शनिवार, 27 मई 2023

मैं क्यों लिखता हूँ

मैं क्यों लिखता हूँ ---final
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‘To make people free is the aim of art, therefore art for me is the science of freedom.’
-Joseph Beuys (1921-1986)
(one of the most influential sculptors and performance artists of the 20th century) 

मैं क्यों लिखता हूँ? यह एक ऐसा सवाल है जिससे प्रत्येक रचनाकार को कभी न कभी दो-चार होना ही पड़ता है। कभी दूसरे यह सवाल पूछते हैं तो कभी रचनाकार स्वयं से यह सवाल पूछने पर मजबूर होता है। देखने में बहुत सरल लगने वाले इस सवाल का उत्तर देना हर रचनाकार के लिए हमेशा ही मुश्किल रहा है।

मैं अपने लेखन की बात करूं तो जब मैं लिखने के कारणों की ओर झाँकने का प्रयास करता हूँ तो कई प्रश्न एक साथ सामने आ खड़े होते हैं- आखिरकार मैंने लिखना कैसे और क्यों शुरू किया?
साहित्य का मेरे घर-परिवार से दूर-दूर तक कहीं कोई रिश्ता नहीं था तो फिर मुझमें लेखन के संस्कार कहाँ से आए? 

बचपन के गलियारों में लौटने पर कई चीजें स्पष्ट हो जाती हैं, बातें शुरूआत की ओर पहुँच जाती हैं।
लिखने के शुरुआती बीज मेरे मष्तिष्क में शायद अम्मा की लोरियों ने बोए होंगे, कविता के प्रति लगाव शायद अम्मा के गाने-गुनगुनाने की आदत से पैदा हुआ होगा। अम्मा के पास लोकगीतों और कहानियों का अकूत भंडार है। 

उन दिनों अम्मा गांव और रिश्तेदारी में एक अच्छी गउनहर के रूप में प्रसिद्ध थी और विभिन्न तीज-त्योहारों और शादी-ब्याह के अवसरों पर लोग उनको इसी गुण के कारण विशेष रूप से आमंत्रित करते थे।

अम्मा अब भी हमेशा कुछ ना कुछ गाती-गुनगुनाती रहती हैं। बचपन में मुझको नींद तभी आती थी जब अम्मा मीठे स्वर में लोरियां सुनाती थी और सुबह उनकी गुनगुनाने की आवाज सुनकर ही आंखें खुलती थीं। दरअसल अम्मा हमारे सोने के बाद ही सोती थी और हमारे जागने के पहले जाग जाती थी और वे घरेलू कार्य करते समय भी प्रायः गाते-गुनगुनाते हुए ही करती थीं, अब भी उनकी यही दिनचर्या है। यह उस समय की लगभग सभी घरेलू महिलाओं की नियमित दिनचर्या होती थी।

अम्मा की लोरियों के पंखों पर सवार होकर जब मैं स्कूल गया तो वहां भी मेरा परिचय सबसे पहले कविता यानी स्कूल में गाई जाने वाली प्रार्थना से  हुआ। हिंदी की किताब में पहला पाठ भी कविता ही था। अम्मा से मिले संस्कारों के कारण बचपन में कविताएँ मुझे शीघ्र ही याद हो जाया करती थीं शायद यही कारण रहा है कि मुझे अपनी किताब की सभी कविताएं याद रहती थीं और मैं उन्हें अक्सर गुनगुनाया करता था।

इस तरह गीतों और कविताओं के प्रति मैं बचपन से ही लगाव महसूस करता था लेकिन कविता या और कुछ लिखने के बारे में तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद जब मैं आगे की पढ़ाई के लिए शहर आया तो जहाँ मैं किराए पर रहता था उससे कुछ दूरी पर एक राजकीय पुस्तकालय और राजकीय छात्रवास अगल-बगल स्थित थे। मेरे कई सीनियर और परिचित साथी राजकीय छात्रवास में रहते थे और अखबार, पत्रिकाएं पढ़ने के लिए रोजाना राजकीय पुस्तकालय जाते थे । मैं भी उन्ही के साथ पहले तो प्रायः रविवार और फिर नियमित रूप से लाइब्रेरी जाने लगा था लगा। वहाँ पर कई अखबार, प्रतियोगी पत्रिकायें, साहित्यिक पत्रिकाएं आती थीं। वहीं पहली बार अखबारों और पत्रिकाओं से दोस्ती हुई। उस समय 'संपादक ने नाम पत्र' जैसे कॉलम लगभग सभी अखबारों में होते थे। 

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों कर रहे कई सीनियर साथी संपादक के नाम पत्र लिखते थे और जब वे अखबारों में प्रकाशित होते थे तो बड़े गर्व से हम सबको दिखाते थे कि देखो-मेरा लिखा हुआ अखबार में छपा हैं। उस समय यह देखना काफी रोमांचक अनुभव हुआ करता था। तो इसी की देखा-देखी मैंने भी एक दिन एक पोस्टकार्ड पर विभिन्न सब्जियों की खेतीबाड़ी में प्रयोग होने वाले कीटनाशक दवाओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर एक पोस्टकार्ड में कुछ लिखा और उसे पोस्टबॉक्स में डाल आया और फिर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया। लगभग एक हफ्ते बाद वह पत्र कानपुर महानगर से प्रकाशित होने वाले एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अखबार के 'संपादक के नाम पत्र' वाले कॉलम में अपने लिखे शब्दों को छपा हुआ देखकर सचमुच आँखों में आँसू आ गए थे। उस घटना के बाद पत्र लिखने का एक सिलसिला ही चल पड़ा। साथियों के साथ खूब पत्र लिखे जाते, कुछ छपते, कुछ न छपते, लेकिन अब इस बात की परवाह न करते हुए जब भी समय मिलता, खूब पोस्टकार्ड लिखे जाते, पोस्ट किए जाते।

हम जिस राजकीय पुस्कालय में पढ़ने जाते थे, शहर में मेरे जैसे तमाम गँवई लड़कों के लिए एकमात्र अड्डा था। यह पुस्कालय जिला विद्यालय निरीक्षक के आधीन था । वहाँ पर सिर्फ एक लाइब्रेरियन और एक चपरासी नियुक्त था। दोनों बहुत मक्कार थे। समय से लाइब्रेरी न खोलना, जल्दी बन्द कर देना , मेम्बरशिप लेने के बावजूद किताबें इश्यू करने में आनाकानी करना, विभिन्न मासिक पत्रिकाओं को पहले अपने घर ले जाना फिर हफ़्ते दो हफ्ते बाद लाइब्रेरी लाना जैसी अनेक करतूतों से  से हम सभी पढ़ने वाले छात्र परेशान रहते थे। हम लोग आए दिन लाइब्रेरियन और चपरासी की शिकायत जिला विद्यालय निरीक्षक से करते, लेकिन उनकी आदतें सुधरने का नाम ही नहीं ले रहीं थी। इन सबसे परेशान होकर हम लोगों ने लाइब्रेरी की समस्याओं और लाइब्रेरियन और चपरासी की शिकायत के रूप में कई पोस्टकार्ड विभिन्न स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों को भेजे। इन शिकायती पत्रों को कई अखबारों ने प्रकाशित किया। जिनमें से कई साथियों के पत्रों के साथ मेरा लिखा शिकायती पत्र भी प्रकाशित हुआ। कुछ स्थानीय अखबारों ने इसे खबर के रूप में छापा। अखबारों में प्रकाशित होने के कारण यह एक बड़ा मुद्दा बन गया, जिसकी आँच जिला विद्यालय निरीक्षक तक पहुँची। उन्होंने इन खबरों को संज्ञान में लेते हुए एक दिन छात्रों के हमारे ग्रुप को अपने ऑफिस में बातचीत के लिए बुलाया। वहाँ पर उन्होंने बड़े ध्यानपूर्वक हमारी शिकायतें सुनी और लाइब्रेरियन व चपरासी को फटकार लगाते हुए आइंदा से नियमानुसार कार्य करने की चेतावनी दी।

जिला विद्यालय निरीक्षक महोदय ने हम लोगो से उन पत्रिकाओं और अखबारों की सूची मांगी, जो हम लोग पढ़ना चाहते थे, लेकिन लाइब्रेरी में नहीं आते थे। उन्होंने उन पत्रिकाओं, अखबारों की लाइब्रेरी भिजवाने की व्यवस्था की। जिसके बाद लाइब्रेरी की व्यवस्था में काफी सुधार हुआ।

इस घटना के बाद पहली बार मुझे शब्दों की ताकत का एहसास हुआ और उसी क्षण मैंने शब्दों से दोस्ती कर ली। अखबारों और प्रतियोगी पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़ाव और गहरा हुआ। 

इसी दौरान किसी पत्रिका या किताब में (ठीक से याद नहीं आ रहा) जब मैंने अज्ञेय की 'छंदमुक्त' कविता 'हिरोशिमा' पहली बार पढ़ी तो अचानक ही दिमाग में यह विचार बिजली की तरह कौंधा कि इस तरह की कविता तो मैं भी लिख सकता हूँ। एक यह महज एक विचार ही था। मैं उस क्षण एक पंक्ति भी नहीं लिख सका।

इसके दो-तीन महीने बाद ही, जहाँ मैं रहता था , वहीं पड़ोस में एक दुर्घटना घट गई, एक नवब्याहता को जिंदा जला दिया गया। इस दुर्घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया और मेरे दिमाग को बहुत उद्देलित और बेचैन किया। यह बेचैनी कई दिनों तक दिमाग को मथती रही। अन्ततः एक दिन इस बेचैनी से मुक्ति पाने के लिए इसे शब्दों में ढालने के प्रयास में डायरी और पेन लेकर लिखने बैठ गया। उस दिमाग मे पहले से पढ़ी हुई अज्ञेय की कविता 'हिरोशिमा' पूरी तरह हावी थी और उसी से प्रेरित होकर कागज पर एक कविता जैसा कुछ लिख डाला। यह मेरी पहली साहित्यिक रचना थी। कविता का शीर्षक रखा - 'अतृप्त इच्छाओं की वेदी'। 

संयोग से वह कविता एक स्थानीय साप्ताहिक पत्र में छप भी गई। इससे उत्साहित होकर  कुछ और कविताएँ, गीत और लघुकथाएँ लिखीं जो विभिन्न स्थानीय साप्ताहिक पत्रों और दैनिक अखबारों की रविवासरीय परिशिष्ट में छपीं। इस तरह लेखन का सिलसिला शुरू हुआ।

जब स्थानीय साप्ताहिक और दैनिक अखबारों में कुछ कविताएं, गीत लघुकथाएँ प्रकाशित हुईं तो पत्रकारिता करने का भूत सवार हुआ। इसी क्रम में अपने शहर के विभिन्न स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों के ऑफिसों के चक्कर शुरू हुए और इसी दौरान पढ़ाई के साथ-साथ एक स्थानीय हिंदी दैनिक अखबार में विधिवत पत्रकारिता की शुरुआत हुई और कविता, गीत, लघुकथा के साथ-साथ  विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेख लिखने लगा।

लेखन के इन विभिन्न चरणों से गुजरते हुए आज भी जब इस सवाल का सामना होता है तो कोई सटीक जवाब नहीं सूझता है। फिर भी कभी दूसरों को तो कभी खुद को जवाब देना ही पड़ता है।

मेरे पास लिखने का कोई एक निश्चित कारण नहीं है बल्कि बहुत सारे कारणों का एक समुच्चय है, जिनके लिए लिखना पड़ता है। कभी संपादकों और मित्रों के आग्रह पर भी लिखना पड़ता है तो कभी किसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए भी लिखना पड़ता है। अखबारी लेखन पैसों के लिए करना पड़ता है।

इस तरह लिखने का एक अन्य प्रमुख कारण अन्याय, झूठ, पाखण्ड, अंधविश्वास, हिंसा, नफरत, साम्प्रदायिकता, सामाजिक असमानता से उत्पन्न बेचैनी, घुटन और संत्रास को अभिव्यक्ति देने और इनसे मुक्ति पाने की छटपटाहट ही है। 

मेरे लिखने का एक और कारण मानवता के प्रति एक समर्पित पक्षधरता है। मैं 'जो जैसा है' से संतुष्ट नहीं होता बल्कि वर्तमान में 'कैसा होना चाहिए' इसके लिए शब्दों की कुदाल से समय की जड़ता को तोड़ने का प्रयास करता रहता हूँ। मैं इसलिए लिखता हूँ कि मेरे लिखे शब्द किसी की आवाज बन सकें। किसी को सांत्वना दे सकें। किसी को उसके डरावने वर्तमान और अंधेरे भविष्य से मुक्ति दिला सकें।

ग्रामीण परिवेश में जन्मा, पला-बढ़ा होने के कारण और  ग्रामीण अंचल में ही कार्यरत होने के कारण मैं लोगों के सुख-दुख, संघर्ष, जिजीविषा, घुटन.. मेरी रचनाओं में अनायास ही आते रहते हैं। 
मानव-जीवन की, उसके परिवेश की जड़ता को तोड़कर कष्टमय वर्तमान और अनिश्चित भविष्य की राह को आसान बनाने की इच्छा ही मेरे लेखन का मूल उद्देश्य है।

प्रसिद्ध साहित्यकार कमलेश्वर ने भी कहा था कि लेखन में ही मुक्ति है। कला का हर रूप यही चाहता है। लिखना भी एक कला है और लेखन का उद्देश्य भी मुक्ति की कामना ही है। इसलिए जब अन्याय, झूठ, पाखण्ड, अंधविश्वास, हिंसा, नफरत, साम्प्रदायिकता, सामाजिक असमानता से उत्पन्न स्थितियां मानव जीवन को 
दुखी करती हैं, झकझोरती हैं तो इन सबसे मुक्ति के लिए उन अनुभूतियों को शब्दों में ढालकर, उन संवेदनाओं को दूसरे लोगों तक, ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए लिखता हूँ। क्योंकि बोलकर, भाषण देकर अपनी बातों को लोगों तक संप्रेषित करने के विकल्प सीमित हैं, और इसमें एक तरह का संकोच भी आड़े आ जाता है, इसलिए लिखकर अपनी बातें लोगों तक संप्रेषित करना ज्यादा बेहतरीन विकल्प है, और मैं इसीलिए लिखता हूँ।

* प्रेम नंदन
शकुन नगर, सिविल लाइंस
फतेहपुर (उ0प्र0)
मो0 : 09336453835
ईमेल : premnandanftp@gmail.com

रविवार, 26 फ़रवरी 2023

दिल्ली की सेल्फी

समकालीन कविता का महत्वपूर्ण दस्तावेज : दिल्ली की सेल्फी कविता 
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विशेषांक 2017
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लड़ना था हमें 
भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ
हम हो रहे थे एकजुट
आम आदमी के पक्ष में
पर उनलोगों को 
नहीं था मंजूर यह।
उन्होंने फेंके कुछ ऐंठे हुए शब्द
हमारे आसपास
और लड़ने लगे हम
आपस में ही!
वे मुस्कुरा रहे हैं दूर खड़े होकर।
(कविता:यही तो चाहते हैं वे, कवि: प्रेम नंदन)

आगे मत पढ़िए। एक मिनट रुकिए और अपने आसपास के माहौल के बारे में सोचिए। 

क्या हर तरफ़ ऐसा ही नहीं हो रहा है, जैसा ऊपर की पंक्तियों में कहा गया है। एक ऐसा हंगामा बरपा हुआ है, जिसका मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ बांटना है,  आदमी-आदमी के बीच जितना संभव हो, उतनी दीवारें खड़ी करते जाना है—ताकि आदमी कटता-मरता रहे और सत्ता अपना हित साधती रही। सदियों से सत्ता का चरित्र ऐसा ही रहा है।  

ये पंक्तियां उस कविता विशेषांक  के तेवर की ओर इशारा करती है, जिसका प्रकाशन दिल्ली  के साप्ताहिक अखबार ‘दिल्ली की सेल्फी’ ने किया है। दिल्ली की सेल्फी कविता विशेषांक 2017 का प्रकाशन इस अखबार की पहली वर्षगांठ पर किया गया और जनवरी में दिल्ली विश्व पुस्तक मेले के दौरान इसका लोकार्पण हुआ। इस विशेषांक में 49 कवियों की रचनाएं शामिल हैं। इनमें वरिष्ठ कवि भी हैं और वो भी हैं, जिन्होंने अभी अभी कलम उठाया ही है लेकिन विषयों की विविधता, लेखन की शैली, भाषा की बुनावट, शिल्प के वैविध्य की वजह से यह विशेषांक समकालीन कविता का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया है।  यह विशेषांक हिन्दी कविता के समकालीन प्रवृत्तियों को बखूबी रेखांकित करती है। इसे पढ़कर आप समझ सकते हैं कि हिंदी कविता में आज क्या और कैसा लिखा जा रहा है।

इस विशेषांक की कविताओं में प्रेम है, नफ़रत है, शहर के कंक्रीट के ढेर में तब्दील होते जाने की विडंबना है तो गांव के भी शहर  के नक्शे कदम पर चल पड़ने की व्यथा है। प्रकृति की खूबसूरती का बखान है तो इसकी 
खूबसूरती को उजाड़ने की साज़िश से सतर्क करने की तत्परता भी। व्यवस्था पर सवाल है, गुस्सा है, प्रतिरोध है।

हर प्रतिरोध में मिलाता हूं अपनी आवाज़
डरता हूं अपनी आवाज़ के पहचाने जाने से
डरता पहचान लिए जाने से
डरता हूं चिह्नित होने से
और जब तक ये डर मुझमें पैठा रहेगा
प्रतिरोधात्मक राग बेअसर रहेगी
(कविता : प्रतिरोध के कोरस में एक स्वर मेरा भी,  कवि : अनवर सुहैल Anwar Suhail)

आम आदमी का ये डर उसे जिल्लत भर ज़िन्दगी जीने को मज़बूर करती है। मुठ्ठियां खुली हुईं है। असहिष्णु आतताइयों के जुल्म को सहने की सहिष्णुता हैं लेकिन क्रांति के लिए मुठ्ठियां बंद करने की हिम्मत सिरे से गायब है।

यह समय है
आंखें बंद कर 
शुतरमुर्ग हो जाने  का
या फिर चील, बाज की तरह
विलुप्त हो जाने का
संक्रमित समय है यह!!
(कविता : संक्रमित समय  है यह, कवि : अरुण चंद्र राय) 

इस संक्रमित समय में भी इंसानियत को बचाए रखने की कोशिश में कवि पीछे नहीं रहता। 

जब मैं मरूं
तो मेरी अर्थी को कंधा  देने से पहले
देख लेना कहीं आस-पास
किसी खेत के किनारे
पेड़ पर लटक न रही हो
किसी किसान की लाश
कहीं न पड़ी हो
भूख से तड़प कर 
चार कंधों  की आस में
मरे किसी मज़दूर की अर्थी
भाई मेरे,
बस इतना ही चाहता हूं
कि मुझे मोक्ष प्रदान करने से पहले
और बाम्हनों को
हलुआ-पूरी खिलाने से पहले
उन्हें कंधा जरूर दे देना।
(कविता : जब मैं मरूं,  कवि : के. रवींद्र) Kunwar Ravindra

यह कविता नहीं है, मौजूदा समय का आईना है। इसमें साफ़ दिख रहा है कि किसान के पैरों तले ज़मीन नहीं है। वह हवा में लटकने को विवश है। मज़दूर के हाथ में काम नहीं है। थाली में रोटी नहीं है लेकिन एक वर्ग है, जो इनकी मौत पर भी हलुवा पूरी खा रहा है। उसकी कोशिश ही यही है कि मेहनतकश का पेट कभी न भरे। वो हर वक्त यही साज़िश रचने में व्यस्त रहता है। ऐसे लोगों को बेनकाब करती कविता भी विशेषांक में मौजूद है।

तुम्हारे भूख को जिंदा बचाए रखना
हमारी मज़बूरी है
क्योंकि जिस दिन
तुम्हारी भूख मर जाएगी
वर्षों की हमारी वधशाला  की
यह साधना भंग हो जाएगी
देश का जमीर मर जाएगा
उल्टे हम  भूखों मर जाएंगे
शायद नहीं पता हो तुम्हें
कि सत्ता जब भूखी होती है
जब उसका जमीर मर जाता है
तो वह  अजगर की तरह
निगल जाती है पूरे मुल्क को
(कविता:देशद्रोह का खतरा, कवि:योगेंद्र कृष्णा)

लेकिन मेहनतकश वर्ग भूख से लड़ता रहता है। भूख से जंग से, हालात से समझौते की ऐसी कई कविताएं इस विशेषांक में मौजूद हैं।

भात में नमक अधिक पड़ जाये
तो पानी मिलाकर खाते हैं
और पानी अधिक पड़ जाये
तो नमक मिलाकर खाते हैं
गरीब अपनी गरीबी भले ही न मिटा पाये
परन्तु अपनी भूख मिटाना जानता है
भूख तो असल में 
अमीरों की मिटाए नहीं मिटती
फिर चाहे मुल्क ही मिट जाए।
(कविता : भूख,  कवियत्री : अनामिका चक्रवर्ती ‘अनु’) 
***
उन्हें पता है
कितनी रोटी बची है चकले और थाली के बीच
चावल की हांडी में कितनी मुठ्ठी उम्मीद बची है
देह में कितना ताप बचा है
बचे हैं और भी कितने ही संघर्ष के दिन
लेकिन इस भोथर देह ने इंकार कर दिया है
उन्हें यकीन नहीं है
कि आज कड़ाके की ठंड है
(कविता:उन्हें यकीन नहीं, कवि:प्रशांत विप्लवी) 
***
महीने के अन्त में 
पिताजी चाय कम पीया करते हैं
और
सादी चाय उन्हें बहुत
अच्छी लगती है।
(कविता : दीवार पर टंगी वह कमीज, कवि : अभिनव सिद्धार्थ)

इसी भूख ने गांव को शहर का रुख  करने को मज़बूर किया। शहर ने कुछ पैसे दिए लेकिन ज़िन्दगी का सारा सुख छीन लिया। मजबूरी के शहर और मोह के गांव के बीच पिसा मध्यवर्ग का दर्द कुछ कविताओं में बखूबी उभरा है।

एक ज़माने में
भारी छूट की भाषा से 
जब अंजान थे लोग
तब 
घर के साथ-साथ
आंगन भी मिल जाता  था...
आज भारी छूट पर मिलते हैं
विशाल चौकोरों में छोटे-छोटे चौकोर
और आदमी छज्जे तक को तरस जाता है
कि छीन ली जाती है
जीवन से पाई-पाई जीने की कला
(कविता : भारी छूट,  कवि :अनुज)

शहर आने वाले आदमी की  
अंटी देखता है और
जाने वाली की छोड़ी गई सहन
जिसमें उसके अपने खड़े
होने की गुंजाइश हो।
अब जब मैंने खपा दी
शहर में अपनी उमर
जहां ने कभी मेरे आने से
वेशी हुई थी न
चले जाने से खाली होगा कुछ।
अब गांव जाकर
कहां किस पटोहे में
किस दुरौधें के नीचे
किस आले में रखूंगा
अपना यह खालीपन
(कविता:शहर से मिला  कवि: नरेंद्र पुंडरीक) 

राष्ट्रवाद जब चुनावी जुमला बन जाता है, तब केवल तमाशा होता है। उस तमाशे में वह दर्द जब जाता है, जो देश के लिए शहीद होने वाले सिपाही का परिवार झेलता है। 

युद्ध में अकेला नहीं जाता है सिपाही
साथ जाता है उसका किसान बाप
और उसकी डेढ़ बिसुआ ज़मीन...
साथ जाती है उसकी बूढ़ी मां
और उसकी पथराई आंखें
            ***
साथ जाते हैं उसके यार
साथ जाती है हुस्ना
साथ जाता है उसका घर
उसका खेत
उसका गांव
उसकी नीम
उसकी छांव
***
युद्ध में अकेला नहीं मरता है सिपाही
साथ ही मर जाते हैं ये सभी भी
(कविता:युद्ध में अकेला नहीं जाता सिपाही, कवि:नीरज द्विवेदी )

संग्रह में 49 कवियों  की कविताएं शामिल हैं। यहां सबका जिक्र करना संभव नहीं है लेकिन इस संग्रह में आपको अजय चंद्रवंशी, , अनिल कुमार पांडेय, अनुप्रिया, अनुराधा सिंह, अभिनव सिद्धार्थ, अरविंद श्रीवास्तव Arvind Srivastava, अरुण श्री, आनन्द गुप्ता Anand Gupta, इंदु सिंह, दिनेश कुमार, दिलीप कुमार शर्मा ‘अज्ञात’, ध्रुव गुप्त , नवनीत पांडेय Navneet Pandey, नूर मुहम्मद नूर Noor Mohammad Noor, नेहा सक्सेना, परमेंद्र सिंह, प्रदीप त्रिपाठी, बुद्धिलाल पाल Buddhi Lal Pal, महावीर राजी Mahabir Raji, मिथिलेश कुमार राय, मीता दास , यशस्विनी पांडेय, रचना त्यागी, राखी सिंह, राजकिशोर राजन ,शशांक शेखर, शहंशाह आलम Shahanshah Alam, शैलेंद्र कुमार शुक्ल, शैलेंद्र शांत, संतोषकुमार चतुर्वेदी Santosh Chaturvedi, सागर आनन्द, सुलोचना वर्मा ,सोनी पांडेय, सौरभ वाजपेयी, हनुमंत किशोर , ज्योति तिवारी की कविताएं हैं।(नाम अल्फाबेटिकल क्रम में है)

ये विशेषांक पठनीय और संग्रहणीय है। इस अंक के लिए संपादक नित्यानंद  गायेन Nityanand Gayen और कविता चयन में अहम भूमिका निभाने वाले प्रभात पांडेय Prabhat Pandey और रमेश पाठक  बधाई के पात्र हैं।

कश्मीर के कवि निदा नवाज Nida Nawaz की कविता के कुछ अंश के साथ खत्म करता हूं, पढ़िए और जानिए धरती के स्वर्ग की हक़ीक़त
मैं उस स्वर्ग में रहता हूं
जहां घर से निकलते समय मांएं
अपने बच्चों के गले में
परिचय पत्र डालना कभी नहीं भूलतीं
भले ही वह भूल जाय
टिफिन या किताबों के बस्ते
अपने नन्हों के परिचय की खातिर नहीं
बल्कि 
उनका शव घर के ही पते पर पहुंचे
इसकी ही चिन्ता है उन्हें
*   * *
मैं उस स्वर्ग में रहता हूं
जहां बच्चा होना होता है सहम जाना
जवान होना होता है मर जाना
औरत होना होता है लुट जाना
और बूढ़ा होना होता है
अपने  ही संतान का 
कब्रिस्तान हो जाना
*******
मैं उस नर्क में रहता हूं
जो शताब्दियों से भोग रहा है
स्वर्ग होने का एक
कड़वा और झूठा आरोप
 (कविता: मैं उस स्वर्ग में रहता हूं, कवि:निदा नवाज)
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पत्रिका: दिल्ली की सेल्फी कविता विशेषांक 2017
संपादक : नित्यानंद गायेन
कविताओं का चयन: प्रभात पांडेय, नित्यानंद गायेन और रमेश पाठक
मूल्य : 50 रुपए
पता: A-21/27, सेकेंड फ्लोर, नारायणा इंडस्ट्रियल एरिया, फेस II, नई दिल्ली-28

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

राजेन्द्र राव

कथा का विलक्षण शिल्पी : राजेन्द्र राव ----------------------------------------------
@ प्रेम नंदन 

राजेन्द्र राव वरिष्ठ कथाकार हैं अपनी कहानियों और उपन्यासों के आधुनिक समस्यामूलक कथाबिम्बों के कारण वो हिन्दी बहुपठित कथाकार हैं । समकालीन कहानी ने परम्परागत फार्मेट में पर्याप्त तोडफोड कर ली है अब वह भाषा से लेकर विषय तक किसी भी पक्ष में परम्परा के पेशेवर अन्दाज का परित्याग कर चुकी है । राजेन्द्र राव की कहानियों को इसी परित्याग के सन्दर्भ में परखना होगा । राजेन्द्र जी अपने समूचे रचनात्मक जीवन में प्रयोगधर्मी रहे ।हर एक कहानी अगली कहानी से पृथक रचनात्मक भाषा और विषय लेकर चलती रही । शिल्प में भी वो वैविध्यपूर्ण हस्तक्षेप करते है।शायद इसी  विविधता के कारण उनकी समीक्षा के प्रतिमान अभी तक नही बन पाए किसी भी लेखक के समीक्षा प्रतिमान तभी निर्मित होते हैं जब वो शिल्प के स्तर पर व भाषा के स्तर पर एकरसता व एकरूपता का संवहन करता है । नवीन जीवनबोध , नयी समस्याओं के लिए निरन्तर शैल्पिक प्रयोग परम्परागत आलोचना प्रतिमानों में नही अंटते अतः या तो आलोचक समीक्षण का साहस नही करता या फिर वो लेखक के कृतित्व को जानबूझकर पढना नही चाहता है यही कारण है राजेन्द्र राव के कथासाहित्य का अब तक समुचित  मूल्यांकन नही हो सका है बिल्कुल वैसे ही जैसे माधवराव सप्रे , चतुरसेन शास्त्री , भगवती चरण वर्मा और दूधनाथ सिंह के कथा साहित्य का अब तक मूल्यांकन नही हो सका है ।माधवराव सप्रे छत्तीसगढ के थे उनकी कहानी टोकरी भर मिट्टी को हिन्दी की पहली कहानी कहा जाता है अपने समय की सबसे यथार्थ कहानी थी मगर भाषा और शिल्प के स्तर पर वह अपने समकालीन से बहुत आगे थी यही कारण है इस कथा को अनदेखा किया गया और माधवराव सप्रे को वह महत्व नही मिल सका जो मिलना चाहिए । चतुरसेन शास्त्री इतिहास और संस्कृति को लेकर नवीन जीवनबोध की कहानी लिखते थे जिनसे मिथक तो इतिहास और पुराण से लेते थे पर सन्देश आधुनिक होता था । उनका युग प्रेमचन्द का युग था प्रेमचन्द के विशाल व्यक्तित्व के समक्ष इस यथार्थवादी कथाकार की भी उपेक्षा की गयी । राजेन्द्र राव का युग आजादी के बाद का हिन्दुस्तानी युग है । आजादी के बाद नवजात मध्यमवर्ग व उसकी सामाजिक पारिवारिक संघर्षों व विडम्बनाओं को उनके कथा साहित्य में तरजीह दी गयी है इसका आशय यह नही की उनकी कहानियों में सर्वहारा चरित्र नही है 
राजेन्द्र राव की कथाओं का फलक अति विस्तृत है इस व्यापक फलक पर यह आरोप कतई नहीं लग सकता कि उनकी दृष्टि में वर्गीय विभेद नही है  । यह सच है वो जीवन की यथार्थ अर्थछबियों सें यकीन रखते हैं यह आधुनिक कथाकारों का लक्षण है कि वो किस्सा या गल्प की बजाय यथार्थ व अनुभूत सच को अधिक तरजीह देते हैं जीवन का अनुभूत तथ्य कथा को गतिशील तभी बनाता है जब वह डबी घटनात्मक परिणिति मे अपने आप को तब्दील कर ले । यही अधिकांश लेखक कर रहे है कुछ के लिए घटना का बडा होना ही कथा की बुनावट है अस्तु वो तमाम छोटी छोटी घटनाओं का संजाल तैयार करके कथानक को बडी घटना के रूप मे तैयार कर लेते हैं उनके लिए छोटी घटनाएं महज तैयारी का काम करती है ऐसी कहानियाँ अधिकांशतः विवरण बनकर रह जाती हैं ज्ञानरंजन मे इस टेक्निक को देखा जा सकता है उनकी पिता कहानी भी मध्यमवर्गीय है पर अयथार्थ घटनाओं का ऐसा संजाल बुना गया है कि कहानी यथार्थ को अधिक प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त नही कर पाती है राजेन्द्र राव इस कथा टेक्निक का उपयोग एकदम नही करते हैं उनकी शैली सबसे अलहदा है वो तमाम टेक्निकों को धता बताकर परिवेश सृजन पर अधिक बल देते है "लौकी का तेल" कहानी को ही देखिए इस कहानी मे लेखक अपने मन्तव्यों की प्रतिपुष्टि मे वस्तु चित्रण व वातावरण को इतना व्यापक व सूक्ष्मता से युक्त कर देता है कि तमाम संवाद और घटनाएं वातावरण की स्मृति बिम्ब से उपजे लगने लगते है समूची कहानी मे कोई भी घटना अस्वाभाविक व थोपी गयी नही प्रतीत होती वातावरण प्रधानता के कारण कथा भी कभी कभी गौंण हो जाती है मगर प्रवाह बाधित नही है ।यह नवीन टेक्निक है जिसे काशीनाथ सिंह और दूधनाथ सिंह भी सफलता पूर्वक प्रयोग करते हैं ।  
जाहिर है जब लेखक का उद्देय वातावरण और उससे जन्य चरित्र ही कथानक के आधार होगें तो लेखक कहानी की माँग के अनुसार ही वर्गीय चरित्र लाएगा यदि वातावरण में चरित्र की जरूरत नही हो तो लेखक इस अकथ जोखिम को क्यों उठाए हलाँकि राजेन्द्रराव जोखिम के कथाकार है पर वातावरण मे जोखिम की सम्भावना कम रहती है फिर भी वर्गीय नजरिए से वो पृथक नही है ड्राईवर , दुकानदार , फुटपाथ , सब्जीवाले , बेरा , पालिसवाला , जैसे चरित्र स्वाभाविक रूप से उनकी कहानियों मे जगह पाते हैं पर इनकी वर्गीय अवस्तिथि को परखने के लिए आलोचक को भी वातावरण को परखने का जोखिम उठाना पडेगा ।ये सारे चरित्र सर्वहारा के हैं बहुत से लोगों की धारणा है कि वो लोक और सर्वहारा का विभाजन करते समय गाँव और शहर की अवैचारिक सीमाओं में कैद हो जाते हैं जबकि लोक और अभिजात्य का विभाजन शहर और गा्ँव का विभाजन नही है वह वर्गीय विभाजन है विचारधारा का सवाल है । यदि गाँव में किसान मजदूर सर्वहारा है तो शहर मे रिक्सेवाले खोमचेवाले , जैसे समुदाय सर्वहारा है क्योंकी दोनो की वर्गीय स्थिति और शोषक शक्तियाँ एक जैसी है दोनो के तरीके अलग मगर मन्शा एक ही है समस्याएं एक ही है यदि इस नजरिए से राजेन्द्र राव की कहानियों को देखा जाए तो राव भी सर्वहारा के कथाकार ठहरते हैं और उनकी दृस्टि भी वर्गीय दिखाई देती है | साथ ही नवीनता बोध भी राजेन्द्र राव की कहानियाँ हमारे समय की विडंबनाओं को नए ढंग से रेखांकित करती हैं, वे अपनी कहानियों मे समाज मे होने वाली सामान्य सी घटनाओं को लेते  हैं और फिर कथ्य और शिल्प से ऐसा ताना-बना बुनते हैं कि हम उनसे जुडते चले जाते हैं | सामाजिक रिस्तों की  आपाधापी के बीच वे रिस्तों को बचाने की  कोशिश करती  कहानियाँ लिखने वाले काहनीकर हैं|

अपनी चर्चित कहानी  दोपहर का भोजन मे वे प्रेम के सामाजिक अंतर्द्वंद  को हरे हमारे सामने रखते हैं , हमारा समाज  शुरू से ही प्रेम के प्रति बहुत ही असहिष्णु रहा है , ये कहानी भी उसी ओर इशारा करती है| इस कहानी में नायिका की बड़ी बहन एक सिक्ख लड़के से शादी कर लेती है जिसके कारण उसके माँ-बाप उससे  रिस्ता तोड़ लेते हैं ,अब नायिका को डर हैं की कहीं उसके साथ भी ऐसा ही न हो , जिसकी पूरी सांभावन है ,तो वह  दूसरे विकल्पों की तलाश मे जुट जाती है  जिससे उसका प्यार भी बचा रहे और माँ- बाप का आशीर्वाद भी | इस कहानी मे एक प्रेमी जोड़ा हैं जो अपने प्रेम को बचाए रखने के साथ-साथ अपने माँ-बाप का भी आशीर्वाद  चाहता है लेकिन ये संभव होता नहीं दिखता तो वे कोई दूसरा रास्ता तलाशने कि कोशिश करते दिखाई देते हैं जिससे उनका प्रेम और माँ- बाप का प्यार भी मिलता रहे| राजेंद्र राव ने और भी कई प्रेम कहानियाँ लिखी हैं उनकी इन कहानैयों मे एक तरफ उद्दाम प्रेम मे डूबते –उतराते प्रेमी युगल दिखते हऐन तो  दूसरी तरफ परिवार और सामाज की बेड़ियों मे जकड़े अपने प्रेम को कुर्बान करर्ते प्रेमी – प्रेमिका भी दिखाई देते हैं | लेकिन दोपहर  का भोजन कहानी  मे ये प्रेमी जोड़ा कोई नए रास्ते की तलाश करते दिखाई  देते हैं |  
साहित्य मे राजनीतिक और पूँजीपतियों ने कैसी सेंध लगाई हैं इसको देखना के लिए राजेंद्र  राव की कहानी – मैं राम की बाहुरिया पढ़ना चाहिये इस कहानी मे उन्होने दिखाया हैं कि कैसे  एक पूंजी पति आपने राजनीतिक  संपर्कों के जरिये पहले अकूत संपत्ति अर्जित करता है और जब वह संपप्ति उसके गले की हड्डी बनने लगती है तो फिर उसी काली कमाई के जरिये साहित्य मे घुसपैठ करके, एक चर्चित साहित्यकार बनकर , साहित्य का नियंता बन बैठता है ,इस कहानी के जरिये राजेंद्र राव ने पहले ही जयपुर साहित्य महोत्सव जैसे आयोजनाओ और फर्जी लेखकों की ओर इशारा कर दिया था | उन्होने अपनी एक अन्य कहानी लौकी का तेल मे राजनीति और पूँजीपतियों के गठजोड़ को दर्शाने की प्रयास किया है इस कहानी मे उन्होने दिखाया हैं की पूंजीपति लोग कैसे अपने फायदे के लिए राजनीती इस्तेमाल करते हैं और राजनीतिक लोग भी अपनी राजनीति चमकाने मे जनता के हितों की कोई परवाह नहीं करते हैं |राजेन्द्र राव की कहानियों मे अपने समय के तनावों को मजबूती से उठाया गया है पूंजीवादी व्यवस्था कैसे अपने जाल फैलाती है और आम जन मानस को अपनी आगोस मे लेकर उनका खून चूसती है , इन सब बातों को वे बड़ी बारीकी से पकड़ते हैं और इस जाल मे उलझे आम आदमी की छटपटाहट को रेखांकित करते हैं|  राजेन्द्र राव जी अपनी कहानियों मे शिल्प के स्तर पर बहुत ज्यादा प्रयोग न करके अपनी बात सीधे सरल शब्दों मे घटनाओं को पिरोते हैं और बिना किसी नाटकीयता के कहानी को आगे बढ़ाते हैं | छोटी छोटी बिम्बावलियों और दृष्यों से कथानक सृजित कर देना कला है राजेन्द्र राव इस कला में सिद्धहस्त है । इस टेक्निक मे लेखक हर स्थान में स्वयम् उपस्थित रहता है ।अक्सर कहानियों मे लेखक कथा कहते कहते नेपथ्य मे चला जाता है वह पाठक की भावानुभूतियों और प्रतिक्रियाओं के बूते कथानक को व गतिशीलता को आगे बढाता रहता है इससे कथानक पूर्ण रूप से तारतम्यता पर निर्भर होता है पाठक का व्यवधान भी लेखक का व्यवधान बन जाता है राव इस स्थिति से परिचित हैं । अतः उन्होने अपनी अधिकांश कहानियों में खुद को भी उपस्थिति करके करके रखा है लेखक गायब नही होता है वह गाईड की तरह कथानक को सपाट और सुग्राह बनाता हुआ चलता है । हलांकि मैं शैली मे उनकी अधिक कहानिया नही है न ही वो उत्तम पुरुष के रूप मे कही उपस्थित है पर अन्य सत्ता के रूप भे विवरण देते समय लेखक की उपस्थिति का जोरदार आभाष होता रहता है यह भी प्रयोगधर्मी जोखिम की तरह है  इस जोखिम मे लेखक सफल हो जाता है एक तरफ वो पाठक को बाँधकर रखने मे सफल होता तो दूसरी तरफ वो चरित्र का आवश्यक विस्तार भी कर देता है । यदि लेखक प्रकारान्तर से अपनी कहानी मे उपस्थित है तो वह अपने मन्तव्यों को जीवन से जुडे सवालों के साथ अधिक सफलता से प्रेषित कर सकता है मुन्सी प्रेमचन्द की बहुत सी कहानियों मे इस विशिष्टता को देखा जा सकता है । लेखक की उपस्थिति से पाठक और लेखक का चिन्तन व आवेग समानान्तर हो जाते है पाठक लेखक की दृष्टि से सीधे जुड जाता है अतः ऐसी कहानियाँ प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से अधिक सफल होती हैं । ऐसी कहानियाँ संवादी भंगिमा से युक्त होकर बेधडक आगे बढती जाती है । इस विशिष्टता के कारण राजेन्द्र राव की कहानिया पाठक के भीतर अरुचि मा ऊब नही उत्पन्न करती है वह और भी अधिक संघातों का गरिमामय प्रतिबिम्ब बनाती हैं
राजेन्द्र राव की कृतियाँ उनके व्यक्तित्व का परिचय कराती है एक ऐसा व्यक्तित्व जिसमे चिन्तन के सूक्ष्म तन्तु व वैचारिक बनावटों की तहें भी उपस्थित हैं । चूँकि लेखक की वैचारिक अवस्थितियाँ साहित्यिक , सांस्कृतिक व सामाजिक परिवेश की पैदाईस होती है लेखक का चतुर्दिक देशकाल ही उसकी विचार प्रक्रिया व चिन्तन को सामाजिक आधार देता है यदि राजेन्द राव जी की कहानियों मे मध्यमवर्गीय परिवारों व उनकी समस्याओं का प्रतिबिम्ब है तो इसके लिए उनका सामाजिक यथार्थ उत्तरदायी है । लेखक अपने आस पास के अपने लोगों को ही कहानी या कविता का विषय बनाता है वह अपने परिवेश से बाहर निकलना नही चाहता यदि वह निकलेगा तो कहानी मे कहीं न कहीं नकलीपन जरूर आ जाएगा और कहानी के निकष जीवन अनुभव के निकष बनकर नही उपस्थित हो सकेगे राव की साहित्यिक प्रेरणा भारत के वृहत्तर सामाजिक जीवन की फरिलब्धि है उनकी कहानियों की इमारत शून्य मे नही बनी कल्पना की अनुकृति नही है वह यथार्थ की इबारत है ।वैचारिक व्यक्तिगत अनुभवों की संवेगशील अभिव्यक्ति है । शिल्प और भाषा के सम्बन्ध मे वो अपने समकालीनों से अलग रहे उन्होने दृष्यात्मक व परिदृष्यात्मक शैली का कुशलतम प्रयोग किया है ये दोनो शैली रेणु की उपन्यासों मे भी उपस्थित है ।जब परिवेश को चरितनायक का दर्जा दिया जाना होता है तभी इस शैली का उपयोग होता है इस शैली से कोई भी घटना अस्वाभाविक नही लगती समूचा परिदृष्य अपने आप उपस्थित होता व स्पष्टीकरण देता चला जाता है । समाज के सांस्कृतिक व पारिवारिक सवालों को लेकर राजेन्द्र राव की कहानियाँ व्यापक माहौल विनिर्मित करती हैं इस सन्दर्भ में वो लेखक और समाजशास्त्री दोनो हैं वे अपनी कहानियों में भारतीय अस्मिता वैयक्तिक अस्मिता जातीय अस्मिताओं के सवालों के साथ बहुलतावादी वर्गीय संस्कृति के सवालों से खुलकर मुठभेड करते हैं ।साथ ही समाज को संचालित करने वाली तमाम शक्तियों का पोस्टमार्डम करते हुए जनता के पक्ष मे विरोध व सपनों का खूबसूरत आधार प्रस्तुत करते हैं राव की कहानियाँ चिर परिचित आस्वाद में खलल डाले बगैर नये कथात्मक आस्वाद से परिचित कराती हैं और बहुत कुछ मनुष्य के उपभोक्तावादी जडताओं और मूढताओं का खंडन करती है । लेखक जितना बेरहम जडताओं के खंडन के पक्ष मे है उतना ही दरियादिल व सजग नव निर्माण के प्रति है इसे उनकी निजी रंगत कहिए या अखिल भारतीय वैश्विक परिवर्तनों की समझ वह लोकलटी के साथ वैश्विकता की ओर कदम बढाते हैं स्थानीयता के साथ भूमंडलीकरण को परखते हैं परिवार के आधार पर मनुष्यता को देखते हैं तो विहंगम मानवता के साथ अस्मिता की बात करते है निः सन्देह राजेन्द्र राव हमारे समय के बडे कथाकार है । जिन्हे हम जानबूझकर उपेक्षित नही कर सकते हैं |
                                                                             @ प्रेम नंदन

बुधवार, 10 अगस्त 2022

कवियों की कथा

#कवियों_की_कथा-30
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   फतेहपुर के प्रेम नंदन एक प्रतिबद्ध युवा कवि हैं! लेखन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रभावित करती है । अब तक उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । उनकी कविताओं में वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ जीवन मूल्यों के रक्षण का आग्रह  है ।साथ ही ग्राम्य जीवन तथा उसकी जटिलताओं की सहज अभिव्यक्ति  है,,!
     आज इस काॅलम की तीसवीं कड़ी में प्रेमनंदन की कविताओं में अभिव्यक्त प्रतिबद्धता से परिचित होंगे,,!

            कवि की कथा=कवि की कलम से 
                      #कवि_कथा

अपने लेखन की शुरुआत के बारे में बात करूं तो जब मैं लिखने के कारणों की ओर झाँकने का प्रयास करता हूँ तो कई प्रश्न एक साथ सामने आ खड़े होते हैं- आखिरकार मैंने लिखना कैसे और क्यों शुरू किया?
साहित्य का मेरे घर-परिवार से दूर-दूर तक कहीं कोई रिश्ता नहीं था तो फिर मुझमें लेखन के संस्कार कहाँ से आए? 

बचपन के गलियारों में लौटने पर कई चीजें स्पष्ट हो जाती हैं, बातें शुरूआत की ओर पहुँच जाती हैं।
लिखने के शुरुआती बीज मेरे मष्तिष्क में शायद अम्मा की लोरियों ने बोए होंगे, कविता के प्रति लगाव शायद अम्मा के गाने-गुनगुनाने की आदत से पैदा हुआ होगा। अम्मा के पास लोकगीतों और कहानियों का अकूत भंडार है। 

उन दिनों अम्मा गांव और रिश्तेदारी में एक अच्छी गउनहर के रूप में प्रसिद्ध थी और विभिन्न तीज-त्योहारों और शादी-ब्याह के अवसरों पर लोग उनको इसी गुण के कारण विशेष रूप से आमंत्रित करते थे।

अम्मा अब भी हमेशा कुछ ना कुछ गाती-गुनगुनाती रहती हैं। बचपन में मुझको नींद तभी आती थी जब अम्मा मीठे स्वर में लोरियां सुनाती थी और सुबह उनकी गुनगुनाने की आवाज सुनकर ही आंखें खुलती थीं। दरअसल अम्मा हमारे सोने के बाद ही सोती थी और हमारे जागने के पहले जाग जाती थी और वे घरेलू कार्य प्रायः गाते-गुनगुनाते हुए ही करती थीं, अब भी उनकी यही दिनचर्या है। यह उस समय की लगभग सभी घरेलू महिलाओं की नियमित दिनचर्या होती थी।

अम्मा की लोरियों के पंखों पर सवार होकर जब मैं स्कूल गया तो वहां भी मेरा परिचय सबसे पहले कविता यानी स्कूल में गाई जाने वाली प्रार्थना से  हुआ। हिंदी की किताब में पहला पाठ भी कविता ही था। अम्मा से मिले संस्कारों के कारण बचपन में कविताएँ मुझे शीघ्र ही याद हो जाया करती थीं शायद यही कारण रहा है कि मुझे अपनी किताब की सभी कविताएं याद रहती थीं और मैं उन्हें अक्सर गुनगुनाया करता था। 

इसी दौरान जिंदगी में पहले प्यार के रूप में रेडियो का प्रवेश हुआ। उस समय घर में दो रेडियो थे, एक बुश का बड़ा रेडियो, लकड़ी की बॉडी वाला, दूसरा बुश की अपेक्षाकृत छोटा रेडियो- मर्फी का प्लास्टिक बॉडी में।
धीरे-धीरे मर्फी वाला रेडियो मेरा सबसे प्यारा और गहरा दोस्त बन गया।अम्मा के गीतों के साथ-साथ, रेडियो पर फिल्मी गाने, लोकगीत, गजलें सुनते हुए मैं बड़ा हुआ। रेडियो से बचपन की ये दोस्ती हाल फिलहाल तक बनी रही।  मेरे बनने-बिगड़ने में रेडियो का भी बहुत बड़ा योगदान है। 

इस तरह गीतों और कविताओं के प्रति मैं बचपन से ही लगाव महसूस करता था लेकिन कविता या और कुछ लिखने के बारे में तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद जब मैं आगे की पढ़ाई के लिए शहर आया तो जहाँ मैं किराए पर रहता था उससे कुछ दूरी पर एक राजकीय पुस्तकालय और राजकीय छात्रवास अगल-बगल स्थित थे। मेरे कई सीनियर और परिचित साथी राजकीय छात्रवास में रहते थे और अखबार, पत्रिकाएं पढ़ने के लिए रोजाना राजकीय पुस्तकालय जाते थे । मैं भी उन्ही के साथ पहले तो प्रायः रविवार और फिर नियमित रूप से लाइब्रेरी जाने लगा था लगा। वहाँ पर कई अखबार, प्रतियोगी पत्रिकायें, साहित्यिक पत्रिकाएं आती थीं। वहीं पहली बार अखबारों और पत्रिकाओं से दोस्ती हुई। उस समय 'संपादक ने नाम पत्र' जैसे कॉलम लगभग सभी अखबारों में होते थे। 

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों कर रहे कई सीनियर साथी संपादक के नाम पत्र लिखते थे और जब वे अखबारों में प्रकाशित होते थे तो बड़े गर्व से हम सबको दिखाते थे कि देखो-मेरा लिखा हुआ अखबार में छपा हैं। उस समय यह देखना काफी रोमांचक अनुभव हुआ करता था। तो इसी की देखा-देखी मैंने भी एक दिन एक पोस्टकार्ड पर विभिन्न सब्जियों की खेतीबाड़ी में प्रयोग होने वाले कीटनाशक दवाओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर एक पोस्टकार्ड में कुछ लिखा और उसे पोस्टबॉक्स में डाल आया और फिर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया। लगभग एक हफ्ते बाद वह पत्र कानपुर महानगर से प्रकाशित होने वाले एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अखबार के 'संपादक के नाम पत्र' वाले कॉलम में अपने लिखे शब्दों को छपा हुआ देखकर सचमुच आँखों में आँसू आ गए थे। उस घटना के बाद पत्र लिखने का एक सिलसिला ही चल पड़ा। साथियों के साथ खूब पत्र लिखे जाते, कुछ छपते, कुछ न छपते, लेकिन अब इस बात की परवाह न करते हुए जब भी समय मिलता, खूब पोस्टकार्ड लिखे जाते, पोस्ट किए जाते।

हम जिस राजकीय पुस्कालय में पढ़ने जाते थे, शहर में मेरे जैसे तमाम गँवई लड़कों के लिए एकमात्र अड्डा था। यह पुस्कालय जिला विद्यालय निरीक्षक के आधीन था । वहाँ पर सिर्फ एक लाइब्रेरियन और एक चपरासी नियुक्त था। दोनों बहुत मक्कार थे। समय से लाइब्रेरी न खोलना, जल्दी बन्द कर देना , मेम्बरशिप लेने के बावजूद किताबें इश्यू करने में आनाकानी करना, विभिन्न मासिक पत्रिकाओं को पहले अपने घर ले जाना फिर हफ़्ते दो हफ्ते बाद लाइब्रेरी लाना जैसी अनेक करतूतों से  से हम सभी पढ़ने वाले छात्र परेशान रहते थे। हम लोग आए दिन लाइब्रेरियन और चपरासी की शिकायत जिला विद्यालय निरीक्षक से करते, लेकिन उनकी आदतें सुधरने का नाम ही नहीं ले रहीं थी। इन सबसे परेशान होकर हम लोगों ने लाइब्रेरी की समस्याओं और लाइब्रेरियन और चपरासी की शिकायत के रूप में कई पोस्टकार्ड विभिन्न स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों को भेजे। इन शिकायती पत्रों को कई अखबारों ने प्रकाशित किया। जिनमें से कई साथियों के पत्रों के साथ मेरा लिखा शिकायती पत्र भी प्रकाशित हुआ। कुछ स्थानीय अखबारों ने इसे खबर के रूप में छापा। अखबारों में प्रकाशित होने के कारण यह एक बड़ा मुद्दा बन गया, जिसकी आँच जिला विद्यालय निरीक्षक तक पहुँची। उन्होंने इन खबरों को संज्ञान में लेते हुए एक दिन छात्रों के हमारे ग्रुप को अपने ऑफिस में बातचीत के लिए बुलाया। वहाँ पर उन्होंने बड़े ध्यानपूर्वक हमारी शिकायतें सुनी और लाइब्रेरियन व चपरासी को फटकार लगाते हुए आइंदा से नियमानुसार कार्य करने की चेतावनी दी।

जिला विद्यालय निरीक्षक महोदय ने हम लोगो से उन पत्रिकाओं और अखबारों की सूची मांगी, जो हम लोग पढ़ना चाहते थे, लेकिन लाइब्रेरी में नहीं आते थे। उन्होंने उन पत्रिकाओं, अखबारों की लाइब्रेरी भिजवाने की व्यवस्था की। जिसके बाद लाइब्रेरी की व्यवस्था में काफी सुधार हुआ।

इस घटना के बाद पहली बार मुझे शब्दों की ताकत का एहसास हुआ और उसी क्षण मैंने शब्दों से दोस्ती कर ली। अखबारों और प्रतियोगी पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़ाव और गहरा हुआ। 

इसी दौरान किसी पत्रिका या किताब में (ठीक से याद नहीं आ रहा) जब मैंने अज्ञेय की 'छंदमुक्त' कविता 'हिरोशिमा' पहली बार पढ़ी तो अचानक ही दिमाग में यह विचार बिजली की तरह कौंधा कि इस तरह की कविता तो मैं भी लिख सकता हूँ। एक यह महज एक विचार ही था। मैं उस क्षण एक पंक्ति भी नहीं लिख सका।

इसके दो-तीन महीने बाद ही, जहाँ मैं रहता था , वहीं पड़ोस में एक दुर्घटना घट गई, एक नवब्याहता को जिंदा जला दिया गया। इस दुर्घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया और मेरे दिमाग को बहुत उद्देलित और बेचैन किया। यह बेचैनी कई दिनों तक दिमाग को मथती रही। अन्ततः एक दिन इस बेचैनी से मुक्ति पाने के लिए इसे शब्दों में ढालने के प्रयास में डायरी और पेन लेकर लिखने बैठ गया। उस दिमाग मे पहले से पढ़ी हुई अज्ञेय की कविता 'हिरोशिमा' पूरी तरह हावी थी और उसी से प्रेरित होकर कागज पर एक कविता जैसा कुछ लिख डाला। यह मेरी पहली साहित्यिक रचना थी। कविता का शीर्षक रखा - 'अतृप्त इच्छाओं की वेदी'। 

संयोग से वह कविता एक स्थानीय साप्ताहिक पत्र में छप भी गई। इससे उत्साहित होकर  कुछ और कविताएँ, गीत और लघुकथाएँ लिखीं जो विभिन्न स्थानीय साप्ताहिक पत्रों और दैनिक अखबारों की रविवासरीय परिशिष्ट में छपीं। इस तरह मेरे लेखन का सिलसिला शुरू हुआ।

#कविताएं=
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01- - संकट

जिस समय बौर से लदा-फ़दा
मह-मह गमकना चाहिए
बसंत के उस मौसम में
मुरझाई आंखों से
आठ-आठ आँसू रोते हुए
गा रहा है कोई उदास गीत
पिता का रोपा हुआ
आम का पेड़।

ये रोना सिर्फ आम का रोना नहीं है
बल्कि रोना है उस
समूची पीढ़ी का
जो पेड़ों को अपने बच्चों सा पालती थी

अब पेड़ और
पेड़ों को चाहने वाले
दोनों संकट में हैं
और इस संकट से उबरने का
कोई भी उपाय
किसी भी नदी, हवा, मिट्टी
या मौसम के पास नहीं है।

02-- मछुआरा मन 

मछुआरा मन
चाहे कुछ ऐसा... 

खेतों, कछारों में
नदियों संग घूमें
झूमती-मचलती 
हवाओं संग झूमें

बारिश की रिमझिम में
पेड़ हँसें, फूल खिलें
जीवन की सुविधाएं
सबको भरपूर मिलें

चिड़ियों को पेड़ मिलें
पशुओं को जंगल
आदमी को बस्ती मिलें
सबका हो मंगल

मछुआरा मन
चाहे कुछ ऐसा…

03 -  गाँव की पगडंडियाँ

हर बार गाँव से लौटते समय 
कन्धों पर झूल-झूल जाती हैं 
मेरे गाँव की पगडंडियाँ
वे भी आना चाहती हैं शहर 
मेरे साथ 

शहर को 
समझता हूँ  
मैं उनसे बेहतर 
इसलिए समझाता हूँ- 
यहीं रहो तुम सब 
यहीं तुम सुरक्षित हो 
जाओगी शहर तो 
गुम हो जाओगी तुम 
बचेगा नहीं नामोनिशान तुम्हारा 

मेरे कंधों से उतरकर 
थोड़ा गुस्सा और बहुत-सी निराशा से 
ताकती हैं एकटक 
वे मुझे देर तक 

हर बार छोड़ आता हूँ 
गाँव कि सरहद पर खड़े
बूढ़े बरगद के नीचे उन्हें 

सोचता हूँ- 
किसी दिन यदि सचमुच में 
शहर आ गईं 
गाँव कि पगडंडियाँ 
तो क्या होगा उनका ?

वर्षों से 
इसी असमंजस में पड़ा हूँ मैं 
गाँव और शहर के 
ठीक बीचोबीच 
धोबी का कुत्ता बना खड़ा हूँ मैं ।

04- बीता समय उदास है

उदास है 
गाँव की सरहद पर
चैकीदार-सा खड़ा
बूढ़ा बरगद 
क्योंकि लोग उसकी छाया में
बैठने, बतियाने 
अब नहीं आते 

सूना है 
बड़े कुएँ का पनघट 
क्योंकि नही गूँजती
चूड़ियों, पायलों की झंकार
बाल्टी, गागर की  खनखनाहटें 
अब नहीं सुनाई देतीं यहाँ
लड़कियाँ-औरतों की खिलखिलाहटें 

उदास है
जीवन के मद्धिम अलाव में पकी
अनुभवों की गठरी लिए बैठी  
वृद्धावस्था 
क्योंकि लोग उसके पास
राय-मशविरा करने
उनके सुख-दुःख सुनने 
अब नहीं आते ।

05 - मेहनतकश आदमी

घबराता नहीं काम से
मेहनतकश आदमी ,
वह घबराता है निठल्लेपन से

बेरोजगारी के दिनों को खालीपन
कचोटता है उसको,
भरता है उदासी
रोजी-रोटी तलाश रही उसकी इच्छाओं में

पेट की आग से ज्यादा तीव्र होती है
काम करने की भूख उसकी
क्योंकि भूख तो तभी मिटेगी
जब वह कमाएगा
नही तों क्या खाएगा

सबसे ज्यादा डरावने होते हैं
वे दिन
जब उसके पास
करने को कुछ नहीं होता

रोजी-रोटी में सेंध मार रहीं मशीनें
सबसे बड़ी दुश्मन हैं उसकी
साहूकार, पुलिस और सरकार से
यहॉ तक कि भूख से भी
वह नहीं डरता उतना
जितना डरता है
मशीनों द्वारा अपना हक छीने जाने से

रोजगार की तलाश में
वह शहर-शहर ठोकरे खाता है
हाड़तोड़ मेहनत करता है
पर मशीनों की मार से
अपनी रोजी-रोटी नहीं बचा पाता,
तब वह बहुत घबराता है ।

06- निर्जीव होते गांव 

रो रहे हैं हँसिए
चिल्ला रही हैं खुरपियाँ
फावड़े चीख रहे हैं 
कुचले जा रहे हैं
हल, जुआ, पाटा,
ट्रैक्टरों के नीचे 

धकेले जा रहे हैं गाय-बैल, 
भैंस-भैसे कसाई-घरों में 

धनिया, गाजर , मूली ,  टमाटर ,
आलू, लहसुन ,प्याज, गोभी ,
दूध ,दही, मक्खन, घी ,
भागे जा रहे हैं
मुँह-अँधेरे ही शहर की ओर
और किसानों के बच्चे
ताक रहे हैं इन्हें ललचाई नजरों से 

गाँव में 
जीने की ख़त्म होती 
संभावनाओं से त्रस्त
खेतिहर नौजवान पीढ़ी
खच्चरों की तरह पिसती है  
रात-दिन शहरों में
गालियों की चाबुक सहते हुए 

गाँव की जिंदगी
नीलाम होती जा रही है
शहर के हाथों ;
और धीरे- धीरे ...
निर्जीव होते जा रहे हैं गाँव 

07– गाँव, नदी और पेड़ का भविष्य 
 
मेरे गाँव के 
खूबसूरत चेहरे को 
बदरंग करके 
बिजूके की तरह  
टांग दिया है 
बाजार ने 
लकडहारे के हाथों बिक चुके 
रेत हो चुकी नदी के किनारे खड़े 
अंतिम पेड़ की 
उदास डालों पर
 
अब पेड़ चाहे तो 
चेहरा पहन ले 
या फिर चेहरा 
पेड़ हो जाए 
और फिर दोनों 
रेत को निचोड़कर
मुक्त कर दें नदी को 
 
ऐसी ही दो-एक संभावनाओं पर 
टिका है 
गाँव, नदी और पेड़ का भविष्य 

08- सपने जिंदा हैं अभी

मर नहीं गए हैं सब सपने 
कुछ सपने जिंदा हैं अभी भी

एक पेड़ ने
देखे थे जो सपने
हर आँगन में हरियाली फ़ैलाने के 
उसके कट जाने के बाद भी
जिंदा हैं वे अभी
उसकी कटी हुई जड़ों में 

एक फूल ने
देखे थे जो सपने
हर माथे पर खुशबू लेपने के
उसके सूखकर बिखर जाने के बाद भी
जिंदा हैं वे अभी
उसकी सूखी पंखुड़ियों में 

एक तितली ने
देखे थे जो सपने
सभी आँखों में रंग भरने के 
उसके मर जाने के बाद भी
जिंदा हैं वे अभी
उसके टूटे हुए पंखों में 

एक कवि ने
देखे थे जो सपने
समाजिक समरसता के, 
आडंबर, पाखंड,  जात-पाँत,  छुआछूत से 
मुक्त समाज के 
उसके मार दिए जाने के बाद भी 
जिंदा हैं वे अभी
उसकी रचनाओं में 

मर नहीं गए हैं सब सपने 
कुछ सपने जिंदा हैं अभी भी। 

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 #परिचय=

जनपद फतेहपुर(उ0प्र0) के एक छोटे से गाँव फरीदपुर में 25 दिसंबर 1980 को जन्म. 
 
शिक्षा एम0ए0(हिन्दी), बी0एड0, पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा.
 
लेखन और आजीविका की शुरुआत पत्रकारिता से. दो-तीन वर्षों तक पत्रकारिता करने तथा तीन-चार वर्षों तक भारतीय रेलवे में स्टेशन मास्टरी और कुछ वर्षों तक इधर-उधर भटकने के पश्चात सम्प्रति अध्यापन.
 
कविताएं कहानियां, लघुकथायें एवं आलोचना आदि का लेखन और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, ई-पत्रिकाओं एवं ब्लॉगों में प्रकाशन.
 
दो कविता संग्रह 'सपने जिंदा हैं अभी'
और 'यही तो चाहते हैं वे' प्रकाशित. 
 
मोबइल – 09336453835 
ईमेल - premnandanftp@gmail.com
पता-शकुन नगर, सिविल लाइन्स,
      फतेहपुर (उ0प्र0)

गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

प्राथमिक शिक्षा : दशा और दिशा

प्राथमिक शिक्षा कि दुर्दशा के लिए केवल अध्यापक ही दोषी नहीं !

   आजकल हमारे जनपद फतेहपुर में अधिकारियों और मीडिया द्वारा प्राथमिक शिक्षा  की गुणवत्ता को सुधारने के लिए  को चलाये जा रहे सघन अभियान में प्राथमिक शिक्षा में व्याप्त कमियों का जो ठीकरा   केवल  प्राथमिक शिक्षकों के सिर फोड़ा जा रहा है , वह पूरी तरह से एकतरफा है और सारे  शिक्षकों की गलत तस्बीर पेश कर रहा है जिससे अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान अध्यापकों को बड़ा क्षोभ है !

       यह बात सही है कि आज पूरे देश कि शिक्षा , चाहे वह प्राथमिक हो या माध्यमिक या उच्च शिक्षा हो , पूरी तरह से पटरी से उतरी हुई है , लेकिन यहाँ हम केवल प्राथमिक शिक्षा कि बात करें तो उसकी स्थिति बड़ी ही दयनीय है ! लेकिन इसके लिए सिर्फ शिक्षकों को ही पूरी तरह से दोषी ठहराना नितांत गलत एवं दुर्भावना पूर्ण है !

     दरअसल शिक्षा एक बहुकोणीय व्यवस्था है जिसका एक कोण शिक्षक है ! अन्य कोण शैक्षिक व्यवस्था , आभिवावक .बच्चे , किताबे , पाठ्यक्रम ... आदि आते हैं ! इसलिए शिक्षा कि गुणवत्ता के लिए अकेले शिक्षक को ही पूर्णरूपेण जिम्मेदार मानना सरासर नाइंसाफी है !  
 
     शिक्षा कि गुणवत्ता में ये गिरावट एक दिन में नहीं आ गयी है इसके लिए हमारी पूरी शैक्षिक व्यवस्था , अभिभावक , बच्चे एवं अध्यापक बराबर के दोषी हैं ! प्राइमरी स्कूलों की अव्यवस्थाओं से सभी परिचित हैं ! अध्यापकों की कमी , संशाधनो का अभाव , अध्यापकों को शिक्षणेत्तर  कार्यों में लगाना , अभिभावकों का असहयोग , बच्चों का नियमित रूप से विद्यालय न आना , शैक्षिक अधिकारियों के नियमित निरीक्षण न होना  आदि .... आदि कमियों के चलते ही आज प्राथमिक शिक्षा रसातल में पहुँच चुकी है लेकिन इसके लिए केवल अध्यापक को दोषी ठहराने और उसको ही बलि का बकरा बनाने से इसका उद्धार नहीं होने वाला है !

          अधिकारी यदि वास्तव में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारना चाहते हैं तो उन्हें इसके सारे कोणों में सामंजस्यपूर्ण माहौल तैयार करना होगा और सभी की बराबर की जवाबदेही तय करनी होगी , तभी प्राथमिक शिक्षा को पटरी पर लाया जा सकता है !

      एक और बात - पहली बार अधिकारी और मीडिया , दोनों प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता की बात कर रहे हैं ,यह प्राथमिक शिक्षा के लिए एक शुभ संकेत है , नहीं तो अभी तक मीडिया और आधिकारियों द्वारा सिर्फ मिड डे मील की कमियाँ , शिक्षकों का स्कूल न जाना , वजीफा और ड्रेस बितरण की कमियाँ , भवन निर्माण की खामियों की ही उजागर किया जाता था ! यह पहली बार है की इनके द्वारा शैक्षिक गुणवत्ता की बात की जा रही है , लेकिन यह काम पूरी तरह से एकपक्षीय किया जा रहा है , जिसमे न तो शिक्षकों की बात सुनी जा रही है और न ही उनको इसमें शामिल किया जा रहा है ! खासकर मीडिया इसमें बिलकुल ही नकारात्मक भूमिका निभा रहा है और शिक्षा में आई गिरावट के लिए पूरी तरह से शिक्षकों को ही कटघरे में खड़ा करने शिक्षकों की गरिमा को तार-तार  करने का काम कर रहा है !

   मीडिया और अधिकारियों को यह बात समझनी चाहिए कि प्राथमिक शिक्षा में आई इस गिरावाट में शिक्षक , अभिवावक , बच्चे , शैक्षिक अधिकारी , शैक्षिक व्यवस्था , आदि सभी बराबर के भागीदार हैं , केवल शिक्षकों के सिर इसका ठीकरा फोडना बिलकुल भी ठीक नहीं है ! 

   आशा है , प्राथमिक शिक्षा के उन्नयन के लिए इससे जुड़े हुए सभी लोग , एक दूसरे कि टांग खींचने के बजाय कंधे से कंधा मिलाकर प्रयास करेंगे और मीडिया भी इसमें हमारा सहयोग करेगा और प्राथमिक शिक्षा एक बार फिर से अपना खोया हुआ गौरव हासिल करेगी !

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

अखनई झील

जलकुंभी और अतिक्रमण ने निगल लिया अखनई झील का असीम सौंदर्य
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एक जमाने में कमल के फूलों और कमल गट्टों के लिए पूरे जिले में मशहूर और अपने आसपास के सैकड़ों गाँवों को पानी के साथसाथ रोजी-रोटी, और आजीविका देने वाली अखनई झील इन दिनों अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। 

हुसेनगंज कस्बे के पास स्थित  दस-बारह किलोमीटर लंबी और एक-डेढ़ किलोमीटर चौड़ी अर्ध चंद्राकर रूप में फैली अखनई झील किसी समय अपने किनारे स्थित गनपतपुर, फरसी, पतरिया, धरमदासपुर, फरीदपुर, औढ़ेरा सहित सैकड़ों गाँवों को आजीविका उपलब्ध कराती थी। गरमी आते ही कमल के गुलाबी फूलों से भर जाती थी यह झील और गुलाबी सौंदर्य की अनोखी आभा और कमल के फूलों की भीनी-भीनी खुशबू से पूरा क्षेत्र में गमकने लगता था।

कमल के पत्ते उस समय शादी-विवाह व अन्य कार्यक्रमों में पत्तल के रूप में प्रयोग किए जाते थे। कमल के पत्तों के लिए दूर-दूर से लोग आते थे और झील से कमल के पत्ते काटकर या पैसे देकर आसपास के गाँवों के लोगों से कटवाकर ले जाते थे।  ग्रामीण कमल के फूल और जड़ें बाजार में बेचकर अपनी रोजी-रोटी चलाते थे। 

इस झील में सैकड़ों प्रजाति की मछलियां पाई जाती थीं जो ग्रामीणों की आजीविका का बहुत बड़ा स्रोत थीं। जिन्हें आसपास के ग्रामीण लोग खाते थे और बाजारों में बेचकर अपना और अपने परिवार का पेट भरते थे।

इस झील में विभिन्न प्रकार के जलीय जीव रहते थे जिनमें प्रमुख रूप से ऊदबिलाव, कछुए और जलीय साँप रहते थे। शिकारियों ने मछलियों के साथ ही ऊदबिलाव और कछुए भी खत्म कर दिए। यह झील सैकड़ों प्रकार के स्थानीय पक्षियों का रहवास हुआ करती थी और इस झील में लाखों प्रवासी पक्षी, प्रवास के लिए आते थे। शिकारियों के कारण स्थानीय पक्षी तो खतम हो गए ही, प्रवासी पक्षियों ने भी झील में आना छोड़ दिया है।

लेकिन अब यह सब बीते दिनों की बातें हैं। अब यह जीवनदायिनी झील अपने अस्तित्व की लड़ाई हारने के कगार पर खड़ी है औरबारहों महीने पानी से लबालब भरी रहने वाली झील अपने दुर्भाग्य पर आठ-आठ आँसू रो रही है।

सबसे पहले इस झील के गले का फंदा बनी- जलीय खरपतवार जलकुंभी। जलकुंभी ने पूरी झील को ढक लिया और कमल के पौधों को बेदखल करने का काम किया। इससे इस झील के अनोखे सौंदर्य को ग्रहण लग गया। 

शिकारियों ने ऊदबिलाव , कछुए और मछलियों को पकड़ने के लिए कई बार कीटनाशक दवाओं का प्रयोग भी किया और पूरी झील को छोटे-छोटे बंधों में बाँधकर  झील के असीम सौंदर्य को ही बंधक बना लिया जिससे पूरी झील का जलीय पारिस्थितिकी तंत्र चौपट हो गया। जिससे इस झील में आने वाले लाखों प्रवासी पक्षियों की आवाजाही बंद हो गई है।

अतिक्रमण ने इसका इतिहास ही नहीं, इसके भूगोल को ही बदल डाला है। हजारों बीघे में फैली यह झील दिन प्रतिदिन सिकुड़ती जा रही है और इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। दो-तीन साल पहले #स्वामी_विज्ञानानंद और जलपुरूष #राजेंद्रसिंह की अगुवाई में सैकड़ों ग्रामीणों ने इसको बचाने के लिए पदयात्रा की थी । जिला प्रशासन ने उस समय इस झील के  सरंक्षण करने के आश्वासन भी दिए थे। लेकिन उन प्रशासनिक आश्वासनों का क्या हुआ किसी को पता नहीं है!

ध्यातव्य रहे कि यह प्रसिद्ध अखनई झील ससुर खदेरी नदी न02 का उद्गम स्थल भी है।
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-- प्रेम नंदन
09336453835
premnandanftp@gmail.com

गुरुवार, 4 नवंबर 2021

एक देश बारह दुनिया

बिना किसी राजनीतिक प्रोपोगंडा के जन सरोकारों की जमीनी पत्रकारिता कैसे की जाती है, इसका बेहतरीन उदाहरण है - एक देश बारह दुनिया

-- प्रेम नंदन

हम एक ऐसे देश में रहते हैं जो भिन्नताओं का सबसे बड़ा समुच्चय है। इस देश जैसी भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विभिन्नता शायद ही दुनिया के किसी देश में हो! दरअसल यह देश अपने अंदर एक नहीं, हजारों दुनिया समेटे हुए है और उन्ही हजारों दुनियायों में से हासिए की ऐसी ही बारह आवाजों का स्याह, धूसर और दर्दनाक आख्यान है युवा पत्रकार शिरीष खरे की चर्चित किताब- 'एक देश बारह दुनिया'.


 

'वह कल मर गया' दरअसल इस देश की नागरिक व्यवस्था के मर जाने की अनुगूँज है और इसका जीता जागता उदाहरण है - महाराष्ट्र का मेलघाट। जहाँ आज भी कुपोषण से हजारों बच्चों की मौत हो जाती है और ये मौतें किसी भी सरकार के लिए आंकड़ों से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। जिस देश में लाखों टन अनाज रखरखाव के अभाव में सड़ जाता हो उस देश में भुखमरी और कुपोषण से होने वाली मौतें राष्ट्रीय शर्म का विषय होनी चाहिए।


कमाठीपुरा, महाराष्ट्र की पिंजरेनुमा कोठरियों में कैद होकर सड़ रही बदनसीब जिंदगियों की स्याह इबारतें हर संवेदनशील इंसान को झकझोरने के लिए काफी हैं। अधिकतर मजबूरी में और अपनों की बेवफाई का शिकार युवतियां इस नर्क में अपनी जिंदगी होम कर रहीं हैं लेकिन वे अपने बच्चों को इस दुनिया से दूर रखने के उदास सपनों के सहारे अपनी जिंदगी को किसी तरह से ढो रहीं हैं।



जीवन की मूलभूत सुविधाओं के अभाव में आज भी देश के करोड़ों लोग अपने देश में ही परदेसियों जैसा जीवन जीने को अभिशप्त हैं और देश की तमाम जगहों में से एक ऐसी ही जगह है महाराष्ट्र का कनाडी बुडरुक गाँव; जहाँ के बाशिन्दों के पास आज भी अपनी नागरिकता को साबित करने वाले सबूतों के लिए एक ऐसे कागज के टुकड़ों के लिए मोहताज अपढ़ बंजारे रहते हैं, जो उन्हें देश का नागरिक घोषित कर सके।



भले ही आजादी के इतने सालों बाद भी विकास की चकाचौंध से देश की बेहिसाब आबादी वंचित हो लेकिन फ़िल्मी चकाचौंध से देश की मिचमिचाती आँखे चुँधियाई हुई हैं। कुछ ऐसी ही कहानी है महाराष्ट्र के आष्टी गाँव में रहने वाले नट समुदाय के लोगों की। इस गाँव के घरों में विभिन्न फ़िल्मी सितारों के पोस्टरों से सजी दीवारें इस बात की गवाही देती हैं कि अपनी जान जोखिम में डालकर फिल्मी सितारों के खतरनाक स्टंट करने वालों में इस गाँव के तमाम नट हैं जिनका उपयोग करके उन्हें उनके बदहाल पर छोड़ दिया गया है।


रोजी-रोटी के लिए पलायन इस देश में कोई समस्या ही नहीं है जैसे। आज भी देश के करोड़ों लोग रोजीरोटी की तलाश में दर-दर भटकते रहते हैं। देश के हजारों गाँवों की तरह ही महाराष्ट्र का मस्सा गाँव भी पलायन की मार से कराहते जीवन का नंगा यथार्थ है। गन्ना के खेतों पर कार्य करने वाले, दूसरों की थाली में मिठास घोलने वाले मजदूरों का जीवन किसी कड़वी चीनी से कम नहीं है।


'सूरज को तोड़ने जाना है' महाराष्ट्र के सुदूरवर्ती महादेव बस्ती की पारधी जनजाति की कहानी है जिसे अंग्रेजों ने अपराधी की श्रेणी में रख दिया था। पारधी जनजाति के शिक्षा की मुख्य धारा में जोड़ने वाले अध्यापकों और इस कार्य में सहयोग करने वाले ग्रामीणों की जिज्ञासा और जिजीविषा से ही इस समुदाय के लोग आज सूरज को तोड़ने के सपने देख रहे हैं यह देखना सुखद अनुभव है।


'मीराबेन को नींद नहीं आती' किसी सोपओपेरा का एपिसोड नहीं बल्कि जिंदगी भर खदेड़े/उजाड़े

जाने का एक भयानक और दर्दनाक धारावाहिक है। यह दर्द हर महानगरों की हौलनाक सच्चाई है। गुजरात के प्रमुख शहर सोविएत का 'संगम टेकरी' मोहल्ला इसका ताजा शिकार है। झोपड़पट्टी में रहने वाले हजारों लोगों को रात-रात भर नींद नहीं आती है कि पता नहीं अगली सुबह उनको उजाड़ने की सुबह न हो!


नदियों को मैदान बनाने का खेल पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे नापाक खेल है। देश की अधिकांश नदियों को वे बाँधों में बांधकर दुधारू गाय जैसा दोहन कर रहे हैं और विकास के नाम पर विनाश की खतरनाक इबारत लिख रहे हैं। 

विकास के गिद्ध नदियों को नोच-नोच कर खाते जा रहे हैं और यह सिर्फ नर्मदा की ही बात नहीं है। देखना - एक दिन वे देश की सारी नदियों को मैदान बना डालेंगे और हम सिर्फ आठ-आठ आँसू रोने के अलावा कुछ भी नहीं कर पाएंगे।


इस देश में आज भी करोड़ों लोगों के लिए 'सुबह' नहीं हुई है! और सुबह होगी ही इसे विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता! जैसे राजस्थान के बायतु में रहने वाली मीरा और राजौ अन्याय, अत्याचार और दबंगई के गहन अंधकार में गर्दन तक धँसी हुई सुबह होने के इंतजार में आज भी खड़ी हैं।


दंडकारण्य का नाम सुनते ही कान चौकन्ने हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ का एक ऐसा इलाका जहां आज भी पुलिस/सुरक्षाकर्मी और इस इलाके के रहने वाले आदिवासी एक दूसरे की जान के दुश्मन बने हुए हैं। इसके लिए लाल आतंक, लाल गलियारा, और न जाने क्या-क्या नाम प्रयोग किए जाते हैं। कोई भी सरकार आदिवासियों की समस्याओं की जड़ तक नहीं पहुँचना चाहती उन्हें बस पूंजीपतियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और आदिवासियों को उनकी जमीन, जंगल से खदेड़ने से मतलब है। 

दंडकारण्य यूँ ही लाल नहीं है, आखिरकार कुछ तो कारण होंगे। जब तक कारणों का निवारण निष्पक्षता से नहीं किया जायेगा,  दंडकारण्य यूँ ही लाल बना रहेगा!



मकदूद्वीप, छत्तीसगढ़ का अकूत सम्पत्तियों से भरपूर एक ऐसा टापू है जो कभी गुप्त कालीन पुरावैभव की कहानी बयां कर सकते थे। आज पूरी तरह से खंडहर हो चुके इस द्वीप में सातवीं से दसवीं शताब्दी पुरानी सभ्यता का संसार ठहरा हुआ है। यहाँ इतिहासकारों को प्राचीन सभ्यताओं के बारे में तमाम जानकारियां मिल सकती हैं क्योंकि ये खंडहर एक गाइड की तरह सदियों से इतिहासकारों के इंतजार में खड़े हैं!



छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा ऐसे ही नहीं कहा जाता। यहाँ पर धान की सैकड़ों प्रजातियों की खेती की जाती है लेकिन अब यह कटोरा खाली रह जाने को अभिशप्त होता जा रहा है। कभी बाढ़, कभी सूखा कभी अन्य प्राकृतिक आपदाएं इस कटोरे को धान की जगह राहत के धोखे से भरने की कोशिश में और खाली करती जा रही हैं। सरकार, अधिकारी और बाबूवर्ग मिलकर जनता को मिलने वाली राहत डकार जाते हैं और जनता के पेट का कटोरा खाली का खाली ही रह जाता है।


पत्रकार शिरीष खरे की चर्चित किताब 'एक देश और बारह दुनिया' से गुजरते हुए देश के विभिन्न इलाकों की जमीनी हकीकत को पूरी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। और यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि बिना किसी राजनीतिक प्रोपोगंडा के जन सरोकारों की जमीनी पत्रकारिता कैसे की जाती है, इसका बेहतरीन उदाहरण है - एक देश बारह दुनिया।

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किताब - एक देश बारह दुनिया

(रिपोर्ताज -समाज और संस्कृति)

लेखक - शिरीष खरे

प्रकाशक - राजपाल प्रकाशन, नई-दिल्ली

पेज-208

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प्रेम नंदन

09336453835

premnandanftp@gmail.com



दस रुपए और बीस मिनट की ओट में पंचामृत

जिंदगी के बेशकीमती बीस मिनट और गाढ़ी कमाई के दस रुपए फूंकने के बाद ठंड से ठिठुरती उंगलियों को आपस में रगड़ते हुए उसे लगा कि इस समय उसके हाथों ...