जो विभिन्न स्थानीय साप्ताहिक पत्रों और दैनिक अखबारों की रविवासरीय परिशिष्ट में छपीं। इस तरह मेरे लेखन का सिलसिला शुरू हुआ।

#कविताएं=
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01- - संकट

जिस समय बौर से लदा-फ़दा
मह-मह गमकना चाहिए
बसंत के उस मौसम में
मुरझाई आंखों से
आठ-आठ आँसू रोते हुए
गा रहा है कोई उदास गीत
पिता का रोपा हुआ
आम का पेड़।

ये रोना सिर्फ आम का रोना नहीं है
बल्कि रोना है उस
समूची पीढ़ी का
जो पेड़ों को अपने बच्चों सा पालती थी

अब पेड़ और
पेड़ों को चाहने वाले
दोनों संकट में हैं
और इस संकट से उबरने का
कोई भी उपाय
किसी भी नदी, हवा, मिट्टी
या मौसम के पास नहीं है।

02-- मछुआरा मन 

मछुआरा मन
चाहे कुछ ऐसा... 

खेतों, कछारों में
नदियों संग घूमें
झूमती-मचलती 
हवाओं संग झूमें

बारिश की रिमझिम में
पेड़ हँसें, फूल खिलें
जीवन की सुविधाएं
सबको भरपूर मिलें

चिड़ियों को पेड़ मिलें
पशुओं को जंगल
आदमी को बस्ती मिलें
सबका हो मंगल

मछुआरा मन
चाहे कुछ ऐसा…

03 -  गाँव की पगडंडियाँ

हर बार गाँव से लौटते समय 
कन्धों पर झूल-झूल जाती हैं 
मेरे गाँव की पगडंडियाँ
वे भी आना चाहती हैं शहर 
मेरे साथ 

शहर को 
समझता हूँ  
मैं उनसे बेहतर 
इसलिए समझाता हूँ- 
यहीं रहो तुम सब 
यहीं तुम सुरक्षित हो 
जाओगी शहर तो 
गुम हो जाओगी तुम 
बचेगा नहीं नामोनिशान तुम्हारा 

मेरे कंधों से उतरकर 
थोड़ा गुस्सा और बहुत-सी निराशा से 
ताकती हैं एकटक 
वे मुझे देर तक 

हर बार छोड़ आता हूँ 
गाँव कि सरहद पर खड़े
बूढ़े बरगद के नीचे उन्हें 

सोचता हूँ- 
किसी दिन यदि सचमुच में 
शहर आ गईं 
गाँव कि पगडंडियाँ 
तो क्या होगा उनका ?

वर्षों से 
इसी असमंजस में पड़ा हूँ मैं 
गाँव और शहर के 
ठीक बीचोबीच 
धोबी का कुत्ता बना खड़ा हूँ मैं ।

04- बीता समय उदास है

उदास है 
गाँव की सरहद पर
चैकीदार-सा खड़ा
बूढ़ा बरगद 
क्योंकि लोग उसकी छाया में
बैठने, बतियाने 
अब नहीं आते 

सूना है 
बड़े कुएँ का पनघट 
क्योंकि नही गूँजती
चूड़ियों, पायलों की झंकार
बाल्टी, गागर की  खनखनाहटें 
अब नहीं सुनाई देतीं यहाँ
लड़कियाँ-औरतों की खिलखिलाहटें 

उदास है
जीवन के मद्धिम अलाव में पकी
अनुभवों की गठरी लिए बैठी  
वृद्धावस्था 
क्योंकि लोग उसके पास
राय-मशविरा करने
उनके सुख-दुःख सुनने 
अब नहीं आते ।

05 - मेहनतकश आदमी

घबराता नहीं काम से
मेहनतकश आदमी ,
वह घबराता है निठल्लेपन से

बेरोजगारी के दिनों को खालीपन
कचोटता है उसको,
भरता है उदासी
रोजी-रोटी तलाश रही उसकी इच्छाओं में

पेट की आग से ज्यादा तीव्र होती है
काम करने की भूख उसकी
क्योंकि भूख तो तभी मिटेगी
जब वह कमाएगा
नही तों क्या खाएगा

सबसे ज्यादा डरावने होते हैं
वे दिन
जब उसके पास
करने को कुछ नहीं होता

रोजी-रोटी में सेंध मार रहीं मशीनें
सबसे बड़ी दुश्मन हैं उसकी
साहूकार, पुलिस और सरकार से
यहॉ तक कि भूख से भी
वह नहीं डरता उतना
जितना डरता है
मशीनों द्वारा अपना हक छीने जाने से

रोजगार की तलाश में
वह शहर-शहर ठोकरे खाता है
हाड़तोड़ मेहनत करता है
पर मशीनों की मार से
अपनी रोजी-रोटी नहीं बचा पाता,
तब वह बहुत घबराता है ।

06- निर्जीव होते गांव 

रो रहे हैं हँसिए
चिल्ला रही हैं खुरपियाँ
फावड़े चीख रहे हैं 
कुचले जा रहे हैं
हल, जुआ, पाटा,
ट्रैक्टरों के नीचे 

धकेले जा रहे हैं गाय-बैल, 
भैंस-भैसे कसाई-घरों में 

धनिया, गाजर , मूली ,  टमाटर ,
आलू, लहसुन ,प्याज, गोभी ,
दूध ,दही, मक्खन, घी ,
भागे जा रहे हैं
मुँह-अँधेरे ही शहर की ओर
और किसानों के बच्चे
ताक रहे हैं इन्हें ललचाई नजरों से 

गाँव में 
जीने की ख़त्म होती 
संभावनाओं से त्रस्त
खेतिहर नौजवान पीढ़ी
खच्चरों की तरह पिसती है  
रात-दिन शहरों में
गालियों की चाबुक सहते हुए 

गाँव की जिंदगी
नीलाम होती जा रही है
शहर के हाथों ;
और धीरे- धीरे ...
निर्जीव होते जा रहे हैं गाँव 

07– गाँव, नदी और पेड़ का भविष्य 
 
मेरे गाँव के 
खूबसूरत चेहरे को 
बदरंग करके 
बिजूके की तरह  
टांग दिया है 
बाजार ने 
लकडहारे के हाथों बिक चुके 
रेत हो चुकी नदी के किनारे खड़े 
अंतिम पेड़ की 
उदास डालों पर
 
अब पेड़ चाहे तो 
चेहरा पहन ले 
या फिर चेहरा 
पेड़ हो जाए 
और फिर दोनों 
रेत को निचोड़कर
मुक्त कर दें नदी को 
 
ऐसी ही दो-एक संभावनाओं पर 
टिका है 
गाँव, नदी और पेड़ का भविष्य 

08- सपने जिंदा हैं अभी

मर नहीं गए हैं सब सपने 
कुछ सपने जिंदा हैं अभी भी

एक पेड़ ने
देखे थे जो सपने
हर आँगन में हरियाली फ़ैलाने के 
उसके कट जाने के बाद भी
जिंदा हैं वे अभी
उसकी कटी हुई जड़ों में 

एक फूल ने
देखे थे जो सपने
हर माथे पर खुशबू लेपने के
उसके सूखकर बिखर जाने के बाद भी
जिंदा हैं वे अभी
उसकी सूखी पंखुड़ियों में 

एक तितली ने
देखे थे जो सपने
सभी आँखों में रंग भरने के 
उसके मर जाने के बाद भी
जिंदा हैं वे अभी
उसके टूटे हुए पंखों में 

एक कवि ने
देखे थे जो सपने
समाजिक समरसता के, 
आडंबर, पाखंड,  जात-पाँत,  छुआछूत से 
मुक्त समाज के 
उसके मार दिए जाने के बाद भी 
जिंदा हैं वे अभी
उसकी रचनाओं में 

मर नहीं गए हैं सब सपने 
कुछ सपने जिंदा हैं अभी भी। 

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 #परिचय=

जनपद फतेहपुर(उ0प्र0) के एक छोटे से गाँव फरीदपुर में 25 दिसंबर 1980 को जन्म. 
 
शिक्षा एम0ए0(हिन्दी), बी0एड0, पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा.
 
लेखन और आजीविका की शुरुआत पत्रकारिता से. दो-तीन वर्षों तक पत्रकारिता करने तथा तीन-चार वर्षों तक भारतीय रेलवे में स्टेशन मास्टरी और कुछ वर्षों तक इधर-उधर भटकने के पश्चात सम्प्रति अध्यापन.
 
कविताएं कहानियां, लघुकथायें एवं आलोचना आदि का लेखन और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, ई-पत्रिकाओं एवं ब्लॉगों में प्रकाशन.
 
दो कविता संग्रह 'सपने जिंदा हैं अभी'
और 'यही तो चाहते हैं वे' प्रकाशित. 
 
मोबइल – 09336453835 
ईमेल - premnandanftp@gmail.com
पता-शकुन नगर, सिविल लाइन्स,
      फतेहपुर (उ0प्र0)

गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

प्राथमिक शिक्षा : दशा और दिशा

प्राथमिक शिक्षा कि दुर्दशा के लिए केवल अध्यापक ही दोषी नहीं !

   आजकल हमारे जनपद फतेहपुर में अधिकारियों और मीडिया द्वारा प्राथमिक शिक्षा  की गुणवत्ता को सुधारने के लिए  को चलाये जा रहे सघन अभियान में प्राथमिक शिक्षा में व्याप्त कमियों का जो ठीकरा   केवल  प्राथमिक शिक्षकों के सिर फोड़ा जा रहा है , वह पूरी तरह से एकतरफा है और सारे  शिक्षकों की गलत तस्बीर पेश कर रहा है जिससे अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान अध्यापकों को बड़ा क्षोभ है !

       यह बात सही है कि आज पूरे देश कि शिक्षा , चाहे वह प्राथमिक हो या माध्यमिक या उच्च शिक्षा हो , पूरी तरह से पटरी से उतरी हुई है , लेकिन यहाँ हम केवल प्राथमिक शिक्षा कि बात करें तो उसकी स्थिति बड़ी ही दयनीय है ! लेकिन इसके लिए सिर्फ शिक्षकों को ही पूरी तरह से दोषी ठहराना नितांत गलत एवं दुर्भावना पूर्ण है !

     दरअसल शिक्षा एक बहुकोणीय व्यवस्था है जिसका एक कोण शिक्षक है ! अन्य कोण शैक्षिक व्यवस्था , आभिवावक .बच्चे , किताबे , पाठ्यक्रम ... आदि आते हैं ! इसलिए शिक्षा कि गुणवत्ता के लिए अकेले शिक्षक को ही पूर्णरूपेण जिम्मेदार मानना सरासर नाइंसाफी है !  
 
     शिक्षा कि गुणवत्ता में ये गिरावट एक दिन में नहीं आ गयी है इसके लिए हमारी पूरी शैक्षिक व्यवस्था , अभिभावक , बच्चे एवं अध्यापक बराबर के दोषी हैं ! प्राइमरी स्कूलों की अव्यवस्थाओं से सभी परिचित हैं ! अध्यापकों की कमी , संशाधनो का अभाव , अध्यापकों को शिक्षणेत्तर  कार्यों में लगाना , अभिभावकों का असहयोग , बच्चों का नियमित रूप से विद्यालय न आना , शैक्षिक अधिकारियों के नियमित निरीक्षण न होना  आदि .... आदि कमियों के चलते ही आज प्राथमिक शिक्षा रसातल में पहुँच चुकी है लेकिन इसके लिए केवल अध्यापक को दोषी ठहराने और उसको ही बलि का बकरा बनाने से इसका उद्धार नहीं होने वाला है !

          अधिकारी यदि वास्तव में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारना चाहते हैं तो उन्हें इसके सारे कोणों में सामंजस्यपूर्ण माहौल तैयार करना होगा और सभी की बराबर की जवाबदेही तय करनी होगी , तभी प्राथमिक शिक्षा को पटरी पर लाया जा सकता है !

      एक और बात - पहली बार अधिकारी और मीडिया , दोनों प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता की बात कर रहे हैं ,यह प्राथमिक शिक्षा के लिए एक शुभ संकेत है , नहीं तो अभी तक मीडिया और आधिकारियों द्वारा सिर्फ मिड डे मील की कमियाँ , शिक्षकों का स्कूल न जाना , वजीफा और ड्रेस बितरण की कमियाँ , भवन निर्माण की खामियों की ही उजागर किया जाता था ! यह पहली बार है की इनके द्वारा शैक्षिक गुणवत्ता की बात की जा रही है , लेकिन यह काम पूरी तरह से एकपक्षीय किया जा रहा है , जिसमे न तो शिक्षकों की बात सुनी जा रही है और न ही उनको इसमें शामिल किया जा रहा है ! खासकर मीडिया इसमें बिलकुल ही नकारात्मक भूमिका निभा रहा है और शिक्षा में आई गिरावट के लिए पूरी तरह से शिक्षकों को ही कटघरे में खड़ा करने शिक्षकों की गरिमा को तार-तार  करने का काम कर रहा है !

   मीडिया और अधिकारियों को यह बात समझनी चाहिए कि प्राथमिक शिक्षा में आई इस गिरावाट में शिक्षक , अभिवावक , बच्चे , शैक्षिक अधिकारी , शैक्षिक व्यवस्था , आदि सभी बराबर के भागीदार हैं , केवल शिक्षकों के सिर इसका ठीकरा फोडना बिलकुल भी ठीक नहीं है ! 

   आशा है , प्राथमिक शिक्षा के उन्नयन के लिए इससे जुड़े हुए सभी लोग , एक दूसरे कि टांग खींचने के बजाय कंधे से कंधा मिलाकर प्रयास करेंगे और मीडिया भी इसमें हमारा सहयोग करेगा और प्राथमिक शिक्षा एक बार फिर से अपना खोया हुआ गौरव हासिल करेगी !

प्रख्यात आलोचक डॉ0 ओउमप्रकाश अवस्थी जी से बातचीत

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