गुरुवार, 11 अगस्त 2022

राजेन्द्र राव

कथा का विलक्षण शिल्पी : राजेन्द्र राव ----------------------------------------------
@ प्रेम नंदन 

राजेन्द्र राव वरिष्ठ कथाकार हैं अपनी कहानियों और उपन्यासों के आधुनिक समस्यामूलक कथाबिम्बों के कारण वो हिन्दी बहुपठित कथाकार हैं । समकालीन कहानी ने परम्परागत फार्मेट में पर्याप्त तोडफोड कर ली है अब वह भाषा से लेकर विषय तक किसी भी पक्ष में परम्परा के पेशेवर अन्दाज का परित्याग कर चुकी है । राजेन्द्र राव की कहानियों को इसी परित्याग के सन्दर्भ में परखना होगा । राजेन्द्र जी अपने समूचे रचनात्मक जीवन में प्रयोगधर्मी रहे ।हर एक कहानी अगली कहानी से पृथक रचनात्मक भाषा और विषय लेकर चलती रही । शिल्प में भी वो वैविध्यपूर्ण हस्तक्षेप करते है।शायद इसी  विविधता के कारण उनकी समीक्षा के प्रतिमान अभी तक नही बन पाए किसी भी लेखक के समीक्षा प्रतिमान तभी निर्मित होते हैं जब वो शिल्प के स्तर पर व भाषा के स्तर पर एकरसता व एकरूपता का संवहन करता है । नवीन जीवनबोध , नयी समस्याओं के लिए निरन्तर शैल्पिक प्रयोग परम्परागत आलोचना प्रतिमानों में नही अंटते अतः या तो आलोचक समीक्षण का साहस नही करता या फिर वो लेखक के कृतित्व को जानबूझकर पढना नही चाहता है यही कारण है राजेन्द्र राव के कथासाहित्य का अब तक समुचित  मूल्यांकन नही हो सका है बिल्कुल वैसे ही जैसे माधवराव सप्रे , चतुरसेन शास्त्री , भगवती चरण वर्मा और दूधनाथ सिंह के कथा साहित्य का अब तक मूल्यांकन नही हो सका है ।माधवराव सप्रे छत्तीसगढ के थे उनकी कहानी टोकरी भर मिट्टी को हिन्दी की पहली कहानी कहा जाता है अपने समय की सबसे यथार्थ कहानी थी मगर भाषा और शिल्प के स्तर पर वह अपने समकालीन से बहुत आगे थी यही कारण है इस कथा को अनदेखा किया गया और माधवराव सप्रे को वह महत्व नही मिल सका जो मिलना चाहिए । चतुरसेन शास्त्री इतिहास और संस्कृति को लेकर नवीन जीवनबोध की कहानी लिखते थे जिनसे मिथक तो इतिहास और पुराण से लेते थे पर सन्देश आधुनिक होता था । उनका युग प्रेमचन्द का युग था प्रेमचन्द के विशाल व्यक्तित्व के समक्ष इस यथार्थवादी कथाकार की भी उपेक्षा की गयी । राजेन्द्र राव का युग आजादी के बाद का हिन्दुस्तानी युग है । आजादी के बाद नवजात मध्यमवर्ग व उसकी सामाजिक पारिवारिक संघर्षों व विडम्बनाओं को उनके कथा साहित्य में तरजीह दी गयी है इसका आशय यह नही की उनकी कहानियों में सर्वहारा चरित्र नही है 
राजेन्द्र राव की कथाओं का फलक अति विस्तृत है इस व्यापक फलक पर यह आरोप कतई नहीं लग सकता कि उनकी दृष्टि में वर्गीय विभेद नही है  । यह सच है वो जीवन की यथार्थ अर्थछबियों सें यकीन रखते हैं यह आधुनिक कथाकारों का लक्षण है कि वो किस्सा या गल्प की बजाय यथार्थ व अनुभूत सच को अधिक तरजीह देते हैं जीवन का अनुभूत तथ्य कथा को गतिशील तभी बनाता है जब वह डबी घटनात्मक परिणिति मे अपने आप को तब्दील कर ले । यही अधिकांश लेखक कर रहे है कुछ के लिए घटना का बडा होना ही कथा की बुनावट है अस्तु वो तमाम छोटी छोटी घटनाओं का संजाल तैयार करके कथानक को बडी घटना के रूप मे तैयार कर लेते हैं उनके लिए छोटी घटनाएं महज तैयारी का काम करती है ऐसी कहानियाँ अधिकांशतः विवरण बनकर रह जाती हैं ज्ञानरंजन मे इस टेक्निक को देखा जा सकता है उनकी पिता कहानी भी मध्यमवर्गीय है पर अयथार्थ घटनाओं का ऐसा संजाल बुना गया है कि कहानी यथार्थ को अधिक प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त नही कर पाती है राजेन्द्र राव इस कथा टेक्निक का उपयोग एकदम नही करते हैं उनकी शैली सबसे अलहदा है वो तमाम टेक्निकों को धता बताकर परिवेश सृजन पर अधिक बल देते है "लौकी का तेल" कहानी को ही देखिए इस कहानी मे लेखक अपने मन्तव्यों की प्रतिपुष्टि मे वस्तु चित्रण व वातावरण को इतना व्यापक व सूक्ष्मता से युक्त कर देता है कि तमाम संवाद और घटनाएं वातावरण की स्मृति बिम्ब से उपजे लगने लगते है समूची कहानी मे कोई भी घटना अस्वाभाविक व थोपी गयी नही प्रतीत होती वातावरण प्रधानता के कारण कथा भी कभी कभी गौंण हो जाती है मगर प्रवाह बाधित नही है ।यह नवीन टेक्निक है जिसे काशीनाथ सिंह और दूधनाथ सिंह भी सफलता पूर्वक प्रयोग करते हैं ।  
जाहिर है जब लेखक का उद्देय वातावरण और उससे जन्य चरित्र ही कथानक के आधार होगें तो लेखक कहानी की माँग के अनुसार ही वर्गीय चरित्र लाएगा यदि वातावरण में चरित्र की जरूरत नही हो तो लेखक इस अकथ जोखिम को क्यों उठाए हलाँकि राजेन्द्रराव जोखिम के कथाकार है पर वातावरण मे जोखिम की सम्भावना कम रहती है फिर भी वर्गीय नजरिए से वो पृथक नही है ड्राईवर , दुकानदार , फुटपाथ , सब्जीवाले , बेरा , पालिसवाला , जैसे चरित्र स्वाभाविक रूप से उनकी कहानियों मे जगह पाते हैं पर इनकी वर्गीय अवस्तिथि को परखने के लिए आलोचक को भी वातावरण को परखने का जोखिम उठाना पडेगा ।ये सारे चरित्र सर्वहारा के हैं बहुत से लोगों की धारणा है कि वो लोक और सर्वहारा का विभाजन करते समय गाँव और शहर की अवैचारिक सीमाओं में कैद हो जाते हैं जबकि लोक और अभिजात्य का विभाजन शहर और गा्ँव का विभाजन नही है वह वर्गीय विभाजन है विचारधारा का सवाल है । यदि गाँव में किसान मजदूर सर्वहारा है तो शहर मे रिक्सेवाले खोमचेवाले , जैसे समुदाय सर्वहारा है क्योंकी दोनो की वर्गीय स्थिति और शोषक शक्तियाँ एक जैसी है दोनो के तरीके अलग मगर मन्शा एक ही है समस्याएं एक ही है यदि इस नजरिए से राजेन्द्र राव की कहानियों को देखा जाए तो राव भी सर्वहारा के कथाकार ठहरते हैं और उनकी दृस्टि भी वर्गीय दिखाई देती है | साथ ही नवीनता बोध भी राजेन्द्र राव की कहानियाँ हमारे समय की विडंबनाओं को नए ढंग से रेखांकित करती हैं, वे अपनी कहानियों मे समाज मे होने वाली सामान्य सी घटनाओं को लेते  हैं और फिर कथ्य और शिल्प से ऐसा ताना-बना बुनते हैं कि हम उनसे जुडते चले जाते हैं | सामाजिक रिस्तों की  आपाधापी के बीच वे रिस्तों को बचाने की  कोशिश करती  कहानियाँ लिखने वाले काहनीकर हैं|

अपनी चर्चित कहानी  दोपहर का भोजन मे वे प्रेम के सामाजिक अंतर्द्वंद  को हरे हमारे सामने रखते हैं , हमारा समाज  शुरू से ही प्रेम के प्रति बहुत ही असहिष्णु रहा है , ये कहानी भी उसी ओर इशारा करती है| इस कहानी में नायिका की बड़ी बहन एक सिक्ख लड़के से शादी कर लेती है जिसके कारण उसके माँ-बाप उससे  रिस्ता तोड़ लेते हैं ,अब नायिका को डर हैं की कहीं उसके साथ भी ऐसा ही न हो , जिसकी पूरी सांभावन है ,तो वह  दूसरे विकल्पों की तलाश मे जुट जाती है  जिससे उसका प्यार भी बचा रहे और माँ- बाप का आशीर्वाद भी | इस कहानी मे एक प्रेमी जोड़ा हैं जो अपने प्रेम को बचाए रखने के साथ-साथ अपने माँ-बाप का भी आशीर्वाद  चाहता है लेकिन ये संभव होता नहीं दिखता तो वे कोई दूसरा रास्ता तलाशने कि कोशिश करते दिखाई देते हैं जिससे उनका प्रेम और माँ- बाप का प्यार भी मिलता रहे| राजेंद्र राव ने और भी कई प्रेम कहानियाँ लिखी हैं उनकी इन कहानैयों मे एक तरफ उद्दाम प्रेम मे डूबते –उतराते प्रेमी युगल दिखते हऐन तो  दूसरी तरफ परिवार और सामाज की बेड़ियों मे जकड़े अपने प्रेम को कुर्बान करर्ते प्रेमी – प्रेमिका भी दिखाई देते हैं | लेकिन दोपहर  का भोजन कहानी  मे ये प्रेमी जोड़ा कोई नए रास्ते की तलाश करते दिखाई  देते हैं |  
साहित्य मे राजनीतिक और पूँजीपतियों ने कैसी सेंध लगाई हैं इसको देखना के लिए राजेंद्र  राव की कहानी – मैं राम की बाहुरिया पढ़ना चाहिये इस कहानी मे उन्होने दिखाया हैं कि कैसे  एक पूंजी पति आपने राजनीतिक  संपर्कों के जरिये पहले अकूत संपत्ति अर्जित करता है और जब वह संपप्ति उसके गले की हड्डी बनने लगती है तो फिर उसी काली कमाई के जरिये साहित्य मे घुसपैठ करके, एक चर्चित साहित्यकार बनकर , साहित्य का नियंता बन बैठता है ,इस कहानी के जरिये राजेंद्र राव ने पहले ही जयपुर साहित्य महोत्सव जैसे आयोजनाओ और फर्जी लेखकों की ओर इशारा कर दिया था | उन्होने अपनी एक अन्य कहानी लौकी का तेल मे राजनीति और पूँजीपतियों के गठजोड़ को दर्शाने की प्रयास किया है इस कहानी मे उन्होने दिखाया हैं की पूंजीपति लोग कैसे अपने फायदे के लिए राजनीती इस्तेमाल करते हैं और राजनीतिक लोग भी अपनी राजनीति चमकाने मे जनता के हितों की कोई परवाह नहीं करते हैं |राजेन्द्र राव की कहानियों मे अपने समय के तनावों को मजबूती से उठाया गया है पूंजीवादी व्यवस्था कैसे अपने जाल फैलाती है और आम जन मानस को अपनी आगोस मे लेकर उनका खून चूसती है , इन सब बातों को वे बड़ी बारीकी से पकड़ते हैं और इस जाल मे उलझे आम आदमी की छटपटाहट को रेखांकित करते हैं|  राजेन्द्र राव जी अपनी कहानियों मे शिल्प के स्तर पर बहुत ज्यादा प्रयोग न करके अपनी बात सीधे सरल शब्दों मे घटनाओं को पिरोते हैं और बिना किसी नाटकीयता के कहानी को आगे बढ़ाते हैं | छोटी छोटी बिम्बावलियों और दृष्यों से कथानक सृजित कर देना कला है राजेन्द्र राव इस कला में सिद्धहस्त है । इस टेक्निक मे लेखक हर स्थान में स्वयम् उपस्थित रहता है ।अक्सर कहानियों मे लेखक कथा कहते कहते नेपथ्य मे चला जाता है वह पाठक की भावानुभूतियों और प्रतिक्रियाओं के बूते कथानक को व गतिशीलता को आगे बढाता रहता है इससे कथानक पूर्ण रूप से तारतम्यता पर निर्भर होता है पाठक का व्यवधान भी लेखक का व्यवधान बन जाता है राव इस स्थिति से परिचित हैं । अतः उन्होने अपनी अधिकांश कहानियों में खुद को भी उपस्थिति करके करके रखा है लेखक गायब नही होता है वह गाईड की तरह कथानक को सपाट और सुग्राह बनाता हुआ चलता है । हलांकि मैं शैली मे उनकी अधिक कहानिया नही है न ही वो उत्तम पुरुष के रूप मे कही उपस्थित है पर अन्य सत्ता के रूप भे विवरण देते समय लेखक की उपस्थिति का जोरदार आभाष होता रहता है यह भी प्रयोगधर्मी जोखिम की तरह है  इस जोखिम मे लेखक सफल हो जाता है एक तरफ वो पाठक को बाँधकर रखने मे सफल होता तो दूसरी तरफ वो चरित्र का आवश्यक विस्तार भी कर देता है । यदि लेखक प्रकारान्तर से अपनी कहानी मे उपस्थित है तो वह अपने मन्तव्यों को जीवन से जुडे सवालों के साथ अधिक सफलता से प्रेषित कर सकता है मुन्सी प्रेमचन्द की बहुत सी कहानियों मे इस विशिष्टता को देखा जा सकता है । लेखक की उपस्थिति से पाठक और लेखक का चिन्तन व आवेग समानान्तर हो जाते है पाठक लेखक की दृष्टि से सीधे जुड जाता है अतः ऐसी कहानियाँ प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से अधिक सफल होती हैं । ऐसी कहानियाँ संवादी भंगिमा से युक्त होकर बेधडक आगे बढती जाती है । इस विशिष्टता के कारण राजेन्द्र राव की कहानिया पाठक के भीतर अरुचि मा ऊब नही उत्पन्न करती है वह और भी अधिक संघातों का गरिमामय प्रतिबिम्ब बनाती हैं
राजेन्द्र राव की कृतियाँ उनके व्यक्तित्व का परिचय कराती है एक ऐसा व्यक्तित्व जिसमे चिन्तन के सूक्ष्म तन्तु व वैचारिक बनावटों की तहें भी उपस्थित हैं । चूँकि लेखक की वैचारिक अवस्थितियाँ साहित्यिक , सांस्कृतिक व सामाजिक परिवेश की पैदाईस होती है लेखक का चतुर्दिक देशकाल ही उसकी विचार प्रक्रिया व चिन्तन को सामाजिक आधार देता है यदि राजेन्द राव जी की कहानियों मे मध्यमवर्गीय परिवारों व उनकी समस्याओं का प्रतिबिम्ब है तो इसके लिए उनका सामाजिक यथार्थ उत्तरदायी है । लेखक अपने आस पास के अपने लोगों को ही कहानी या कविता का विषय बनाता है वह अपने परिवेश से बाहर निकलना नही चाहता यदि वह निकलेगा तो कहानी मे कहीं न कहीं नकलीपन जरूर आ जाएगा और कहानी के निकष जीवन अनुभव के निकष बनकर नही उपस्थित हो सकेगे राव की साहित्यिक प्रेरणा भारत के वृहत्तर सामाजिक जीवन की फरिलब्धि है उनकी कहानियों की इमारत शून्य मे नही बनी कल्पना की अनुकृति नही है वह यथार्थ की इबारत है ।वैचारिक व्यक्तिगत अनुभवों की संवेगशील अभिव्यक्ति है । शिल्प और भाषा के सम्बन्ध मे वो अपने समकालीनों से अलग रहे उन्होने दृष्यात्मक व परिदृष्यात्मक शैली का कुशलतम प्रयोग किया है ये दोनो शैली रेणु की उपन्यासों मे भी उपस्थित है ।जब परिवेश को चरितनायक का दर्जा दिया जाना होता है तभी इस शैली का उपयोग होता है इस शैली से कोई भी घटना अस्वाभाविक नही लगती समूचा परिदृष्य अपने आप उपस्थित होता व स्पष्टीकरण देता चला जाता है । समाज के सांस्कृतिक व पारिवारिक सवालों को लेकर राजेन्द्र राव की कहानियाँ व्यापक माहौल विनिर्मित करती हैं इस सन्दर्भ में वो लेखक और समाजशास्त्री दोनो हैं वे अपनी कहानियों में भारतीय अस्मिता वैयक्तिक अस्मिता जातीय अस्मिताओं के सवालों के साथ बहुलतावादी वर्गीय संस्कृति के सवालों से खुलकर मुठभेड करते हैं ।साथ ही समाज को संचालित करने वाली तमाम शक्तियों का पोस्टमार्डम करते हुए जनता के पक्ष मे विरोध व सपनों का खूबसूरत आधार प्रस्तुत करते हैं राव की कहानियाँ चिर परिचित आस्वाद में खलल डाले बगैर नये कथात्मक आस्वाद से परिचित कराती हैं और बहुत कुछ मनुष्य के उपभोक्तावादी जडताओं और मूढताओं का खंडन करती है । लेखक जितना बेरहम जडताओं के खंडन के पक्ष मे है उतना ही दरियादिल व सजग नव निर्माण के प्रति है इसे उनकी निजी रंगत कहिए या अखिल भारतीय वैश्विक परिवर्तनों की समझ वह लोकलटी के साथ वैश्विकता की ओर कदम बढाते हैं स्थानीयता के साथ भूमंडलीकरण को परखते हैं परिवार के आधार पर मनुष्यता को देखते हैं तो विहंगम मानवता के साथ अस्मिता की बात करते है निः सन्देह राजेन्द्र राव हमारे समय के बडे कथाकार है । जिन्हे हम जानबूझकर उपेक्षित नही कर सकते हैं |
                                                                             @ प्रेम नंदन

बुधवार, 10 अगस्त 2022

कवियों की कथा

#कवियों_की_कथा-30
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   फतेहपुर के प्रेम नंदन एक प्रतिबद्ध युवा कवि हैं! लेखन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रभावित करती है । अब तक उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । उनकी कविताओं में वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ जीवन मूल्यों के रक्षण का आग्रह  है ।साथ ही ग्राम्य जीवन तथा उसकी जटिलताओं की सहज अभिव्यक्ति  है,,!
     आज इस काॅलम की तीसवीं कड़ी में प्रेमनंदन की कविताओं में अभिव्यक्त प्रतिबद्धता से परिचित होंगे,,!

            कवि की कथा=कवि की कलम से 
                      #कवि_कथा

अपने लेखन की शुरुआत के बारे में बात करूं तो जब मैं लिखने के कारणों की ओर झाँकने का प्रयास करता हूँ तो कई प्रश्न एक साथ सामने आ खड़े होते हैं- आखिरकार मैंने लिखना कैसे और क्यों शुरू किया?
साहित्य का मेरे घर-परिवार से दूर-दूर तक कहीं कोई रिश्ता नहीं था तो फिर मुझमें लेखन के संस्कार कहाँ से आए? 

बचपन के गलियारों में लौटने पर कई चीजें स्पष्ट हो जाती हैं, बातें शुरूआत की ओर पहुँच जाती हैं।
लिखने के शुरुआती बीज मेरे मष्तिष्क में शायद अम्मा की लोरियों ने बोए होंगे, कविता के प्रति लगाव शायद अम्मा के गाने-गुनगुनाने की आदत से पैदा हुआ होगा। अम्मा के पास लोकगीतों और कहानियों का अकूत भंडार है। 

उन दिनों अम्मा गांव और रिश्तेदारी में एक अच्छी गउनहर के रूप में प्रसिद्ध थी और विभिन्न तीज-त्योहारों और शादी-ब्याह के अवसरों पर लोग उनको इसी गुण के कारण विशेष रूप से आमंत्रित करते थे।

अम्मा अब भी हमेशा कुछ ना कुछ गाती-गुनगुनाती रहती हैं। बचपन में मुझको नींद तभी आती थी जब अम्मा मीठे स्वर में लोरियां सुनाती थी और सुबह उनकी गुनगुनाने की आवाज सुनकर ही आंखें खुलती थीं। दरअसल अम्मा हमारे सोने के बाद ही सोती थी और हमारे जागने के पहले जाग जाती थी और वे घरेलू कार्य प्रायः गाते-गुनगुनाते हुए ही करती थीं, अब भी उनकी यही दिनचर्या है। यह उस समय की लगभग सभी घरेलू महिलाओं की नियमित दिनचर्या होती थी।

अम्मा की लोरियों के पंखों पर सवार होकर जब मैं स्कूल गया तो वहां भी मेरा परिचय सबसे पहले कविता यानी स्कूल में गाई जाने वाली प्रार्थना से  हुआ। हिंदी की किताब में पहला पाठ भी कविता ही था। अम्मा से मिले संस्कारों के कारण बचपन में कविताएँ मुझे शीघ्र ही याद हो जाया करती थीं शायद यही कारण रहा है कि मुझे अपनी किताब की सभी कविताएं याद रहती थीं और मैं उन्हें अक्सर गुनगुनाया करता था। 

इसी दौरान जिंदगी में पहले प्यार के रूप में रेडियो का प्रवेश हुआ। उस समय घर में दो रेडियो थे, एक बुश का बड़ा रेडियो, लकड़ी की बॉडी वाला, दूसरा बुश की अपेक्षाकृत छोटा रेडियो- मर्फी का प्लास्टिक बॉडी में।
धीरे-धीरे मर्फी वाला रेडियो मेरा सबसे प्यारा और गहरा दोस्त बन गया।अम्मा के गीतों के साथ-साथ, रेडियो पर फिल्मी गाने, लोकगीत, गजलें सुनते हुए मैं बड़ा हुआ। रेडियो से बचपन की ये दोस्ती हाल फिलहाल तक बनी रही।  मेरे बनने-बिगड़ने में रेडियो का भी बहुत बड़ा योगदान है। 

इस तरह गीतों और कविताओं के प्रति मैं बचपन से ही लगाव महसूस करता था लेकिन कविता या और कुछ लिखने के बारे में तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद जब मैं आगे की पढ़ाई के लिए शहर आया तो जहाँ मैं किराए पर रहता था उससे कुछ दूरी पर एक राजकीय पुस्तकालय और राजकीय छात्रवास अगल-बगल स्थित थे। मेरे कई सीनियर और परिचित साथी राजकीय छात्रवास में रहते थे और अखबार, पत्रिकाएं पढ़ने के लिए रोजाना राजकीय पुस्तकालय जाते थे । मैं भी उन्ही के साथ पहले तो प्रायः रविवार और फिर नियमित रूप से लाइब्रेरी जाने लगा था लगा। वहाँ पर कई अखबार, प्रतियोगी पत्रिकायें, साहित्यिक पत्रिकाएं आती थीं। वहीं पहली बार अखबारों और पत्रिकाओं से दोस्ती हुई। उस समय 'संपादक ने नाम पत्र' जैसे कॉलम लगभग सभी अखबारों में होते थे। 

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों कर रहे कई सीनियर साथी संपादक के नाम पत्र लिखते थे और जब वे अखबारों में प्रकाशित होते थे तो बड़े गर्व से हम सबको दिखाते थे कि देखो-मेरा लिखा हुआ अखबार में छपा हैं। उस समय यह देखना काफी रोमांचक अनुभव हुआ करता था। तो इसी की देखा-देखी मैंने भी एक दिन एक पोस्टकार्ड पर विभिन्न सब्जियों की खेतीबाड़ी में प्रयोग होने वाले कीटनाशक दवाओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर एक पोस्टकार्ड में कुछ लिखा और उसे पोस्टबॉक्स में डाल आया और फिर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया। लगभग एक हफ्ते बाद वह पत्र कानपुर महानगर से प्रकाशित होने वाले एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अखबार के 'संपादक के नाम पत्र' वाले कॉलम में अपने लिखे शब्दों को छपा हुआ देखकर सचमुच आँखों में आँसू आ गए थे। उस घटना के बाद पत्र लिखने का एक सिलसिला ही चल पड़ा। साथियों के साथ खूब पत्र लिखे जाते, कुछ छपते, कुछ न छपते, लेकिन अब इस बात की परवाह न करते हुए जब भी समय मिलता, खूब पोस्टकार्ड लिखे जाते, पोस्ट किए जाते।

हम जिस राजकीय पुस्कालय में पढ़ने जाते थे, शहर में मेरे जैसे तमाम गँवई लड़कों के लिए एकमात्र अड्डा था। यह पुस्कालय जिला विद्यालय निरीक्षक के आधीन था । वहाँ पर सिर्फ एक लाइब्रेरियन और एक चपरासी नियुक्त था। दोनों बहुत मक्कार थे। समय से लाइब्रेरी न खोलना, जल्दी बन्द कर देना , मेम्बरशिप लेने के बावजूद किताबें इश्यू करने में आनाकानी करना, विभिन्न मासिक पत्रिकाओं को पहले अपने घर ले जाना फिर हफ़्ते दो हफ्ते बाद लाइब्रेरी लाना जैसी अनेक करतूतों से  से हम सभी पढ़ने वाले छात्र परेशान रहते थे। हम लोग आए दिन लाइब्रेरियन और चपरासी की शिकायत जिला विद्यालय निरीक्षक से करते, लेकिन उनकी आदतें सुधरने का नाम ही नहीं ले रहीं थी। इन सबसे परेशान होकर हम लोगों ने लाइब्रेरी की समस्याओं और लाइब्रेरियन और चपरासी की शिकायत के रूप में कई पोस्टकार्ड विभिन्न स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों को भेजे। इन शिकायती पत्रों को कई अखबारों ने प्रकाशित किया। जिनमें से कई साथियों के पत्रों के साथ मेरा लिखा शिकायती पत्र भी प्रकाशित हुआ। कुछ स्थानीय अखबारों ने इसे खबर के रूप में छापा। अखबारों में प्रकाशित होने के कारण यह एक बड़ा मुद्दा बन गया, जिसकी आँच जिला विद्यालय निरीक्षक तक पहुँची। उन्होंने इन खबरों को संज्ञान में लेते हुए एक दिन छात्रों के हमारे ग्रुप को अपने ऑफिस में बातचीत के लिए बुलाया। वहाँ पर उन्होंने बड़े ध्यानपूर्वक हमारी शिकायतें सुनी और लाइब्रेरियन व चपरासी को फटकार लगाते हुए आइंदा से नियमानुसार कार्य करने की चेतावनी दी।

जिला विद्यालय निरीक्षक महोदय ने हम लोगो से उन पत्रिकाओं और अखबारों की सूची मांगी, जो हम लोग पढ़ना चाहते थे, लेकिन लाइब्रेरी में नहीं आते थे। उन्होंने उन पत्रिकाओं, अखबारों की लाइब्रेरी भिजवाने की व्यवस्था की। जिसके बाद लाइब्रेरी की व्यवस्था में काफी सुधार हुआ।

इस घटना के बाद पहली बार मुझे शब्दों की ताकत का एहसास हुआ और उसी क्षण मैंने शब्दों से दोस्ती कर ली। अखबारों और प्रतियोगी पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़ाव और गहरा हुआ। 

इसी दौरान किसी पत्रिका या किताब में (ठीक से याद नहीं आ रहा) जब मैंने अज्ञेय की 'छंदमुक्त' कविता 'हिरोशिमा' पहली बार पढ़ी तो अचानक ही दिमाग में यह विचार बिजली की तरह कौंधा कि इस तरह की कविता तो मैं भी लिख सकता हूँ। एक यह महज एक विचार ही था। मैं उस क्षण एक पंक्ति भी नहीं लिख सका।

इसके दो-तीन महीने बाद ही, जहाँ मैं रहता था , वहीं पड़ोस में एक दुर्घटना घट गई, एक नवब्याहता को जिंदा जला दिया गया। इस दुर्घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया और मेरे दिमाग को बहुत उद्देलित और बेचैन किया। यह बेचैनी कई दिनों तक दिमाग को मथती रही। अन्ततः एक दिन इस बेचैनी से मुक्ति पाने के लिए इसे शब्दों में ढालने के प्रयास में डायरी और पेन लेकर लिखने बैठ गया। उस दिमाग मे पहले से पढ़ी हुई अज्ञेय की कविता 'हिरोशिमा' पूरी तरह हावी थी और उसी से प्रेरित होकर कागज पर एक कविता जैसा कुछ लिख डाला। यह मेरी पहली साहित्यिक रचना थी। कविता का शीर्षक रखा - 'अतृप्त इच्छाओं की वेदी'। 

संयोग से वह कविता एक स्थानीय साप्ताहिक पत्र में छप भी गई। इससे उत्साहित होकर  कुछ और कविताएँ, गीत और लघुकथाएँ लिखीं जो विभिन्न स्थानीय साप्ताहिक पत्रों और दैनिक अखबारों की रविवासरीय परिशिष्ट में छपीं। इस तरह मेरे लेखन का सिलसिला शुरू हुआ।

#कविताएं=
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01- - संकट

जिस समय बौर से लदा-फ़दा
मह-मह गमकना चाहिए
बसंत के उस मौसम में
मुरझाई आंखों से
आठ-आठ आँसू रोते हुए
गा रहा है कोई उदास गीत
पिता का रोपा हुआ
आम का पेड़।

ये रोना सिर्फ आम का रोना नहीं है
बल्कि रोना है उस
समूची पीढ़ी का
जो पेड़ों को अपने बच्चों सा पालती थी

अब पेड़ और
पेड़ों को चाहने वाले
दोनों संकट में हैं
और इस संकट से उबरने का
कोई भी उपाय
किसी भी नदी, हवा, मिट्टी
या मौसम के पास नहीं है।

02-- मछुआरा मन 

मछुआरा मन
चाहे कुछ ऐसा... 

खेतों, कछारों में
नदियों संग घूमें
झूमती-मचलती 
हवाओं संग झूमें

बारिश की रिमझिम में
पेड़ हँसें, फूल खिलें
जीवन की सुविधाएं
सबको भरपूर मिलें

चिड़ियों को पेड़ मिलें
पशुओं को जंगल
आदमी को बस्ती मिलें
सबका हो मंगल

मछुआरा मन
चाहे कुछ ऐसा…

03 -  गाँव की पगडंडियाँ

हर बार गाँव से लौटते समय 
कन्धों पर झूल-झूल जाती हैं 
मेरे गाँव की पगडंडियाँ
वे भी आना चाहती हैं शहर 
मेरे साथ 

शहर को 
समझता हूँ  
मैं उनसे बेहतर 
इसलिए समझाता हूँ- 
यहीं रहो तुम सब 
यहीं तुम सुरक्षित हो 
जाओगी शहर तो 
गुम हो जाओगी तुम 
बचेगा नहीं नामोनिशान तुम्हारा 

मेरे कंधों से उतरकर 
थोड़ा गुस्सा और बहुत-सी निराशा से 
ताकती हैं एकटक 
वे मुझे देर तक 

हर बार छोड़ आता हूँ 
गाँव कि सरहद पर खड़े
बूढ़े बरगद के नीचे उन्हें 

सोचता हूँ- 
किसी दिन यदि सचमुच में 
शहर आ गईं 
गाँव कि पगडंडियाँ 
तो क्या होगा उनका ?

वर्षों से 
इसी असमंजस में पड़ा हूँ मैं 
गाँव और शहर के 
ठीक बीचोबीच 
धोबी का कुत्ता बना खड़ा हूँ मैं ।

04- बीता समय उदास है

उदास है 
गाँव की सरहद पर
चैकीदार-सा खड़ा
बूढ़ा बरगद 
क्योंकि लोग उसकी छाया में
बैठने, बतियाने 
अब नहीं आते 

सूना है 
बड़े कुएँ का पनघट 
क्योंकि नही गूँजती
चूड़ियों, पायलों की झंकार
बाल्टी, गागर की  खनखनाहटें 
अब नहीं सुनाई देतीं यहाँ
लड़कियाँ-औरतों की खिलखिलाहटें 

उदास है
जीवन के मद्धिम अलाव में पकी
अनुभवों की गठरी लिए बैठी  
वृद्धावस्था 
क्योंकि लोग उसके पास
राय-मशविरा करने
उनके सुख-दुःख सुनने 
अब नहीं आते ।

05 - मेहनतकश आदमी

घबराता नहीं काम से
मेहनतकश आदमी ,
वह घबराता है निठल्लेपन से

बेरोजगारी के दिनों को खालीपन
कचोटता है उसको,
भरता है उदासी
रोजी-रोटी तलाश रही उसकी इच्छाओं में

पेट की आग से ज्यादा तीव्र होती है
काम करने की भूख उसकी
क्योंकि भूख तो तभी मिटेगी
जब वह कमाएगा
नही तों क्या खाएगा

सबसे ज्यादा डरावने होते हैं
वे दिन
जब उसके पास
करने को कुछ नहीं होता

रोजी-रोटी में सेंध मार रहीं मशीनें
सबसे बड़ी दुश्मन हैं उसकी
साहूकार, पुलिस और सरकार से
यहॉ तक कि भूख से भी
वह नहीं डरता उतना
जितना डरता है
मशीनों द्वारा अपना हक छीने जाने से

रोजगार की तलाश में
वह शहर-शहर ठोकरे खाता है
हाड़तोड़ मेहनत करता है
पर मशीनों की मार से
अपनी रोजी-रोटी नहीं बचा पाता,
तब वह बहुत घबराता है ।

06- निर्जीव होते गांव 

रो रहे हैं हँसिए
चिल्ला रही हैं खुरपियाँ
फावड़े चीख रहे हैं 
कुचले जा रहे हैं
हल, जुआ, पाटा,
ट्रैक्टरों के नीचे 

धकेले जा रहे हैं गाय-बैल, 
भैंस-भैसे कसाई-घरों में 

धनिया, गाजर , मूली ,  टमाटर ,
आलू, लहसुन ,प्याज, गोभी ,
दूध ,दही, मक्खन, घी ,
भागे जा रहे हैं
मुँह-अँधेरे ही शहर की ओर
और किसानों के बच्चे
ताक रहे हैं इन्हें ललचाई नजरों से 

गाँव में 
जीने की ख़त्म होती 
संभावनाओं से त्रस्त
खेतिहर नौजवान पीढ़ी
खच्चरों की तरह पिसती है  
रात-दिन शहरों में
गालियों की चाबुक सहते हुए 

गाँव की जिंदगी
नीलाम होती जा रही है
शहर के हाथों ;
और धीरे- धीरे ...
निर्जीव होते जा रहे हैं गाँव 

07– गाँव, नदी और पेड़ का भविष्य 
 
मेरे गाँव के 
खूबसूरत चेहरे को 
बदरंग करके 
बिजूके की तरह  
टांग दिया है 
बाजार ने 
लकडहारे के हाथों बिक चुके 
रेत हो चुकी नदी के किनारे खड़े 
अंतिम पेड़ की 
उदास डालों पर
 
अब पेड़ चाहे तो 
चेहरा पहन ले 
या फिर चेहरा 
पेड़ हो जाए 
और फिर दोनों 
रेत को निचोड़कर
मुक्त कर दें नदी को 
 
ऐसी ही दो-एक संभावनाओं पर 
टिका है 
गाँव, नदी और पेड़ का भविष्य 

08- सपने जिंदा हैं अभी

मर नहीं गए हैं सब सपने 
कुछ सपने जिंदा हैं अभी भी

एक पेड़ ने
देखे थे जो सपने
हर आँगन में हरियाली फ़ैलाने के 
उसके कट जाने के बाद भी
जिंदा हैं वे अभी
उसकी कटी हुई जड़ों में 

एक फूल ने
देखे थे जो सपने
हर माथे पर खुशबू लेपने के
उसके सूखकर बिखर जाने के बाद भी
जिंदा हैं वे अभी
उसकी सूखी पंखुड़ियों में 

एक तितली ने
देखे थे जो सपने
सभी आँखों में रंग भरने के 
उसके मर जाने के बाद भी
जिंदा हैं वे अभी
उसके टूटे हुए पंखों में 

एक कवि ने
देखे थे जो सपने
समाजिक समरसता के, 
आडंबर, पाखंड,  जात-पाँत,  छुआछूत से 
मुक्त समाज के 
उसके मार दिए जाने के बाद भी 
जिंदा हैं वे अभी
उसकी रचनाओं में 

मर नहीं गए हैं सब सपने 
कुछ सपने जिंदा हैं अभी भी। 

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 #परिचय=

जनपद फतेहपुर(उ0प्र0) के एक छोटे से गाँव फरीदपुर में 25 दिसंबर 1980 को जन्म. 
 
शिक्षा एम0ए0(हिन्दी), बी0एड0, पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा.
 
लेखन और आजीविका की शुरुआत पत्रकारिता से. दो-तीन वर्षों तक पत्रकारिता करने तथा तीन-चार वर्षों तक भारतीय रेलवे में स्टेशन मास्टरी और कुछ वर्षों तक इधर-उधर भटकने के पश्चात सम्प्रति अध्यापन.
 
कविताएं कहानियां, लघुकथायें एवं आलोचना आदि का लेखन और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, ई-पत्रिकाओं एवं ब्लॉगों में प्रकाशन.
 
दो कविता संग्रह 'सपने जिंदा हैं अभी'
और 'यही तो चाहते हैं वे' प्रकाशित. 
 
मोबइल – 09336453835 
ईमेल - premnandanftp@gmail.com
पता-शकुन नगर, सिविल लाइन्स,
      फतेहपुर (उ0प्र0)

गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

प्राथमिक शिक्षा : दशा और दिशा

प्राथमिक शिक्षा कि दुर्दशा के लिए केवल अध्यापक ही दोषी नहीं !

   आजकल हमारे जनपद फतेहपुर में अधिकारियों और मीडिया द्वारा प्राथमिक शिक्षा  की गुणवत्ता को सुधारने के लिए  को चलाये जा रहे सघन अभियान में प्राथमिक शिक्षा में व्याप्त कमियों का जो ठीकरा   केवल  प्राथमिक शिक्षकों के सिर फोड़ा जा रहा है , वह पूरी तरह से एकतरफा है और सारे  शिक्षकों की गलत तस्बीर पेश कर रहा है जिससे अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान अध्यापकों को बड़ा क्षोभ है !

       यह बात सही है कि आज पूरे देश कि शिक्षा , चाहे वह प्राथमिक हो या माध्यमिक या उच्च शिक्षा हो , पूरी तरह से पटरी से उतरी हुई है , लेकिन यहाँ हम केवल प्राथमिक शिक्षा कि बात करें तो उसकी स्थिति बड़ी ही दयनीय है ! लेकिन इसके लिए सिर्फ शिक्षकों को ही पूरी तरह से दोषी ठहराना नितांत गलत एवं दुर्भावना पूर्ण है !

     दरअसल शिक्षा एक बहुकोणीय व्यवस्था है जिसका एक कोण शिक्षक है ! अन्य कोण शैक्षिक व्यवस्था , आभिवावक .बच्चे , किताबे , पाठ्यक्रम ... आदि आते हैं ! इसलिए शिक्षा कि गुणवत्ता के लिए अकेले शिक्षक को ही पूर्णरूपेण जिम्मेदार मानना सरासर नाइंसाफी है !  
 
     शिक्षा कि गुणवत्ता में ये गिरावट एक दिन में नहीं आ गयी है इसके लिए हमारी पूरी शैक्षिक व्यवस्था , अभिभावक , बच्चे एवं अध्यापक बराबर के दोषी हैं ! प्राइमरी स्कूलों की अव्यवस्थाओं से सभी परिचित हैं ! अध्यापकों की कमी , संशाधनो का अभाव , अध्यापकों को शिक्षणेत्तर  कार्यों में लगाना , अभिभावकों का असहयोग , बच्चों का नियमित रूप से विद्यालय न आना , शैक्षिक अधिकारियों के नियमित निरीक्षण न होना  आदि .... आदि कमियों के चलते ही आज प्राथमिक शिक्षा रसातल में पहुँच चुकी है लेकिन इसके लिए केवल अध्यापक को दोषी ठहराने और उसको ही बलि का बकरा बनाने से इसका उद्धार नहीं होने वाला है !

          अधिकारी यदि वास्तव में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारना चाहते हैं तो उन्हें इसके सारे कोणों में सामंजस्यपूर्ण माहौल तैयार करना होगा और सभी की बराबर की जवाबदेही तय करनी होगी , तभी प्राथमिक शिक्षा को पटरी पर लाया जा सकता है !

      एक और बात - पहली बार अधिकारी और मीडिया , दोनों प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता की बात कर रहे हैं ,यह प्राथमिक शिक्षा के लिए एक शुभ संकेत है , नहीं तो अभी तक मीडिया और आधिकारियों द्वारा सिर्फ मिड डे मील की कमियाँ , शिक्षकों का स्कूल न जाना , वजीफा और ड्रेस बितरण की कमियाँ , भवन निर्माण की खामियों की ही उजागर किया जाता था ! यह पहली बार है की इनके द्वारा शैक्षिक गुणवत्ता की बात की जा रही है , लेकिन यह काम पूरी तरह से एकपक्षीय किया जा रहा है , जिसमे न तो शिक्षकों की बात सुनी जा रही है और न ही उनको इसमें शामिल किया जा रहा है ! खासकर मीडिया इसमें बिलकुल ही नकारात्मक भूमिका निभा रहा है और शिक्षा में आई गिरावट के लिए पूरी तरह से शिक्षकों को ही कटघरे में खड़ा करने शिक्षकों की गरिमा को तार-तार  करने का काम कर रहा है !

   मीडिया और अधिकारियों को यह बात समझनी चाहिए कि प्राथमिक शिक्षा में आई इस गिरावाट में शिक्षक , अभिवावक , बच्चे , शैक्षिक अधिकारी , शैक्षिक व्यवस्था , आदि सभी बराबर के भागीदार हैं , केवल शिक्षकों के सिर इसका ठीकरा फोडना बिलकुल भी ठीक नहीं है ! 

   आशा है , प्राथमिक शिक्षा के उन्नयन के लिए इससे जुड़े हुए सभी लोग , एक दूसरे कि टांग खींचने के बजाय कंधे से कंधा मिलाकर प्रयास करेंगे और मीडिया भी इसमें हमारा सहयोग करेगा और प्राथमिक शिक्षा एक बार फिर से अपना खोया हुआ गौरव हासिल करेगी !

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

अखनई झील

जलकुंभी और अतिक्रमण ने निगल लिया अखनई झील का असीम सौंदर्य
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एक जमाने में कमल के फूलों और कमल गट्टों के लिए पूरे जिले में मशहूर और अपने आसपास के सैकड़ों गाँवों को पानी के साथसाथ रोजी-रोटी, और आजीविका देने वाली अखनई झील इन दिनों अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। 

हुसेनगंज कस्बे के पास स्थित  दस-बारह किलोमीटर लंबी और एक-डेढ़ किलोमीटर चौड़ी अर्ध चंद्राकर रूप में फैली अखनई झील किसी समय अपने किनारे स्थित गनपतपुर, फरसी, पतरिया, धरमदासपुर, फरीदपुर, औढ़ेरा सहित सैकड़ों गाँवों को आजीविका उपलब्ध कराती थी। गरमी आते ही कमल के गुलाबी फूलों से भर जाती थी यह झील और गुलाबी सौंदर्य की अनोखी आभा और कमल के फूलों की भीनी-भीनी खुशबू से पूरा क्षेत्र में गमकने लगता था।

कमल के पत्ते उस समय शादी-विवाह व अन्य कार्यक्रमों में पत्तल के रूप में प्रयोग किए जाते थे। कमल के पत्तों के लिए दूर-दूर से लोग आते थे और झील से कमल के पत्ते काटकर या पैसे देकर आसपास के गाँवों के लोगों से कटवाकर ले जाते थे।  ग्रामीण कमल के फूल और जड़ें बाजार में बेचकर अपनी रोजी-रोटी चलाते थे। 

इस झील में सैकड़ों प्रजाति की मछलियां पाई जाती थीं जो ग्रामीणों की आजीविका का बहुत बड़ा स्रोत थीं। जिन्हें आसपास के ग्रामीण लोग खाते थे और बाजारों में बेचकर अपना और अपने परिवार का पेट भरते थे।

इस झील में विभिन्न प्रकार के जलीय जीव रहते थे जिनमें प्रमुख रूप से ऊदबिलाव, कछुए और जलीय साँप रहते थे। शिकारियों ने मछलियों के साथ ही ऊदबिलाव और कछुए भी खत्म कर दिए। यह झील सैकड़ों प्रकार के स्थानीय पक्षियों का रहवास हुआ करती थी और इस झील में लाखों प्रवासी पक्षी, प्रवास के लिए आते थे। शिकारियों के कारण स्थानीय पक्षी तो खतम हो गए ही, प्रवासी पक्षियों ने भी झील में आना छोड़ दिया है।

लेकिन अब यह सब बीते दिनों की बातें हैं। अब यह जीवनदायिनी झील अपने अस्तित्व की लड़ाई हारने के कगार पर खड़ी है औरबारहों महीने पानी से लबालब भरी रहने वाली झील अपने दुर्भाग्य पर आठ-आठ आँसू रो रही है।

सबसे पहले इस झील के गले का फंदा बनी- जलीय खरपतवार जलकुंभी। जलकुंभी ने पूरी झील को ढक लिया और कमल के पौधों को बेदखल करने का काम किया। इससे इस झील के अनोखे सौंदर्य को ग्रहण लग गया। 

शिकारियों ने ऊदबिलाव , कछुए और मछलियों को पकड़ने के लिए कई बार कीटनाशक दवाओं का प्रयोग भी किया और पूरी झील को छोटे-छोटे बंधों में बाँधकर  झील के असीम सौंदर्य को ही बंधक बना लिया जिससे पूरी झील का जलीय पारिस्थितिकी तंत्र चौपट हो गया। जिससे इस झील में आने वाले लाखों प्रवासी पक्षियों की आवाजाही बंद हो गई है।

अतिक्रमण ने इसका इतिहास ही नहीं, इसके भूगोल को ही बदल डाला है। हजारों बीघे में फैली यह झील दिन प्रतिदिन सिकुड़ती जा रही है और इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। दो-तीन साल पहले #स्वामी_विज्ञानानंद और जलपुरूष #राजेंद्रसिंह की अगुवाई में सैकड़ों ग्रामीणों ने इसको बचाने के लिए पदयात्रा की थी । जिला प्रशासन ने उस समय इस झील के  सरंक्षण करने के आश्वासन भी दिए थे। लेकिन उन प्रशासनिक आश्वासनों का क्या हुआ किसी को पता नहीं है!

ध्यातव्य रहे कि यह प्रसिद्ध अखनई झील ससुर खदेरी नदी न02 का उद्गम स्थल भी है।
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-- प्रेम नंदन
09336453835
premnandanftp@gmail.com

गुरुवार, 4 नवंबर 2021

एक देश बारह दुनिया

बिना किसी राजनीतिक प्रोपोगंडा के जन सरोकारों की जमीनी पत्रकारिता कैसे की जाती है, इसका बेहतरीन उदाहरण है - एक देश बारह दुनिया

-- प्रेम नंदन

हम एक ऐसे देश में रहते हैं जो भिन्नताओं का सबसे बड़ा समुच्चय है। इस देश जैसी भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विभिन्नता शायद ही दुनिया के किसी देश में हो! दरअसल यह देश अपने अंदर एक नहीं, हजारों दुनिया समेटे हुए है और उन्ही हजारों दुनियायों में से हासिए की ऐसी ही बारह आवाजों का स्याह, धूसर और दर्दनाक आख्यान है युवा पत्रकार शिरीष खरे की चर्चित किताब- 'एक देश बारह दुनिया'.


 

'वह कल मर गया' दरअसल इस देश की नागरिक व्यवस्था के मर जाने की अनुगूँज है और इसका जीता जागता उदाहरण है - महाराष्ट्र का मेलघाट। जहाँ आज भी कुपोषण से हजारों बच्चों की मौत हो जाती है और ये मौतें किसी भी सरकार के लिए आंकड़ों से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। जिस देश में लाखों टन अनाज रखरखाव के अभाव में सड़ जाता हो उस देश में भुखमरी और कुपोषण से होने वाली मौतें राष्ट्रीय शर्म का विषय होनी चाहिए।


कमाठीपुरा, महाराष्ट्र की पिंजरेनुमा कोठरियों में कैद होकर सड़ रही बदनसीब जिंदगियों की स्याह इबारतें हर संवेदनशील इंसान को झकझोरने के लिए काफी हैं। अधिकतर मजबूरी में और अपनों की बेवफाई का शिकार युवतियां इस नर्क में अपनी जिंदगी होम कर रहीं हैं लेकिन वे अपने बच्चों को इस दुनिया से दूर रखने के उदास सपनों के सहारे अपनी जिंदगी को किसी तरह से ढो रहीं हैं।



जीवन की मूलभूत सुविधाओं के अभाव में आज भी देश के करोड़ों लोग अपने देश में ही परदेसियों जैसा जीवन जीने को अभिशप्त हैं और देश की तमाम जगहों में से एक ऐसी ही जगह है महाराष्ट्र का कनाडी बुडरुक गाँव; जहाँ के बाशिन्दों के पास आज भी अपनी नागरिकता को साबित करने वाले सबूतों के लिए एक ऐसे कागज के टुकड़ों के लिए मोहताज अपढ़ बंजारे रहते हैं, जो उन्हें देश का नागरिक घोषित कर सके।



भले ही आजादी के इतने सालों बाद भी विकास की चकाचौंध से देश की बेहिसाब आबादी वंचित हो लेकिन फ़िल्मी चकाचौंध से देश की मिचमिचाती आँखे चुँधियाई हुई हैं। कुछ ऐसी ही कहानी है महाराष्ट्र के आष्टी गाँव में रहने वाले नट समुदाय के लोगों की। इस गाँव के घरों में विभिन्न फ़िल्मी सितारों के पोस्टरों से सजी दीवारें इस बात की गवाही देती हैं कि अपनी जान जोखिम में डालकर फिल्मी सितारों के खतरनाक स्टंट करने वालों में इस गाँव के तमाम नट हैं जिनका उपयोग करके उन्हें उनके बदहाल पर छोड़ दिया गया है।


रोजी-रोटी के लिए पलायन इस देश में कोई समस्या ही नहीं है जैसे। आज भी देश के करोड़ों लोग रोजीरोटी की तलाश में दर-दर भटकते रहते हैं। देश के हजारों गाँवों की तरह ही महाराष्ट्र का मस्सा गाँव भी पलायन की मार से कराहते जीवन का नंगा यथार्थ है। गन्ना के खेतों पर कार्य करने वाले, दूसरों की थाली में मिठास घोलने वाले मजदूरों का जीवन किसी कड़वी चीनी से कम नहीं है।


'सूरज को तोड़ने जाना है' महाराष्ट्र के सुदूरवर्ती महादेव बस्ती की पारधी जनजाति की कहानी है जिसे अंग्रेजों ने अपराधी की श्रेणी में रख दिया था। पारधी जनजाति के शिक्षा की मुख्य धारा में जोड़ने वाले अध्यापकों और इस कार्य में सहयोग करने वाले ग्रामीणों की जिज्ञासा और जिजीविषा से ही इस समुदाय के लोग आज सूरज को तोड़ने के सपने देख रहे हैं यह देखना सुखद अनुभव है।


'मीराबेन को नींद नहीं आती' किसी सोपओपेरा का एपिसोड नहीं बल्कि जिंदगी भर खदेड़े/उजाड़े

जाने का एक भयानक और दर्दनाक धारावाहिक है। यह दर्द हर महानगरों की हौलनाक सच्चाई है। गुजरात के प्रमुख शहर सोविएत का 'संगम टेकरी' मोहल्ला इसका ताजा शिकार है। झोपड़पट्टी में रहने वाले हजारों लोगों को रात-रात भर नींद नहीं आती है कि पता नहीं अगली सुबह उनको उजाड़ने की सुबह न हो!


नदियों को मैदान बनाने का खेल पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे नापाक खेल है। देश की अधिकांश नदियों को वे बाँधों में बांधकर दुधारू गाय जैसा दोहन कर रहे हैं और विकास के नाम पर विनाश की खतरनाक इबारत लिख रहे हैं। 

विकास के गिद्ध नदियों को नोच-नोच कर खाते जा रहे हैं और यह सिर्फ नर्मदा की ही बात नहीं है। देखना - एक दिन वे देश की सारी नदियों को मैदान बना डालेंगे और हम सिर्फ आठ-आठ आँसू रोने के अलावा कुछ भी नहीं कर पाएंगे।


इस देश में आज भी करोड़ों लोगों के लिए 'सुबह' नहीं हुई है! और सुबह होगी ही इसे विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता! जैसे राजस्थान के बायतु में रहने वाली मीरा और राजौ अन्याय, अत्याचार और दबंगई के गहन अंधकार में गर्दन तक धँसी हुई सुबह होने के इंतजार में आज भी खड़ी हैं।


दंडकारण्य का नाम सुनते ही कान चौकन्ने हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ का एक ऐसा इलाका जहां आज भी पुलिस/सुरक्षाकर्मी और इस इलाके के रहने वाले आदिवासी एक दूसरे की जान के दुश्मन बने हुए हैं। इसके लिए लाल आतंक, लाल गलियारा, और न जाने क्या-क्या नाम प्रयोग किए जाते हैं। कोई भी सरकार आदिवासियों की समस्याओं की जड़ तक नहीं पहुँचना चाहती उन्हें बस पूंजीपतियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और आदिवासियों को उनकी जमीन, जंगल से खदेड़ने से मतलब है। 

दंडकारण्य यूँ ही लाल नहीं है, आखिरकार कुछ तो कारण होंगे। जब तक कारणों का निवारण निष्पक्षता से नहीं किया जायेगा,  दंडकारण्य यूँ ही लाल बना रहेगा!



मकदूद्वीप, छत्तीसगढ़ का अकूत सम्पत्तियों से भरपूर एक ऐसा टापू है जो कभी गुप्त कालीन पुरावैभव की कहानी बयां कर सकते थे। आज पूरी तरह से खंडहर हो चुके इस द्वीप में सातवीं से दसवीं शताब्दी पुरानी सभ्यता का संसार ठहरा हुआ है। यहाँ इतिहासकारों को प्राचीन सभ्यताओं के बारे में तमाम जानकारियां मिल सकती हैं क्योंकि ये खंडहर एक गाइड की तरह सदियों से इतिहासकारों के इंतजार में खड़े हैं!



छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा ऐसे ही नहीं कहा जाता। यहाँ पर धान की सैकड़ों प्रजातियों की खेती की जाती है लेकिन अब यह कटोरा खाली रह जाने को अभिशप्त होता जा रहा है। कभी बाढ़, कभी सूखा कभी अन्य प्राकृतिक आपदाएं इस कटोरे को धान की जगह राहत के धोखे से भरने की कोशिश में और खाली करती जा रही हैं। सरकार, अधिकारी और बाबूवर्ग मिलकर जनता को मिलने वाली राहत डकार जाते हैं और जनता के पेट का कटोरा खाली का खाली ही रह जाता है।


पत्रकार शिरीष खरे की चर्चित किताब 'एक देश और बारह दुनिया' से गुजरते हुए देश के विभिन्न इलाकों की जमीनी हकीकत को पूरी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। और यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि बिना किसी राजनीतिक प्रोपोगंडा के जन सरोकारों की जमीनी पत्रकारिता कैसे की जाती है, इसका बेहतरीन उदाहरण है - एक देश बारह दुनिया।

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किताब - एक देश बारह दुनिया

(रिपोर्ताज -समाज और संस्कृति)

लेखक - शिरीष खरे

प्रकाशक - राजपाल प्रकाशन, नई-दिल्ली

पेज-208

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प्रेम नंदन

09336453835

premnandanftp@gmail.com



मंगलवार, 3 अगस्त 2021

वर्जनाओं के विरुद्ध तनी हुई मुट्ठियाँ हैं प्रधुम्न कुमार सिंह की कविताएं


वर्जनाओं के विरुद्ध तनी हुई मुट्ठियाँ
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- : प्रेम नंदन

प्रद्युम्न कुमार सिंह अन्याय, अत्याचार, असमानता, शोषण और भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों को प्रतिरोध की भाषा में ढालकर आम जनमानस की दबी हुई चुप्पियों को स्वर देने वाले जमीनी, प्रतिबद्ध और लोकधर्मी चेतना से लैस कवि हैं। वे अपनी कविताओं के विषय अपने आसपास रोजमर्रा के जीवन में घटने वाली घटनाओं से चुनते हैं। "कुछ भी नहीं होता अनन्त" उनका पहला कविता संग्रह है जिसमें उनकी 60 कविताएं संकलित हैं। इस कविता संग्रह में शामिल उनकी अधिकांशतः कविताओं का मूल स्वर प्रतिरोध है, जो सीधे पाठकों के मर्म को बेधती हुई उन्हें संवेदनशील बनाती हैं। उनकी कविताओं में प्रतिरोध का ये तेवर महसूस करें -

"काँप रहे थे निकलते अल्फाज 
दबती जा रही थी 
सिसकती आवाजें 
जाने क्यों नहीं 
आ रहा था समझ 
माजरा कुछ 
फिर भी खड़ा था 
ताने सीना 
प्रतिरोध के साथ"

(प्रतिरोध के साथ)

पूंजीवाद, बाजारवाद और भूमंडलीकरण से हमारे आम जनमानस पर पड़ने वाले प्रभाव कवि की संवेदनशीलता को उद्वेलित करते हैं। भूमंडलीकरण ने आम जनजीवन को बहुत गहरे ढंग से प्रभावित किया है और हम उसकी मौजूदगी को नकार नहीं सकते हैं।इसी चिंता को आवाज देते हुए वे कहते हैं-

"आज जब भूमंडलीकरण 
एक हकीकत बनकर 
हमारे समक्ष सीना ताने खड़ा है 
हम नहीं कर सकते इंकार 
उसकी उपस्थिति से 
और न ही रह सकते हैं 
उससे अछूते 
बावजूद इसके हम 
व्यक्त कर सकते हैं 
अपनी अभिव्यक्ति 
और उठा सकते हैं 
उसके विरुद्ध 
अपनी बुलंद आवाज।" 

(कुछ भी नहीं होता अनन्त)

हमारे समाज में  स्त्रियों की स्थिति हमेशा से ही दोयम दर्जे की रही है, और इस स्थिति के लिए काफी हद तक स्त्रियां भी जिम्मेदार हैं। उनको अपने प्रति हो रहे हर तरह कर भेदभाव के  खिलाफ आवाज उठानी होगी तभी उनके जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं। उन्हें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी और तोड़नी होंगी अपने पैरों की बेड़ियाँ- 

"तुम करती रही अपने साथ
हमेशा छल
इसीलिए कभी भी नहीं 
जुटा सकी 
प्रतिबद्धताओं से मुकरने का साहस और न ही समझा पाई 
अपनी असहमतियों के 
पीड़ायुक्त भाव"

(यशोधरा)

अपनी एक कविता में कवि औरतों को अपनी चाल-ढाल बदलने और तनकर खड़े होकर अपनी आवाज उठाने के लिए प्रेरित करता है -

"औरतों थोड़ा ऐंठकर 
चलना सीखो 
सीधा चलना तुम्हारे लिए 
घातक है 
निगाहों को झुकाने की अपेक्षा 
तानना सीखो 
तभी तुम्हारी ओर 
नापाक इरादों के बढ़ते हुए 
कदम रुकेंगे"

(औरतों)

आजादी के दिनों से ही कश्मीर का मुद्दा हमारे देश और पड़ोसी मुल्क के बीच तनाव का मुख्य मुद्दा बना हुआ है और सियासतदानों को अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का एक जरिया भी। कवि दोनों देशों के राजनीतिक लोगों से सवाल करता है -

" कश्मीर मुद्दा है जिनका 
क्या वे जानते हैं 
अच्छी तरह से 
कश्मीर को? 
या फिर जानते हैं 
कश्मीरियत को?
 या मात्र फ़नों में 
बिष भरकर ही 
घूम रहे हैं।"

(कश्मीर मुद्दा है जिनका)

देश में किसानों की क्या दुर्गति है, यह किसी से छिपा नहीं है। सेठ साहूकारों और बैंको से कर्ज ले लेकर खेतीबाड़ी करने वाले किसान, जब फसल अच्छी न होने, या प्राकृतिक आपदा जैसी अन्य वजहों से नष्ट हो जाने के कारण जब लिए गये इन कर्जों को उतार नहीं पाते तो मजबूरन आत्महत्या करने को विवश हो जाते हैं, वस्तुतः ये आत्महत्या नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा की गई जघन्यतम हत्याएं होती हैं। ऐसी स्थिति में व्यवस्था और उसके कलपुर्जो के द्वारा किसान को शराबी और उसके परिवार की औरतों को  बदचलन घोषित करने में ज़रा भी शर्म नहीं आती-

"वो जानते हैं सरकारी बैंक की नोटिस,
साहूकार के रुतबे के बीच बैठा हत्यारा
हत्या को आत्महत्या साबित कर रहा है। 
मगर वो चाहते हैं कि बिना किसी प्रतिरोध के 
इस भूखे कर्जखोर किसान की, पोस्टमार्टम रिपोर्ट उसे मानसिक रूप से
विक्षिप्त शराबी घोषित कर दे 
अदालत के सामने गीता की शपथ लेकर, 
पेशेवर हैवान उसकी जवान बेटी को बदचलन घोषित कर दे, वो जानते हैं...

(एक ताजा आत्महत्या)

कवि की कर्मस्थली बुंदेलखंड का वह पिछड़ा इलाका है, जहाँ आज भी सरकारी व्यवस्था पूरी तरह से पंगु बनी हुई है। लोगों के पास रोजी-रोटी नहीं है, कामकाज नहीं है, लोग। अपना घर-बार छोड़कर, शहरों में सड़ने के लिए पलायन करने को मजबूर हैं। ऐसी स्थितियों में कवि के शब्दों का आक्रोश ही है जो आम आदमी को अपनी जड़ों में खड़े रहने की ताकत देता है-

"हर शब्द 
एक सुलगता 
आक्रोश है 
जो खड़ा मिलेगा 
हर वक्त 
शोषण के विरुद्ध 
संघर्षरत"

(संघर्षरत)

प्रद्युम्न कुमार सिंह सर्वहारा, मजदूर, किसान और उनके श्रम, श्रम के साझीदार हल, जुआँ , फावड़ा ,कुदाल आदि औजारों, धरती, प्रेम,नमी और बीजों की भाषा को पढ़ने वाले कवि हैं। वे इनके अंतरसंबंधों से भी बखूबी परिचित हैं। वे इनके अन्योन्याश्रित संबधों को जानते और पहचानते हैं कि यह जो जीवन है, इन्हीं सब चीजों पर निर्भर है। एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। एक के बिना दूसरा अधूरा है। एक के बिना दूसरे का जीना असंभव है-

"हल जानता है 
मिट्टी से खेलने की कला 
उसे पता होती है 
धरती की गहन पीड़ा 
और उसके एहसास 
वह निभाता है 
धरती से अपना रिश्ता 
जिससे दुनिया में 
बची रहे कशिश 
बची रहे 
प्रेम की भाषा 
और बची रहे बीजों के 
अंकुरण की संभावना।"

(बची रहे)

कवि मानवीय जिजीविषा के नवोन्मेष में विश्वास रखता है इसीलिए उसकी धारणा है कि यदि हमें मनुष्य और मनुष्यता को बचाए रखना है तो हमें पत्थर नहीं, दूब बनकर रहना होगा। यह दूब बनकर जीने की कला ही हमें इस विकराल समय में जिंदा रहने की ऊष्मा और उर्जा देगी-

"तुम्हें पत्थर नहीं 
दूब बनना है
जिसकी जड़ों में 
सात गांठे होती हैं 
अगर एक भी 
शेष रह जाती है 
तो असाढ़ का 
पानी पड़ते ही 
हरिया जाती है"

(तुम्हें पत्थर नहीं)

आज हम ऐसे विकराल समय में जी रहे हैं जब सच, झूठ, इमानदारी, बेईमानी, सब आपस में गड्डमड्ड हो गए हैं। अब बुराई का मुकाबला अच्छाई से नहीं बल्कि बुराई से ही है।मक्कार का मुकाबला मक्कार से ही है किसी अच्छे आदमी से नहीं। झूठ का मुकाबला सच्चाई से नहीं बल्कि अपने से बड़े झूठ से है। अब ऐसे हालात में देश क्या हाल होना है, किसी से छिपा नहीं है-

"आज मुकाबला 
सच, झूठ, ईमानदारी 
और बेईमानी के बीच नहीं है 
वरन 
बेईमान और बेईमानी के 
बीच है 
मक्कार और मक्कारी के बीच
लड़ी जा रही हैं जंगें
मामला देश का नहीं है
वरन मामला
झूठी शान की तरफदारी का है।"

(मुकाबला)

आज का मनहूस फासीवादी समय पूरी तरह निरंकुश होने पर उतारू है, इसलिए अभिव्यक्ति की आजादी भी खतरे में पड़ती नजर आ रही है।
विपक्ष में उठने वाली हर आवाज और प्रत्येक हाथ के खिलाफ कायर लोग डर का माहौल बनाए रखने के लिए तरह-तरह के कुचक्रों के जाल फैलाये जा रहे हैं-

"वे तुमसे छीन लेना चाहते हैं 
तुम्हारी आजादी 
काट देना चाहते हैं 
तुम्हारे उठे हुए हाथ 
खड़ा कर देना चाहते हैं 
खौफ का जिन्न 
इसलिए करना चाहते हैं 
शक्ति की नुमाइश 
उत्पन्न कर सकें 
जिससे एक अनाम डर 
आड़ में जिनकी तोपी जा सकें
अनगिनत कायराना हकीकतें"

(वे तुमसे छीन लेना चाहते हैं)

हम आज एक कायर और नपुंसक समय में जीने को अभिशप्त हैं जिन लोगों को सच के पक्ष में खड़े होना चाहिए, गलत का विरोध करना चाहिए और सही बात कहनी चाहिए वे साहित्यकार, पत्रकार, बुद्धिजीवी अपनी भूमिकाओं से च्युत हो गए हैं-

"देखना चाहिए था 
जिन्हें 
उनके आंख नहीं 
समझना चाहिए था 
जिन्हें 
उनके दिमाग नहीं 
जानना चाहिए था 
जिन्हें 
उनको समझ नहीं 
विरोध करना चाहिए था 
जिन्हें 
वे हार स्वीकार कर 
बैठ चुके हैं गोद में"

(देखना चाहिए था)

कवि अपने समय की राजनीतिक और सामाजिक विद्रूपताओं, विसंगतियों और वर्जनाओं को ललकारते हुए आम आदमी के पौरुष और जिजीविषा को कमजोर न समझने की बात कहकर उनके पक्ष में अपना प्रतिरोध दर्ज करते हैं -

"वर्जनाओं के विरुद्ध 
तनी हुई मुट्ठियों में 
अभी भी बची हुई है 
इतनी सामर्थ्य 
कि वे भर सकें
तुम्हारे विरुद्ध
हुंकार 
और दर्ज करा सकें 
अपना प्रतिरोध"

(वर्जनाओं के विरुद्ध)

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रद्युम्न कुमार सिंह अपनी कविताओं में आक्रोष को स्वर देने वाले एक लोकोन्मुखी जनवादी कवि हैं। उनका यह कविता संग्रह "कुछ भी नहीं होता अनंत" उन्हें संवेदनशील और प्रतिरोधी कवि के रूप में स्थापित करता है। उम्मीद है कि आगे वे और बेहतर कविताएं लिखेंगे तथा जनवादी और लोकधर्मी कविता में एक नया मुकाम हासिल करेंगे।
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                       # शकुन नगर,
                            सिविल लाइंस,
                            फतेहपुर (उ.प्र.)

शनिवार, 22 मई 2021

सघन अनुभूतियों और गहन स्मृतियों के बीच शब्दों के पुल बनाती कविताएं

सघन अनुभूतियों और गहन स्मृतियों के बीच शब्दों के पुल बनाती कविताएं

-प्रेम नंदन 

 

अनुभूतियाँ और स्मृतियाँ जब किसी दुबकी हुई साँझ या अंखुआई भोर में किसी नदी में पाँव डालकर आसपास बैठे हुए संवाद करती हैं तब ऐसे ही अविकल समय में जन्म लेती हैं साँस लेती, चहकती-फुदकती, गुनगुनाती कविताएं। ऐसी ही कविताओं के सर्जक हैं चर्चित कवि गणेश गनी। उनकी कविताएं अनुभूतियों और स्मृतियों की जीवंत दस्तावेज हैं। उनकी कविताओं के बिम्बों, रूपकों और शिल्प में झाँकता, निहारता और गमकता है पहाड़ी जीवन, नदियाँ, पर्वत, झरने, चीड़ , देवदार के घने जंगल और हरी-भरी घाटियाँ। इन्ही स्मृतियों में तैरते हुए वे कहते हैं-

'उधर सूरज भोर का उजाला 

लाने को था बेताब 

तूफान ने कई पेड़ उजाड़ दिए 

पर एक कागज पर रख कर या मेरे सामने 

और बादल स्याही की दवात

एक शाख कलम और 

भोर का तारा दे गया पता 

उस स्त्री का 

जिससे जुड़ी थी मेरी नाल।'

(पीछे चलने वाली पगडंडियाँ)

 

गणेश गनी की कविताओं में स्मृतियों का रंग इतना चटख है कि वो समय की सदियों लम्बी दूरी कुछ ही शब्दों से नाप लेती हैं और और किसी जीवित चरित्र सी , समय-बेसमय अक्सर दहलीज पर आकर खड़ी हो जाती हैं-

'कितने बरस बीत गए 

तुम्हारे पैर छुए और फिर 

गले लगा अपने दुख आंखों से बहा आया 

आंख खुली तो देखा अभी भोर का तारा 

पहरेदारी में जाग रहा है 

जबकि तुम्हारा इंतजार अभी बैठा है ठीक उसी जगह दहलीज के बाहर पत्थरों की पहली सीढ़ी पर।'

(मैं कहानी सुना रहा हूँ!)

 

लोक की संवेदनशीलता और अपनी जड़ों से जुड़ाव उनकी कविताओं में सर्दियों की गर्म धूप सा चमकता है वे बार-बार अपने गाँव-जवार लौटते हैं और यादों की सीलन भरी जगहों को रोशनी और ऊष्मा से भर देते हैं। स्मृतियों में भटकते हुए ऐसे ही कोमल क्षणों में दूर कहीं खोह में बहुत गहरे दबे चेहरे आँखों के परदों पर किसी चलचित्र की तरह आ खड़े होते हैं-

'जब वो कुछ शब्दों को 

बोल देता है सहज ही 

तो मेरी स्मृतियों खुल जाती हैं 

ऐसे शब्द 

जो पिता कहते थे 

जो मां बोलती थी 

उसके मुंह से सुनता हूं तो 

उफ़्फ़ कहता हूं धीरे से। 

 

ओह!

सोचता हूं वो शब्द कैसे चल कर 

और कब उसकी जुबान पर पहुंचे होंगे!'

(जबकि इंद्रधनुष तो  उसकी  पलकों पे  रहता है!)

 

अपनी जमीन से गहरे जुड़ा कवि साँप-सीढ़ी नहीं खेलता बल्कि पहाड़ी झरनों सी, बारिश की गुनगुनाती बूँदों सी, मिट्टी की सोंधी खुशबू-सी गमकती, फूलों पर मंडराती तितलियों जैसी कविताएं लिखता है और उन्हें आकाश की अलगनी पर टाँगकर पहाड़ों की सरसराती ठंडी हवा में झूलने के लिए छोड़ देता है-

'उसे नहीं मालूम 

कि हवा ने कान खड़े कर रखे हैं 

पंछी अपने पर तो बोल रहे हैं

ऊंची उड़ान भरने से पहले 

सारे बादल जा छिपे पहाड़ के पीछे।

 

आज वह आई है ठानकर

कि अपनी सीटी की आवाज से 

बुलाने पर पल में 

दौड़ी चली आने वाली हवा को 

जाने ही नहीं देगी।'

(हवा को जाने नहीं देगी)

 

गणेश गनी अनुभूतियों की रस्सी पकड़कर स्मृतियों में उतरते हैं और शब्दों के पुल पार करके वर्तमान में लौटते हैं यही उनकी रचना प्रक्रिया है और इसी से उनकी कविताएं जन्म लेती हैं -

'इन सब के बीच बड़ी खबर यह है कि

जोबनू के पास है सुच्चा मणि

वह आज हैरान है 

भरी दोपहर में 

एकदम चापलूस से दिखने वाले लोगों का जमघट 

अपने आंगन में देखकर 

वो दोनों कंधों पर खेश को 

चांदी की सुइयों से टांगे और 

बाएं कंधे की सुई से 

झूलती चाबियों की खनक 

और विरासत संभाले चौकन्नी है।'

(जोबनू)

 

कोई भी सजग रचनाकार अपने समय और समाज से निरपेक्ष नहीं रह सकता। गणेश गनी भी समय की नब्ज पर गहरी नजर रखने वाले रचनाकार हैं। वे वर्तमान राजनीति की लफ्फाज तिकड़मों पर पैनी नजर रखते हैं और उसकी विसंगतियों पर गहरी चोट करते हुए लिखते हैं-

'आप समझते हैं 

कि लाल किले के परकोटे से 

अपने संबोधन में 

मात्र मित्रों कहने भर से 

सद्भावना का हो जाता है संचार 

संपूर्ण पृथ्वी पर 

 

आपके तेज-तेज चलने से ही 

देश का विकास रफ्तार पकड़ लेता है!

 

आप समझते हैं 

कि जहाज के दरवाजे पर खड़े होकर दाहिना हाथ ऊपर उठाकर 

जोर-जोर से हिलाने भर से 

दरिद्रता के बादल छंट जाते हैं।

 

 सरकारी रेडियो स्टेशन से 

आपके मन की बात कर देती है 

सबके मन का बोझ हल्का।'

(आप समझते हैं)

 

आधुनिकता और परम्परा के द्वंद्व में सबसे ज्यादा नुकसान पारिवारिक ढाँचे का हुआ है। इनके  आपसी प्रतिद्वंद्व में संयुक्त परिवार बिखर गए हैं,और एकल परिवारों का चलन बढ़ गया है। अब इन एकल परिवारों में सास-ससुर,दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची जैसे अनेक पारिवारिक रिश्ते हाशिए पर चले गए हैं । इसीलिए बच्चों और बहुओं को जो संस्कार मिलते थे, अब उनका क्षरण हो गया है-

'पुल पर चलने का हुनर 

सास बता रही है नई बहू को 

साथ ही बता रही है 

पुल के रग-रग की कथा 

पुल कहीं झूलने न लगे लग जाए

 इसलिए दबे पाँव चलना है पुल पर और यह भी कि कैसे 

दबे पाँव चलते हैं घर के भीतर।'

(पार की धूप)

 

कविताओं के देय के बारे में अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है। कविता हमें भौतिक रुप में भले ही कुछ नहीं देती लेकिन हमें मानसिक सुकून और कुछ अच्छा और सच्चा करने की प्रेरणा जरूर देती हैं। वे अपनी एक कविता में कुछ ऐसा ही कहते हैं-

'कविता आकाश से खुलापन देती है उड़ने को पंख देती है 

पंखों में हल्का पन देती है 

अनंत उड़ान देती है कविता।

 

संगीत को शब्द 

आवाज को गीत देती है कविता कल्पना को छलाँग

और आदमी को संवेदना देती है कविता।

 

कविता रोटी नहीं सुकून देती है कविता की चट्टान को जितना तोड़ोगे 

वह उतनी सुंदर दिखेगी 

और फैल जाएगी तुम्हारे पोर-पोर में।'

 (कविता क्या नहीं देती?)

 

पूंजीवाद की नाजायज औलाद बाजारवाद आज पूरे समाज को अपने लुभावने जाल की गिरफ्त में ले चुका है। पूरा समाज उसकी चमक-दमक में उलझ कर रह गया है। बाजार हमारे घरों तक घुस आया है और हमें अपने जाल में बुरी तरह से जकड़ चुका है। बूढ़े, जवान, बच्चे ,सभी पर उसकी नजरें लगी हुई हैं और उससे बचना नामुमकिन सा हो गया है। वह हमें लूटने के लिए रोज नए -नए तरीके खोज रहा है और हमें लूट रहा है और हम लुट रहे हैं, कुछ उसकी मर्जी से कुछ अपनी मर्जी से-

'लूट के तौर-तरीके बदल चुके 

बाजार सेंध लगाकर 

हो चुका है दाखिल घर में 

उसकी नजर पहुंच चुकी है 

बच्चे की गुल्लक तक भी 

अलाव तापता एक बूढ़ा 

बच्चों को सुना रहा है कथा 

राक्षस और देवता की।'

 ( बच्चे की गुल्लक तक)

 

कवि को पता है कि हमारे आसपास जो कुछ भी होता है या हो रहा है, वह अकस्मात नहीं है। उसके पीछे एक सुनियोजित साजिश है जिसे हम अपनी खुली आँखों से नहीं देख पा रहे हैं। ऐसी चीजें देखने में प्रायः नजरअंदाज हो जाया करती हैं। इनका अंदाजा सूँघकर ही लगाया जा सकता है-

'अचानक नहीं हुआ यह सब 

कि कुछ अक्षर फल बांट रहे हैं 

तो कुछ औजार युद्ध के दिनों में

अ बाँट रहा है अनार 

और क सफेद कबूतर 

द बांट रहा है दराटियाँ 

और हां हल और हथौड़े

बस केवल ब के पास नहीं है

बांटने को गेहूं की बालियां 

पर स नया सूरज उगाने की फिराक में है।' 

(यह उत्सव मनाने का समय है)

 

इन दिनों देश मे आतंकवाद, नक्सलवाद से भी बड़ा खतरा बनकर उभरा है अंधराष्ट्रवाद। यह ऐसा समय है कि जो उसकी हाँ में हाँ नहीं मिलाता वह तुरंत ही देशद्रोही हो जाता है। ऐसे लोग किसी भी समय सरेआम किसी अराजक भीड़ का शिकार बन सकते हैं-

'जिन लोगों को अब तक नहीं हुआ था यकीन 

कि अराजकता गणतंत्र की दहलीज तक पहुंची है 

उनकी आंखें फटी और मुंह खुले रह गए 

जब संविधान के पहले पन्ने से न्याय जैसा शब्द 

राजधानी में अदालत के बाहर सड़क पर आ गया।'

(किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर)

 

ऐसे अराजकता के पोषक लोग अब बहुत सारे शब्दों में मनचाहे अर्थ भरना चाहते हैं। वे शब्दों के बाजीगर हैं और अपनी बाजीगरी से समाज को अपने पैरों तले रौंदते हुए सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते चले जा रहे हैं-

'जागृति, संघर्ष आंदोलन 

ऐसे शब्दों को 

किया गया है नजरबंद 

फिर भी डरे नहीं है शब्द

डटे हैं व्यवस्था के खिलाफ 

और भी मुखर हुए हैं ।

 

शब्द कहीं हथियार ना बन जाए इसलिए चाहते हैं 

शब्दों को मार डालना 

या उनकी जुबान काट डालना 

या कम से कम 

शब्दों के अर्थ ही बदल डालना 

चाहते हैं वे।'

 (पहरे)

 

यह साज़िशों का दौर है और इसके पोषकों द्वारा आम आदमी के पक्ष में उठती जिंदा आवाजों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उनके बनाये गए खाँचे में फिट न होने वाले लोगों पर निगरानी जारी है और हवा में चारों तरफ एक डर सा पसरा है-

'एक साजिश रची जा रही है निरंतर 

डर के मारे लोग भाग रहे हैं 

घर छोड़ कर 

बच्चे डरे हुए घर लौट रहे हैं भविष्यवाणी करने वाले 

स्टूडियो में बैठे इंटरव्यू दे रहे हैं 

जो रोकना चाहता है वह मारा जाता है।'  

(पृथ्वी का लोकनृत्य)

 

पूंजीवाद और बाजारवाद की सीढ़ियों से चढ़कर सत्ता के शिखर तक पहुंचा एक आदमी उसी की पैरवी में दिन रात लगा हुआ है। सैकड़ों किसान रोज आत्महत्या कर रहें हैं, अपना गाँव-घर छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं लेकिन उसे आम आदमी के सुख-दुख, जीवन-मरण से कोई मतलब नहीं है। वह सपने बेचने में व्यस्त और मस्त है-

'संविधान की कुर्सी पर बैठा 

एक आदमी ईमान बेच रहा है 

एक आदमी धर्म बेच रहा है 

एक आदमी पृथ्वी के टुकड़ों में बेच रहा है 

 

अपने खेत की मेड पर बैठा 

एक आदमी अपने खेत बेचने की सोच रहा है 

एक आदमी कर्ज चुकाने के वास्ते 

अपने प्राणों की सौदेबाजी कर रहा है।

 

उधर इंडिया गेट पर बैठा 

एक आदमी बीच कुछ नहीं रहा 

पर खरीदने की फिराक में है।'

(एक आदमी जश्न मना रहा है) 

 

आज भले ही आदमी चांद तक क्यों ना पहुंच गया हो लेकिन उसके घर की दीवारें सिकुड़ती जा रही हैं। एक ही छत के नीचे रहने वाले हो सदस्यों के बीच संवादहीनता बढ़ती जा रही है और आदमी दिन-प्रतिदिन अकेला होता जा रहा है। बूढ़े-बुजुर्गों की बातें सुनने वाला कोई भी नहीं। सब अपने आप में व्यस्त हैं। इसी आपाधापी और व्यस्तता की  जकड़न में हमारे रिश्तों की उष्मा नष्ट होती जा रही है-

'यह सच नहीं है 

कि अब सच्ची बातें कहने वाले नहीं मिलते 

पर यह भी तो सच है 

कि आप सच्ची बातें रहने वाले नहीं मिलते 

इसी कहने और सहने के बीच 

घुटा रहता है कुछ कुछ अनकहा।'

(जब काँधे पर हवा बैठकर कहे)

 

स्त्रियों के बारे में आज भी हमारे समाज में तरह-तरह की बातें की जाती हैं और कहा जाता है कि महिलाओं की स्थिति पहले से बहुत बेहतर हुई है इसमें आंशिक सच्चाई है आज भले ही हम किस वी सदी में जी रहे हो लेकिन हमारी आधी आबादी में अपेक्षित बदलाव नहीं आ पाया है जो आना चाहिए था उनको जो हक आजादी मिलनी चाहिए अभी तक नहीं मिल पाई है-

'क्या आज सूरज चढ़ने तक घर की महिला सोई? 

जैसे आप सोते हैं पुरुष।

क्या आज पौ फटने से पहले आप जागे? 

जैसे जागती है वह महिला।

........................

 

कुछ नहीं बदला 

महिला अभी-अभी 

समेट कर सारे काम 

किचन में रेगुलेटर को सुरक्षा पर घुमाकर 

बच्चे की स्कूल डायरी चेक कर रही है घड़ी में दस बजे हैं 

और बेटे को होमवर्क करा रही है।'

(विश्व महिला दिवस पर समोसा चाय डी सी के साथ...)

 

आज जब देश अंधराष्ट्रवाद के मुहाने पर खड़ा युद्धोन्माद से झूम-इतरा रहा है, तब एक सजग रचनाकार का दायित्व बनता है कि ऐसे अंधों को बताया जाए कि युद्ध हमेशा ही विनाशकारी रहे हैं और जीतता कोई नहीं, सिर्फ मानवता हारती है-

'अब युद्ध समाप्त हो रहा है 

हेअश्वत्थामा! 

तुम्हें अमरत्व का वरदान है 

और माथे पर रिश्ते घाव का शाप भी 

तुम्हीं बताओ जरा 

इनमें से जीत किसकी हुई।

जो बच गए 

वे अपनी जान हथेली पे रखे 

सोच रहे हैं 

और गिनने की कोशिश कर रहे हैं 

कि अनचाहे युद्ध के दो पाटों के बीच कितनी सांसे पिस गईं।'

(कितनी साँसे पिस गईं)

 

गणेश गनी की कविताओं से गुजरते हुए हम देखते हैं कि वे सिर्फ स्मृतियों और अनुभूतियों को जीने वाले रचनाकार नहीं हैं। उनकी कविताएं वर्तमान राजनीति पर भी तीखे सवाल खड़े करती हैं और सामाजिक तथा पारिवारिक परिवेश में आईं विसंगतियों पर भी कुठाराघात करती हैं। उनकी संवेदनशील तीक्ष्ण नजरें बहुत चौकन्ने ढंग से सब कुछ देखती-समझती हैं और उन पर अपनी तार्किक टिप्पणियों से प्रहार करती हैं। वे अपनी कविताओं के माध्यम से आस्वस्त करते हैं कि भविष्य में वे और भी बेहतरीन कविताओं की रचना करेंगें और साहित्य जगत को और समृद्ध करेंगे।

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शकुन नगर, सिविल लाइंस, 

फतेहपुर (उ.प्र.)

मो0 : 9336463835

 


दस रुपए और बीस मिनट की ओट में पंचामृत

जिंदगी के बेशकीमती बीस मिनट और गाढ़ी कमाई के दस रुपए फूंकने के बाद ठंड से ठिठुरती उंगलियों को आपस में रगड़ते हुए उसे लगा कि इस समय उसके हाथों ...