सोमवार, 25 जनवरी 2021

हरेन्द्र जी की कविताओं पर लेख

अपने समय और समाज की विसंगतियों एवं विद्रूपताओं
के कवि हरेंद्र कुमार
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प्रेम नंदन
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युवा कवि हरेंद्र कुमार की कविताएँ  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलती रही हैं । उनका हाल में प्रकाशित काव्य संग्रह 'मूंगफली के छिलके' साहित्यिक वर्ग में काफी चर्चा में है । हरेंद्र कुमार की कविताएँ अपने समय और समाज की विसंगतियों एवं विद्रूपताओं को सटीक ढंग से उजागर करती हैं। हरेन्द्र जी को आम जनजीवन के रोजमर्रा की घटनाओं को शब्दों में ढालने में महारत हासिल है। आम आदमी के जीवन में घटने वाली तमाम विसंगतियों, विडंबनाओं को बखूबी बयान करने का जरिया बनती हैं उनकी कविताएं। वे अपनी कविताओं में अपने आसपास के जीवन को चित्रित करने वाले रचनाकार हैं। उनकी कविताएं हमारे समाज में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों पर तीखी और संवेदनशील नजर रखती हैं और उन पर अपनी टिप्पणियां करती हैं। उनकी कविताओं की मुख्य विशेषता उनके शब्दों में छिपा हुआ व्यंग्य है जो कहीं भी भाषा की गरिमा का अतिक्रमण नहीं करता, बल्कि धीरे से अपनी गहरी टीस देकर हमें सोचने पर मजबूर करता है।

आज के समय में सबसे ज्यादा संकट रिश्तों-संबंधों की विश्वसनीयता पर है । सारा सामाजिक जीवन रिश्तों की विश्वसनीयता के संकट के दौर से गुजर रहा है । ऐसे में रिश्तों की गर्माहट बचाना बेहद जरूरी है। 'मेरे जीवन की ऊष्मा' शीर्षक कविता में  हरेंद्र कुमार ने सहज शब्दों में इसे अभिव्यक्त किया है कि प्रेम और स्नेह की गर्माहट के बिना जीवन निस्तेज है और इनके साथ होने से व्यक्ति हर मुश्किल का सामना बड़े आराम से कर लेता है - "मेरे दोस्त ! /मेरे हाथों की शक्ति/मेरे पैरों की गति हो तुम,/तुम्हारे बिना मैं हूँ/निष्क्रिय और निस्तेज!/तुम्हारे स्नेह की डोर/ मेरे साँसों की डोर से/कहीं ज्यादा मजबूत है।/इनके सहारे लाँघ जाता हूँ मैं/दुर्गम पथ,/पार करता हूँ/ कंटक सफर।"

इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की स्थिति हमेशा से ही दोयम दर्जे की बनाने का काम किया गया है। आज भी पुरुषों की सोच और संस्कारों में बहुत परिवर्तन नहीं आया है । बाजार उन्हें एक वस्तु बनाकर प्रस्तुत कर रहा है और मजे की बात यह है कि कुछ स्त्रियां बाजार के जाल में फंस कर उसी में अपनी मुक्ति तलाश रही हैं। एक तरफ हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल हैं तो दूसरी तरफ 'ऑनर किलिंग' के नाम पर हो रही हत्याएं यह बताती हैं कि हमारे समाज की सोच आज भी कितनी निकृष्ट है । 'फीनिक्स' कविता इसकी ही बानगी है जिसमें कवि ने इस गंभीर संकट को बड़ी मार्मिकता से शब्दबद्ध किया है - "और फिर/तुम्हारे कोमल हाथ/ लोहे के सरिये बन गए/ और उनकी सख्ती/मैं महसूस करती रही/अपनी गर्दन पर" पर बार-बार हो रही इन घटनाओं के बावजूद उनका फिर से लौटना उम्मीद जगाता है ।यहां बगावत की बू नहीं बल्कि हृदय परिवर्तन की कामना है क्योंकि बिना सोच बदले इससे निजात पाना असंभव है - "पर मैं फीनिक्स हूँ/मैं फिर लौट आऊँगी/बार-बार लौट आऊँगी/तब तक लौटती रहूँगी/जब तक तुम्हारे हाथ/लोहे के सरिये से/कमल के फूल न बन जाए/और तुम्हारी झूठी प्रतिष्ठा/मेरे प्रेम के सामने/धूल न बन जाए।"
कविता में 'बार-बार लौट आऊंगी' शब्द गहरे मथती है। यह लौटना  साधारण लौटना नहीं है बल्कि एक अनवरत प्रक्रिया है तब तक जब तक झूठी प्रतिष्ठा के नाम पर सच्चे प्रेम की बलि चढ़नी बंद नहीं हो जाती।

हरेंद्र कुमार अपने आसपास के वातावरण पर पैनी और  संवेदनशील दृष्टि रखने वाले कवि हैं। वे इसे भली-भांति समझते हैं कि भले ही आज आदमी चंद्रमा पर कॉलोनियां बनाने के ख्वाब बुन रहा है लेकिन उसके आसपास ही लाखों भूखे नंगे लोग रोटी के एक टुकड़े के लिए तरस रहे हैं। 'भूख' कविता कवि की चिंता को आवश्यक आवाज देने का कार्य बखूबी करती है ।कविता में छिपा व्यंग्य बड़ा मारक है - 'मजदूर मजबूर है /वह याद करता है /बचपन का वह पाठ  /जिसमें पढ़ा था उसने /चांद रोटी की तरह गोल है /पर अब लगता है उसे कि/चांद रोटी की तरह नहीं /रोटी चांद की तरह गोल है/और दूर भी /विज्ञान का ज्ञान तो /बहुत पहले पहुंच चुका है/चांद तक /कोई मुझे यह बताएं कि/वह रोटी तक कब पहुंचेगा/क्या रोटी चांद से भी दूर है/
 या फिर यह व्यवस्था के हाथों/ मजबूर है।"

इस दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति, समाज और देश  की अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान है, जिससे उसकी पहचान सम्बंधी मौलिक विशेषताएँ समाहित रहती हैं। इन्हीं विशेषताओं को उसकी जड़ों यानी उसके गांव-गिरांव, बोली ,भाषा और समूचे परिवेश से जोड़कर देखा जाता है और यही उसकी मौलिक पहचान होती हैं। यदि आदमी की यह पहचान खो जाए या वह खुद इस पहचान से खुद को अलग-थलग कर ले तो उसका जीवन नीरस हो जाता है । सामान्यतः लोग इसे पुरानी परंपरा से जोड़कर देखते हैं लेकिन कवि यहां पुरानी परंपरा को ढोने की बात नहीं करता बल्कि विचारों की नई सरिता प्रवाहित करने की बात करता है जिसमें उसकी खुद की अपनी पहचान हो। इसलिए वह दुनिया का सब कुछ छोड़ कर अपनी मौलिकता को बचाए रखने की बात करता है ।'मौलिकता' शीर्षक कविता में कवि इसी मौलिकता को बरकरार रखने की चाहत से ओतप्रोत है - "मुझे चाहिए वह झाड़ू /जिससे मैं आदर्शों के झोल/झाड़ सकूं ।/मुझे चाहिए वह वसूली /जिससे मैं इसका /नया रूप ढाल सकूं ।/और ,/सड़ी हुए जल की इन मछलियों को /विचारों की सरिता से/बाहर उछाल सकूं।/
 फिर /मुझे कुछ और नहीं चाहिए/ बस /मुझे मेरी मौलिकता चाहिए।"

'आपदा उत्सव' कविता में कवि हरेंद्र कुमार मानव स्वभाव की उस विकृति की ओर इशारा करते हैं जिसमें उलझकर हम मानवीय गुणों का त्याग करके धन पशु में तब्दील हो जा रहे हैं। बाढ़ हो, सूखा हो, सड़क दुर्घटना हो या अन्य प्राकृतिक आपदा, धन-पशुओं के लिए ये अपनी तिजोरीयों को भरने का सुअवसर बन जाता है । वे आपदा को अवसर में बदलने में सिद्धहस्त होते हैं। वे सारी मानवीय संवेदना को दरकिनार करके लूट-खसोट में जुट जाते हैं। हरेन्द्र जी ने अपनी इस कविता में मानवता के दुश्मन लोगों के इसी अमानवीय कुकृत्य को रेखांकित किया है - "इस बार  फिर कई अधूरे सपने/ पूरे होने की बारी है/किसी ने बड़े प्लॉट /तो किसी ने /लग्जरी गाड़ी की कर ली तैयारी है /शवों के कफन नोंचने की /मारामारी है /ताबूतों के कील  उखाड़ने की/ फिर बारी है /इस तरह आपदा उत्सव /जोर शोर से मनाने की तैयारी है।"

कविता मनुष्यता का आदिम राग है। मनुष्य के सुख-दुख, खुशी, उल्लास रुदन जैसी समस्त मानवीय संवेदनाओं को आवाज देने का कार्य हमेशा से ही कविता ने ही किया है। मनुष्य के पैदा होने के साथ से लेकर उसके मरने तक कविता मनुष्य और मनुष्यता का साथ देती है। कविताओं ने हमेशा ही मानवता की रक्षक के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन किया है। मानव जीवन और कविता का चोली दामन का साथ है। एक सही कविता हमेशा सत्ता के विपक्ष में और जनमानस के पक्ष में खड़ी होती है । यह 'कविता की जरूरत' है। कवि के शब्दों में - "इसे खड़ा होना होगा/अपने पैरों पर/पूरे पुरुषार्थ के साथ ।/तोड़ना होगा जर्जर वैशाखी को, /दौड़ना होगा /कठोर कंकरीले और कँटीले रास्ते पर /बेखौफ़।/लिखना होगा /कठिन समय का सच/छोड़ना होगा/ पद ,सत्ता और पुरस्कार का पक्ष।/ चखना होगा /पसीने और लहू का स्वाद /
देना होगा /मुश्किल समय में/ मनुष्य का साथ।"

शिक्षा के बाजारीकरण ने शिक्षा और शिक्षक दोनों को अपने कर्तव्य पथ से विरत करने का काम किया है। आज शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से व्यवसाय बनकर पूंजीपतियों की तिजोरी भरने का साधन बन गई है। शिक्षा माफियाओं ने इस पवित्र पेशे को धन उगाही का जरिया बना रखा है ।कोरोना के इस वैश्विक महामारी के दौर में निजी विद्यालय के शिक्षकों के सामने दो वक्त की रोटी की समस्या खड़ी हो गई। वे फिर से द्रोण बन द्रुपद  के द्वार खड़े हैं ।पर वहां उन्हें तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं मिलता,मिलती है तो सीख। सब को सिखाने वाले शिक्षकों को यह सीख शिक्षा माफिया दे रहे हैं - "यह समय अपने पढ़ाये/पाठ पर चलने का है/जीवन के अग्निपथ पर/आहुति बन जलने का है।/आप अगर हो गए अधीर /तो बच्चों को क्या बतलाएंगे/विवशताओं से कैसे लड़ते हैं /यह सीख उन्हें कैसे सिखाएंगे।/इस तरह से दे रहे हैं वे/शिक्षक को सीख/ किस -किस के द्वार पर 
अब मांगे वो भीख ।"

युवा कवि हरेंद्र कुमार की कविताएं उनके बेहतर कवि को और अधिक बेहतर होने को आश्वस्ति  देती हैं। हरेन्द्र जी की कविताएं पूरी जिम्मेदारी और पक्षधरता के साथ आगे बढ़कर अपनी रचनात्मक जिम्मेदारी निभ रही हैं और अपने समय की विडम्बनाओं, संघर्षों, विचलनों, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक समस्याओं की चीरफाड़ करते हुए उम्मीद की रोशनी फैलाने का कार्य कर रही हैं। वे पूरी तरह आस्वस्त करते हैं कि भविष्य में उनकी कविताओं का इतिहास और भूगोल और विस्तृत होगा उनकी कविताओं को और व्यापकता के विस्तार की क्षमताओं को और नए पंख लगेंगे। हरेंद्र जी की कविताएं साहित्यिक परिदृश्य में अपनी सार्थक और संवेदनशील उपस्थिति से कविता के संसार को और समृद्धि करेंगी।
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संपर्क :- द्वारा - राकेश कुमार सक्सेना(पोस्टमैन)
,प्रधान डाकघर, फतेहपुर, (उ0प्र0), पिनकोड --212601
मो : 09336453835
ईमेल: premnandanftp@gmail.com

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

नीलोत्पल रमेश : समय, समाज और गांव ज्वार से बतकही करती कविताएं

कविता की वास्तविक मनोभूमि गाँव-जवार, खेत-खलिहान, नदियाँ, कछार, पोखरे, पेड़ पौधे, पशु-पक्षी और आदमी के जीवन, उनके सुख-दुःख, सपनों, संघर्षों और हारने-जीतने, जीने-मरने की वास्तविक परिस्थितियों के आसपास ही है। कविता हवा-हवाई इच्छाओं की काल्पनिक उड़ान नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन के आपसी रिश्तों और जिंदगी की परतों को देखने समझने के लिए ,एक दूसरे के आमने सामने बैठकर की गई जीवंत बतकही है। 

वरिष्ठ कवि और समीक्षक नीलोत्पल रमेश का कविता संग्रह- 'मेरे गाँव का पोखरा' गाँव-जावर की ऐसी ही संवेदनशील और जीवंत कविताओं का बेहतरीन संग्रह है। इन कविताओं में पाठक को अपने आसपास की संवेदनशील जिंदगी सांस लेती नजर आती है और पाठक से संवेदनात्मक साम्य स्थापित कर लेती है.

वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिवेश की मरती संवेदनशीलता को देखकर वे कहते हैं-
'बच्चे मर रहे हैं
एक के बाद एक 
मरने का यह सिलसिला जारी है
उसी तरह हमारे देश का
भविष्य भी मर रहा है
और मर रही है सदियों की परम्परा
और मर रहा है देश
और इसी के साथ मर गईं
देश की संवेदनाएं भी।'
(बच्चे मर रहे हैं)

आज देश का राजनीतिक परिदृश्य इतना दूषित और ईर्ष्यालु हो गया है कि जो प्रतीक कभी समाज को अमन चैन और भाईचारे का संदेश देते थे अब वे कुछ लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है-

'जय श्री राम!'
एक डरावना और भीभत्स
नारा बन गया है
जिसमें रामत्व नहीं
बल्कि उग्र राष्ट्रवाद का 
ले लिया है रूप इसने।'
(हे राम!)

.......


कविता की वास्तविक मनोभूमि गाँव-जवार, खेत-खलिहान, नदियाँ, कछार, पोखरे, पेड़ पौधे, पशु-पक्षी और इन सबके बीच बसे आम आदमी के सुख-दुःख, सपनों, संघर्षों, हारने-जीतने, और जीने-मरने की वास्तविक परिस्थितियों के आसपास ही है। कविता हवा-हवाई इच्छाओं की काल्पनिक उड़ान नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन के आपसी रिश्तों और जिंदगी की परतों को देखने समझने के लिए ,एक दूसरे के आमने सामने बैठकर की गई जीवंत बतकही है। 

वरिष्ठ कवि और समीक्षक नीलोत्पल रमेश का प्रलेक प्रकाशन, मुंबई से हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह- 'मेरे गाँव का पोखरा' गाँव-जावर की ऐसी ही संवेदनशील और जीवंत कविताओं का बेहतरीन संग्रह है। इस संग्रह में आम जन जीवन के सभी रंग देखने को मिल जाएंगे- हरे-भरे, धूल धूसरित, चटकीले और स्याह, सभी तरह के रंग। इन कविताओं में पाठक को अपने आसपास की संवेदनशील जिंदगी सांस लेती नजर आती है और पाठक से संवेदनात्मक साम्य स्थापित कर लेती है.

नीलोत्पल रमेश जी को ऐसे बेहतरीन कविता संग्रह के लिए ढेरों बधाइयाँ।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

समय की विडम्बनाओं पर कटाक्ष करती गजलें

समय की विडम्बनाओं पर कटाक्ष करती गजलें
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वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ बालकृष्ण पांडेय  का सद्य प्रकाशित गजल संग्रह "साधो उनकी जात निराली"  उनकी उत्कृष्ट गजलों का बेहतरीन संग्रह है। इस संग्रह में उनके शुरुआती लेखन से लेकर के अब तक के लेखन की गजलें शामिल हैं। पांडेय जी को आम जनजीवन के रोजमर्रा की घटनाओं को शब्दों में ढालने में महारत हासिल है। आम आदमी के जीवन में घटने वाली तमाम विसंगतियों, विडंबनाओं को बखूबी बयान करने का जरिया बनती हैं उनकी ग़ज़लें। वे अपनी छोटी-छोटी गजलों में अपने आसपास के जीवन को चित्रित करने वाले रचनाकार हैं।  ये गजलें हमारे समाज में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों पर तीखी तीखी नजर रखती हैं और उन पर अपनी टिप्पणियां करती हैं-

"फरार बाज मगर बुलबुलों पर पहरे हैं
किसी कोयल को कोई काम चल रहा होगा।"

"औरतों, बीमार, बच्चों का हुआ है सर कलम 
कौन देखे न्याय की भी आंख में छाले पड़े हैं।"

इन गजलों की मुख्य विशेषता शब्दों में छिपा हुआ व्यंग्य है जो कहीं भी भाषा की गरिमा का अतिक्रमण नहीं करता, बल्कि धीरे से अपनी गहरी टीस देकर हमें सोचने पर मजबूर करता है-

"जन-जन को बग्घी पर नाधे
राजा की औकात निराली।"

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मंगलवार, 11 अगस्त 2020

जीवन का नया सौंदर्यशास्त्र रचते कुँवर रवींद्र के चित्र

जीवन का नया सौंदर्यशास्त्र रचते के कुंवर रवींद्र के चित्र
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अपने समय और समाज की विद्रूपताओं और त्रासद यथार्य को अपनी तूलिका से चित्रित करने वाले कुंवर रवीन्द्र वर्तमान समय के विलक्षण कलाकार हैं।  वे रंग और रेखाओं के संयोजन से जीवन को चित्रित कर, उसकी संभावनाओं को जिंदा रखने और उन्हें संबल प्रदान करने वाले चित्रकार हैं। इधर उनके चित्रों में जीवन का एक नया सौंदर्यशास्त्र देखने को मिलता है जो आज के समय की सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनाओं तथा भावनाओं को पूरी सजगता, ईमानदारी और पक्षधरता से प्रकट करता है।

सोमवार, 10 अगस्त 2020

बालकृष्ण पांडेय पर लेख

थोड़ा ही सही खूब है बाहों का भरोसा
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     वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद बालकृष्ण पांडेय  का सद्य प्रकाशित गजल संग्रह "साधो उनकी जात निराली" उनका  प्रकाशित गजल संग्रह है इस संग्रह में उनके शुरुआती लेखन से लेकर के अब तक के लेखन की गजलें शामिल हैं। आम जनजीवन के रोजमर्रा की घटनाओं को शब्दों में ढालने में उन्हें महारत हासिल है। आम आदमी के जीवन में घटने वाली विसंगतियों, विडंबनाओं को बखूबी बयान करने का जरिया बनती हैं उनकी ग़ज़लें। वे अपनी छोटी-छोटी गजलों में अपने आसपास के जीवन को चित्रित करने वाले रचनाकार हैं।  ये गजलें हमारे समाज में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों पर तीखी तीखी नजर रखती हैं और उन पर अपनी टिप्पणियां करती हैं-

"फरार बाज मगर बुलबुलों पर पहरे हैं
किसी कोयल को कोई काम चल रहा होगा।"

"औरतों, बीमार, बच्चों का हुआ है सर कलम 
कौन देखे न्याय की भी आंख में छाले पड़े हैं।"

इनकी गजलों की मुख्य विशेषता शब्दों में छिपा हुआ व्यंग्य है जो कहीं भी भाषा की गरिमा का अतिक्रमण नहीं करता, बल्कि धीरे से अपनी गहरी टीस देकर हमें सोचने पर मजबूर करता है-

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शनिवार, 4 जुलाई 2020

आर डी आनंद के कविता संग्रह 'सुनो भूदेव' की समीक्षा

आज जब हिंदी साहित्य में कविता के तथाकथित संकट पर कुछ लोग बहुत चिंतित दिख रहे हैं और ऐसे शोर मचा रहे हैं कि उनके जाते ही हिंदी कविता भी उनके साथ ही चली जायेगी। इन कुछ तथाकथित बुजुर्ग साहित्यकारों की ऐसी बेहूदी हरकतों पर सिर्फ हँसा जा सकता है। 

हिंदी कविता पर कहीं कोई संकट नहीं है, हाँ, उन साहित्यकारों पर जरूर संकट दिख रहा है, जो मठाधीशों , गैंगों और जातिवाद को पोषित करते रहे हैं और कविता को रखैल समझते रहे हैं।

 आज हिंदी कविता पूरी जिम्मेदारी और पक्षधरता के साथ आगे बढ़ रही है और अपने समय की विडम्बनाओं, संघर्षों, विचलनों, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक समस्याओं की चीरफाड़ भी कर रही है।

इस माहौल में दलित कविता भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से पूरी तरह बाख़बर है और अपनी भूमिका का निर्वहन बाखूबी कर रही है। इस समय दलित कविता में बहुत से कवि रचनारत हैं और अपनी कविताओं के माध्यम से दलित कविता को नया मुकाम दिलाने का प्रयास कर रहे हैं। प्रसिद्ध दलित  कवि और चिंतक आर. डी. आंनद इस मुहिम के मजबूत और संघर्ष शील सिपाही हैं, जो अपनी तेजस्वी रचनात्मक वैचारिकी के लिए जाने जाते हैं।

हाल ही में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित उनका कविता संग्रह 'सुनो भूदेव' एक बेहतरीन कविता संग्रह है, जोपाठकों और आलोचकों का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहा है। इस संग्रह में प्रकाशित कविताओं को पढ़ने के बाद

शनिवार, 6 जून 2020

भूमिका

'सपने जिंदा हैं अभी' के द्वितीय संस्करण पर दो शब्द लिखते हुए इसके पहले संस्करण के प्रकाशन के संदर्भ याद आने स्वाभाविक ही हैं। इसके प्रथम संस्करण का प्रकाशन लोकमंगल साहित्य परिषद, फतेहपुर के द्वारा किया गया था, जिसके कर्ताधर्ता राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी के परम शिष्य श्री धनंजय अवस्थी थे।
श्री धनंजय अवस्थी जी ने मेरी डायरी से इन कविताओं का चयन करके, इसका नामकरण किया और इसकी भूमिका प्रसिद्ध आलोचक श्री ओमप्रकाश अवस्थी जी से लिखवाई।
अब याद करता हूँ तो विस्मय होता है कि कोई साहित्यकार एक अनजाने और नवोदित रचनाकार के लिए इतना सह्रदय भी हो सकता है।
श्री धनंजय अवस्थी जी से मिलने की भी एक कहानी है।

तब तक मैं किसी भी साहित्यकार से साक्षात नहीं मिला था। न ही किसी साहित्यकार को जानता था। एक दिन मैं एक स्थानीय हिंदी दैनिक अखबार की रविवासरीय परिशिष्ट में प्रकाशित करवाने के लिए कुछ कविताएं देने गया था। वहीं कार्यालय में बैठे एक सज्जन ने जब मेरी कविताएं देखीं तो उन्होंने सहज ही पूछ लिया । अच्छा तो तुम भी कविताएं लिखते हो?

बातों-बातों में उन्होंने जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार धनंजय अवस्थी का नाम लिया। उन्होंने धनंजय अवस्थी जी के प्रसिद्ध खंडकाव्य 'शबरी' का ज़िक्र किया।  उन दिनो 'शबरी' खंडकाव्य कानपुर विश्वविद्यालय (वर्तमान में छत्रपति शाहू जी महाराज, कानपुर) में हिंदी के स्नातक द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती थी। मैने उन सज्जन से धनंजय जी का पता लिया और अगली सुबह ही किसी साहित्यकार से प्रथम बार साक्षात मिलने के रोमांच से प्रफुल्लित, अगली सुबह ही उनके घर जा पहुंचा।

वह सर्दियों की कोई (फरवरी 1997 के किसी दिन की) कोई गुनगुनी सुबह थी जब मैं श्री धनंजय अवस्थी जी का पता पूछते-पूछते उनके घर जा पहुँचा था। घर के सामने एक सज्जन मीठी धूप सेंकते हुए अखबार में तल्लीन थे। मैं उनके पास गया और प्रणाम करते हुए पूछा -' क्या श्री धनंजय अवस्थी जी का घर यही है?
वे महाशय अखबार एक तरफ रखते हुए मुझे पास रखी दूसरी कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए बोले- कहिए, क्या काम है?
यह कहते हुए उनके चेहरे पर मधुर मुस्कान तैर रही थी।
 मैंने कुछ सकुचाते हुए कहा- 'उनसे मिलना है।'
'मैं ही धनंजय अवस्थी हूँ'- वे उसी मधुर मुस्कान के साथ बोले।
मैंने लपककर उनके पैर छुए और कुर्सी खींचकर उनके पास बैठ गया। मैं पहली बार किसी साहित्यकार की सामने देखकर इतना रोमांचित था कि यह समझ नहीं पा रहा था कि क्या बातें करूँ?

मेरी उलझन देखकर उन्होंने ही बातचीत शुरू की। सबसे पहले मेरा नाम पूछा। मैंने अपना नाम बताते हुए जब उनसे अपनी रचना कर्म के बारे में बताया तो बहुत खुश हुए और मुझे अपनी रचनाएं दिखाने को कहा। मैं अपने साथ अपनी कुछ कविताएं, गीत और लघुकथाएँ और अखबारों में प्रकाशित अपनी रचनाओं की कटिंग लेकर गया था।जिन्हें डरते -डरते हैं उनको दिखाया।

श्री अवस्थी जी ने चार -पांच कविताएं और गीत बड़े ध्यान से पढ़ने के पश्चात उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और रचनाओं की सराहना की। कुछ संशोधन करने के सुझाव भी दिए। काफी देर तक वे मुझे रचनाधर्मिता के बारे में बताते रहे । इस दौरान मैं साँसें थामे उनकी बातें सुनता रहा। चलते समय उन्होंने अपना बहुचर्चित खंडकाव्य 'शबरी' की एक प्रति मुझे अपने हस्ताक्षर करके भेंट की, जो मेरे लिए सबसे अमूल्य भेंट बन गई।

उस पहली मुलाकात में ही श्री अवस्थी जी ने मुझ जैसे अनजान और नए रचनाकार से जितना आत्मीय व्यवहार किया, आगे मिलते रहने के लिए कहा। उनके द्वारा किया गया प्रोत्साहन और लिखते रहने की प्रेरणा देने वाले शब्द मेरे रचनाकार के लिए संजीवनी बन गए।

फिर उनसे मिलने-जुलने का सिलसिला बढ़ता गया। वे मुझे विभिन्न साहित्यिक समारोहों में अपने साथ ले जाते, वरिष्ठ साहित्यकारों से मिलवाते और कविता पाठ करने के अवसर देते। इसके बाद फिर लगभग मेरी हर रचना उनकी नजरों से गुजरती। वे मुझे अपनी कविताओं को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भेजने के लिए कहते और अपने घर आने वाली पत्रिकाओं को पढ़ने के लिए देते।

अब मेरी कई कविताएं कादम्बिनी, नवनीत, आर्यावर्त जैसी पत्रिकाओं और स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हो चुकी थी। अब श्री अवस्थी जी प्रायः कहते कि अब तुम्हारी कविताओं का संग्रह आना चाहिए।वे कहते- लोकमंगल साहित्य परिषद, तुम्हारी कविताओं के संग्रह को छापेगा । मैं संकोच में था और लगातार इसको टाल रहा था। एक दिन उन्होंने आदेशात्मक मुद्रा में कहा, तुम अपनी डायरी मुझे दे जाओ, कविताओं का चयन मैं खुद करूँगा। अब मैं क्या करता, अपनी डायरी उनके सुपुर्द कर दी। बीच-बीच मे कविताओं पर चर्चा-परिचर्चा होती रही। संग्रह का नाम तय हो गया-  'सपने जिंदा हैं अभी'।

लगभग दो महीने बाद उन्होंने मुझे इसकी टाइप की हुई एक प्रति दी और कहा कि इसको ठीक से पढ़ लो, गलतियों को लाल पेन से सही करके लिख दो । पन्द्रह दिन बाद इसे छपने के लिए प्रेस में देना है। 

दस रुपए और बीस मिनट की ओट में पंचामृत

जिंदगी के बेशकीमती बीस मिनट और गाढ़ी कमाई के दस रुपए फूंकने के बाद ठंड से ठिठुरती उंगलियों को आपस में रगड़ते हुए उसे लगा कि इस समय उसके हाथों ...