गुरुवार, 26 मार्च 2026

दस रुपए और बीस मिनट की ओट में पंचामृत

जिंदगी के बेशकीमती बीस मिनट

और गाढ़ी कमाई के दस रुपए फूंकने के बाद

ठंड से ठिठुरती उंगलियों को

आपस में रगड़ते हुए

उसे लगा कि

इस समय उसके हाथों में कोई किताब होनी चाहिए

या डायरी और पेन


इन बीस मिनटों में

पढ़ सकता था दर्जन भर पन्ने

या लिख सकता था

समय की हकीकत के

कुछ आड़े-तिरछे, उलझे हुए शब्द


इनके बिना जीवन कितना अधूरा है!


फिर अचानक पेट की कुलबुलाहट से

याद आए दस रुपये

दस रुपयों के साथ याद आए

नमक, मिर्च, लहसुन, धनिया और प्याज

(जिन्हें वह अक्सर पंचामृत कहता है)

और साथ में रोटी 


उसने भूखे पेट की अतल गहराईयों से सोचा

रोटी तो ऐसे ही चबाई जा सकती है

पंचामृत में

कोई एक, दो या तीन मिल जाएं तो

खाई जा सकती है

पंचामृत मिल जाएं तो

एक सूखी रोटी भी बन सकती है

छप्पनभोग


इतना याद आते ही

उसे लगा कि

जिंदगी की जरूरतें जब इतनी कम हैं

तो फिर ये रात-दिन की हाय-हाय क्यों

रोज की किचकिच

भागदौड़ क्यों?

झूठ, फरेब और जूतमपैजार क्यों?


चोरों की चापलूसी

झूठों की जयजयकार

भ्रष्टों की वाहवाही क्यों?


क्यों, क्यों क्यों...?


इस तरह के 

ढेर सारे प्रश्नों की अकुलाहट से

बुद्ध की तरह 

उसे प्राप्त हुआ नया ज्ञान

और इस ज्ञान की चमकदार रोशनी में

जेब में पड़ा दस रुपए का आखिरी सिक्का पेट की कुलबुलाहट में कुनमुनाया

और पंचामृत के साथ रोटी की याद आई.




दस रुपए और बीस मिनट की ओट में पंचामृत

जिंदगी के बेशकीमती बीस मिनट और गाढ़ी कमाई के दस रुपए फूंकने के बाद ठंड से ठिठुरती उंगलियों को आपस में रगड़ते हुए उसे लगा कि इस समय उसके हाथों ...