जिंदगी के बेशकीमती बीस मिनट
और गाढ़ी कमाई के दस रुपए फूंकने के बाद
ठंड से ठिठुरती उंगलियों को
आपस में रगड़ते हुए
उसे लगा कि
इस समय उसके हाथों में कोई किताब होनी चाहिए
या डायरी और पेन
इन बीस मिनटों में
पढ़ सकता था दर्जन भर पन्ने
या लिख सकता था
समय की हकीकत के
कुछ आड़े-तिरछे, उलझे हुए शब्द
इनके बिना जीवन कितना अधूरा है!
फिर अचानक पेट की कुलबुलाहट से
याद आए दस रुपये
दस रुपयों के साथ याद आए
नमक, मिर्च, लहसुन, धनिया और प्याज
(जिन्हें वह अक्सर पंचामृत कहता है)
और साथ में रोटी
उसने भूखे पेट की अतल गहराईयों से सोचा
रोटी तो ऐसे ही चबाई जा सकती है
पंचामृत में
कोई एक, दो या तीन मिल जाएं तो
खाई जा सकती है
पंचामृत मिल जाएं तो
एक सूखी रोटी भी बन सकती है
छप्पनभोग
इतना याद आते ही
उसे लगा कि
जिंदगी की जरूरतें जब इतनी कम हैं
तो फिर ये रात-दिन की हाय-हाय क्यों
रोज की किचकिच
भागदौड़ क्यों?
झूठ, फरेब और जूतमपैजार क्यों?
चोरों की चापलूसी
झूठों की जयजयकार
भ्रष्टों की वाहवाही क्यों?
क्यों, क्यों क्यों...?
इस तरह के
ढेर सारे प्रश्नों की अकुलाहट से
बुद्ध की तरह
उसे प्राप्त हुआ नया ज्ञान
और इस ज्ञान की चमकदार रोशनी में
जेब में पड़ा दस रुपए का आखिरी सिक्का पेट की कुलबुलाहट में कुनमुनाया
और पंचामृत के साथ रोटी की याद आई.